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जंगल की आग में सुलगते सवाल क्या ऐसे ही धधकती रहेगी देवभूमि

30/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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  • डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
    चिपको आंदोलन वाली धरती इन दिनों भयावह आग का सामना कर रही है। उत्तराखंड के जंगल इन दिनों आग की लपटों से घिरे पड़े हैं। आग का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। आग पर काबू करने को लेकर सारे सरकारी दावे नाकाम दिखाई दे रहे हैं विषम भूगोल और 71.05 प्रतिशत वन भूभाग वाले उत्तराखंड में हर साल आग से जंगलों को बड़े पैमाने पर क्षति पहुंच रही है, लेकिन इसके आकलन का पैमाना हैरत में डालने वाला है।आप यकीन नहीं करेंगे कि धू-धूकर जल रहे जंगल में खाक होने वाले पांच वर्ष के एक पौधे की कीमत मात्र 32 रुपये आंकी जाती है, लेकिन यह सत्य है।हालांकि, लंबी प्रतीक्षा के बाद अब इस सतही और घिसे-पिटे ढर्रे को बदलने की दिशा में सरकार गंभीर हुई है। वन मंत्री ने इन अव्यावहारिक मानकों में बदलाव के निर्देश वन मुख्यालय को दिए हैं। जंगल में लगने वाली आग से क्षति का जो आकलन किया जाता है, वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। इसके मानकों को देखें तो आग में नष्ट होने वाले एक वर्ष के एक पौधे की कीमत 20 रुपये आंकी जाती है।इसी प्रकार दो, तीन, चार व पांच साल के पौधे की कीमत क्रमश 22.40 रुपये, 24.96 रुपये, 28 रुपये व 32 रुपये आकलित करने का प्रविधान है। इसके अलावा चीड़ वनों में 3000, साल वनों में 2000 और मिश्रित वनों में 1000 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से क्षति का आकलन किया जा रहा है। जैसा परिदृश्य है, वह दर्शाता है कि क्षति का केवल सतही आकलन ही विभाग कर रहा है। समझना होगा कि आग से मात्र झाड़ियां, पौधे व घास ही नष्ट नहीं होते, बल्कि जैवविविधता के संरक्षण में योगदान देने वाले बहुमूल्य छोटे पौधों और सरीसृप समेत अन्य छोटे जीवों की भी हानि होती है। यही नहीं, आग और धुएं से पर्यावरण, मृदा, भूजल व प्राकृतिक पुनरोत्पादन भी प्रभावित होता है। बावजूद इसके इस क्षति के आकलन की कोई व्यवस्था नहीं है। जंगल की आग अब हर साल दोहराई जाने वाली गंभीर आपदा बन चुकी है। बढ़ते तापमान, सूखे मौसम और चीड़ के जंगलों में जमा पिरूल के कारण हर वर्ष सैकड़ों वनाग्नि घटनाएं सामने आती हैं। सरकारी और केंद्रीय एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 25 वर्षों में हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ चुका है। इससे न सिर्फ जंगल और वन्यजीव प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, जल स्रोत, खेती और पहाड़ी गांवों की आजीविका पर भी असर पड़ रहा है। जंगल की आग अब हर साल दोहराई जाने वाली गंभीर आपदा बन चुकी है। बढ़ते तापमान, सूखे मौसम और चीड़ के जंगलों में जमा पिरूल के कारण हर वर्ष सैकड़ों वनाग्नि घटनाएं सामने आती हैं। सरकारी और केंद्रीय एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि पिछले 25 वर्षों में हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ चुका है। इससे न सिर्फ जंगल और वन्यजीव प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, जल स्रोत, खेती और पहाड़ी गांवों की आजीविका पर भी असर पड़ रहा है। पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड राज्य के करीब 58 हजार हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आ चुके हैं, जबकि 2024 में ही 1,700 हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र प्रभावित होने का दावा किया गया। हर साल सैकड़ों वनाग्नि घटनाएं न सिर्फ हजारों पेड़ों और वन्यजीवों को नुकसान पहुँचा रही हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, जल स्रोतों और पहाड़ के ग्रामीण जीवन पर भी गहरा असर डाल रही हैं। उत्तराखंड वन विभाग की 28 मई 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, 15 फरवरी 2026 से 28 मई 2026 के बीच राज्य में कुल 450 वनाग्नि घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें गढ़वाल क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहाँ 331 आग की घटनाएं सामने आईं। कुमाऊं क्षेत्र में 83 और प्रशासनिक व वन्यजीव क्षेत्र में 36 घटनाएं दर्ज हुईं। इससे पहले 1 नवंबर 2025 से 14 फरवरी 2026 के बीच भी 61 आग की घटनाएं हुई थीं। इस तरह नवंबर 2025 से मई 2026 तक कुल 511 वनाग्नि घटनाएं रिकॉर्ड की गईं। वनाग्नि को लेकर उत्तराखंड सरकार और Forest Survey of India (FSI) के आंकड़ों में बड़ा अंतर सामने आया है। उत्तराखंड वन विभाग के आधिकारिक डेटा के अनुसार पिछले 25 वर्षों में राज्य में लगभग 58,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र आग से प्रभावित हुआ है। विभागीय रिकॉर्ड में वर्ष 2023 में 933.52 हेक्टेयर और वर्ष 2024 में 1,771.62 हेक्टेयर वन क्षेत्र में आग लगने की पुष्टि की गई।वहीं 2026 फायर सीजन (15 फरवरी से 28 मई 2026) के दौरान राज्य में 450 वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 367.33 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। यह डेटा उत्तराखंड वन विभाग की आधिकारिक “डेली फायर रिपोर्ट” और PCCF कार्यालय के रिकॉर्ड पर आधारित है।दूसरी ओर Forest Survey of India (FSI) की सैटेलाइट आधारित रिपोर्ट में नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच (सिर्फ एक साल का डाटा) उत्तराखंड में लगभग 1.80 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र आग से प्रभावित दिखाया गया है। FSI रिमोट सेंसिंग, MODIS और SNPP-VIIRS जैसे सैटेलाइट सिस्टम के जरिए “बर्न्ट एरिया” का आकलन करता है। यानी जहाँ आग के निशान दिखाई देते हैं, उसे प्रभावित क्षेत्र माना जाता है। जबकि राज्य वन विभाग केवल जमीन पर सत्यापित घटनाओं और सीमित प्रभावित क्षेत्र को रिकॉर्ड करता है। आग के बाद जंगलों की मिट्टी अपनी नमी और उपजाऊ क्षमता खोने लगती है, जिससे पहाड़ के पारंपरिक जल स्रोत जैसे नौले और धाराएं धीरे-धीरे सूखने लगते हैं। कई इलाकों में फलदार पेड़, बागवानी और खेतों में खड़ी फसलें आग की चपेट में आ जाती हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। लगातार जलते जंगलों के कारण वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होता है, जिसके चलते जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आने लगते हैं। बिनसर के ग्रामीण इलाकों में पिछले 3 से 4 में कई बार तेंदुए का आवाजाही देखी जा रही है। जंगलों में बढ़ती आग के कारण वन्य जीवों का घर भी उजड़ रहा है जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं और ग्रामीणों में असुरक्षा का माहौल बनता जा रहा है। वनाग्नि का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की अर्थव्यवस्था और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी गहरा असर डाल रहा है। आग और धुएं के कारण पर्यटन प्रभावित होता है, जिससे स्थानीय होटल, होमस्टे और छोटे कारोबारियों की आय पर सीधा असर पड़ता है। इलाज, यात्रा और रोजगार प्रभावित होने का बोझ सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है। यही वजह है कि वनाग्नि अब सिर्फ जंगलों की समस्या नहीं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकट का बड़ा कारण बनती जा रही है।  स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जलवायु अनुकूल वन नीति पर गंभीर काम करने की जरूरत है। वरना हर साल हजारों हेक्टेयर जंगल जलते रहेंगे और हिमालयी पारिस्थितिकी पर खतरा लगातार बढ़ता जाएगा। उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की घटनाएं पर्यावरणीय रूप से तो देखी जाती हैं, लेकिन इसका बड़ा असर जंगलों में रहने वाले वाइल्ड लाइफ पर भी पड़ता है। बड़ी बात यह है कि इतने सालों में अब तक इस पर कोई खास अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन विभाग यह मानता है कि जंगलों की आग वन्यजीवों के लिए फायर सीजन में बड़ी समस्या बनती है। फॉरेस्ट फायर सीजन शुरू होते ही वन विभाग प्रभावित वनों का आंकड़ा जारी करता है और आग की घटनाओं का भी ब्यौरा देता है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने सालों में कभी जंगलों की आग के कारण वन्यजीवों को होने वाले नुकसान का कोई आकलन सार्वजनिक नहीं किया गया. ऐसा नहीं है कि वन विभाग फॉरेस्ट फायर के कारण वन्यजीवों को नुकसान होने की बात से इनकार करता नजर आता हो.हमें ये भी समझना चाहिए की मौजूदा समय में जंगलों में लगने वाली आग से बहुमूल्य वन संपदा लगातार नष्ट हो रही है. इसके साथ ही वन्य जीवों पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ रहा है.जंगलों को आग से बचाना बेहद जरूरी है और इसके लिए जन सहयोग भी आवश्यक है.वही विभागीय मंत्री ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि जंगलों में आग लगने की घटनाओं को रोकने के लिए सभी नागरिक जिम्मेदारी निभाएं और किसी भी प्रकार की लापरवाही से बचें.अब जैसे जैसे तापमान बढ़ रहा है,प्रदेश में जंगल की आग की घटनाएं एक चुनौती बनरही हैं। वनाग्नि नियंत्रण के लिए संसाधनों को बढ़ाने के तमाम दावों के बीच जंगल की आग की घटनाएं लगातार बढ़  रही हैं। इससे पौड़ी जिला भी अछूता नहीं है। हालात ये हैं कि बीते दो वर्षों से राज्य में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा वनाग्नि की घटनाएं इसी जिले में रिपोर्ट हो रही हैं। तभी हालत तस के मस ही है.अब वन्यजीव घटनाओं के साथ वनाग्नि प्रदेश की बड़ी चिंन्ता बन गई है.जिस पर उपाय निकलने की बजाय  राजनीति भी फूल चरम पर है.वहीं राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने वन विभाग की कार्य संस्कृति पर कई सवाल खड़े करते हुए सीधे वन मंत्री पर ही निशाना साधा कांग्रेस ने वन्य क्षेत्र में लगने वाली बनाग्नि की बढ़ती घटनाओं के लिए वन विभाग को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया है।उत्तराखंड राज्य हमेशा से अपने अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध रहा है. लेकिन चारो ओर से घिरे पहाड़, वनों के बीच बसे राज्य उत्तराखंड में बसने वाले लोगों को समय समय पर अनेको दैवीय भौगोलिक परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ता है. वही बात करे वर्तमान समय की तो इन दिनों प्रदेश में सबसे बड़ी परेशानी लगातार वनाग्नि और वन्य जीवो के हमलों की बनती हुई नज़र आ रही है.जिस पर मुख्यमंत्री धामी ने चिंता जताते वन महकमे के अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की हालांकि उसका भी कोई अभी तक ठोस परिणाम धरातल पर निकल कर नहीं आया और आग और भयानक हो चली है.उत्तराखंड के वन क्षेत्रों में होने वाले अग्निकांड साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। मौजूदा समय में वन क्षेत्र में होने वाले अग्निकांड 15 फरवरी से लेकर 30 जून तक होता है। वन विभाग का अनुमान था कि इस साल कम वर्षा और पहाड़ों पर कम पर बर्फबारी होने के कारण आग की घटनाओं में इजाफा होगा वन विभाग के मुताबिक उत्तराखंड के जनपद चमोली रुद्रप्रयाग पौड़ी गढ़वाल और पिथौरागढ़ मुख्य रूप से अग्निकांड की चपेट में ज्यादा आए हैं। प्रदेश में अब तक 296 वन क्षेत्र में अग्नि की घटना हुई है जिनमें से 243 ने वन क्षेत्र को प्रभावित करने का काम किया है। वन विभाग में इन आग की इन घटनाओं पर काबू पाने के लिए प्रदेश के 21 विभागों में आपसी समन्वय  स्थापित किया जा रहा है.वनाग्नि नुकसान के बीच प्रदेश में राजनीति में भी आरोप प्रत्यारोप की आग लगती नजर आ रही है.प्रदेश में लगतार बढ़ते तापमान के चलते प्रदेश की वन संपदा धू धू कर जल रही है.भीषण वनाग्नि का दृश्य दिख रहे है.आग ने विकराल रूप धारण करते हुए जंगलों को अपनी चपेट में ले लिया है, कई स्थानों पर आग सड़क तक पहुंच गई, जिससे जनजीवन और पर्यावरण दोनों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है.धामी सरकार का कहना है,कि उत्तराखंड की वन संपदा हमारी अमूल्य धरोहर है. वन केवल हमारी प्राकृतिक पहचान ही नहीं, बल्कि पहाड़ के जीवन, जल स्रोतों, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का आधार भी हैं.इस प्रकार की घटनाएं अत्यंत चिंताजनक हैं. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने तत्काल वन विभाग के अधिकारियों से फोन कर आवश्यक कार्रवाई करने के त्वरित नियंत्रण के निर्देश दिए गए है.साथ ही स्थानीय प्रशासन से भी समन्वय बनाकर राहत और सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने को कहा है.अब अनेक क्षेत्रों के अंतर्गत जिन स्थानों पर आग लगने की सूचना मिल रही है, वहां उनकी टीम तुरंत मौके पर पहुंचकर आग पर काबू पा रही है. इसके लिए फायर वॉचर भी नियुक्त किए गए हैं.ऐसे में सवाल यही है.की हर साल सरकार विभाग वन्यजीव वन अग्नि को बचने के दावे करता है.लेकिन ये दावे ऐसे वक्त पर हवा हवाई ही साबित हो रहे है. जिससे हर साल करोडो की वन सम्पदा सहित वन्यजीव इसकी भेट चढ़ जाते है ऐसे में अब देखना होगा कि विभागीय स्तर पर आखिर बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं को रोकने के लिए कौन सा फार्मूला अख्तियार किया जाएगा लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.
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