डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आज 30 मई, तिलाड़ी के शहीदों को याद करने का दिन30 मई, 1930 भारत के इतिहास का अविस्मरणीय दिन है। इस दिन उत्तराखंड के बड़कोट में स्थित तिलाड़ी के मैदान में अपने हक हुकुओं के लिए सभा कर रहे आंदोलनकारियों पर राजा नरेन्द्र शाह की फौज ने गोलियां चलवाईं। उत्तराखंड के इस जलियांवाला बाग कांड में 200 लोग शहीद हुए थे। 30 मई 1930, स्थान – यमुना नदी के किनारे तिलाड़ी का मैदान। रवांई परगने के ग्रामीण बड़ी संख्या में राजशाही की ओर से वन सीमा में ग्रामीणों की उपेक्षा के विरोध में एकत्र हुए थे। अपने हक हकूक सुनिश्चित करने की योजना पर विचार ही हो रहा था कि टिहरी राजा नरेंद्र शाह के वजीर चक्रधर जुयाल के निर्देश पर बंदूकों से लैस सैनिकों ने तिलाड़ी मैदान में जुटे ग्रामीणों पर फायरिंग शुरू कर दी। कुछ गोलियों के शिकार बने तो कई अपनी जान बचाने के लिए यमुना के तेज प्रवाह में कूद गए लेकिन बच ना सके।इन शहीदों का कसूर मात्र इतना था कि वह ब्रिटिश हुकूमत के द्वारा लागू किए गये वन अधिनियम 1927 के आने के बाद जनता के जंगलों से लकड़ी, घास व अपनी जरुरत की वस्तुएं लाए जाने व पशु चराने पर लगाए गये प्रतिबंधों के खिलाफ एक सभा कर रहे थे..वन कानूनों को सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीणों की शहादत ने आने वाले पीढि़यों में भी जोश भरा। रवांई परगना ही नहीं संपूर्ण रियासत में लोगों को वन अधिकार देने की मांग तेज हुइ
जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठा कर लोगों को उनके हक हकूक दिलाने के लिए शहीद हुए शहीदों को याद रखने के लिए आज कोई ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। शहीदों की याद के लिए शहीद स्थल तिलाड़ी को अमृतसर के जलियांवाला बाग की तर्ज पर पर्यटन के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











