• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

जातीय जनगणना से सामाजिक समरसता को मिलेगा बल!

05/05/25
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
58
SHARES
73
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
पूरे भारत में जल्द ही जातिगत जनगणना होने जा रही है. इसका असर सभी राज्यों पर होने वाला है, उत्तराखंड भी इससे अछूता नहीं होगा. हाल ही में केंद्रीय कैबिनेट ने जाति आधारित जनगणना के फैसले पर मुहर लगा दी है. इसका अर्थ ये है कि इस बार होने वाली गणना में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियों को भी शामिल किया जाएगा. बता दें कि हमारे संविधान में अभी तक केवल एससी और एसटी की गणना करने का ही प्रावधान है, मगर इस बार ओबीसी को भी इसमें शामिल किया जाएगा. जातिगत जनगणना से उत्तराखंड में कई सामाजिक समीकरणों में बदलाव आने की संभावना है. उत्तराखंड की कुल जनसंख्या सवा करोड़ (1.22 करोड़) है. अनुमानित आंकड़ों की मानें तो उत्तरकाशी जिले में सबसे ज्यादा जनसंख्या ओबीसी की है, तो वहीं हरिद्वार लगभग 56 प्रतिशत, उधम सिंह नगर में 45 प्रतिशत तक इस वर्ग की हिस्सेदारी मानी जाती है. उत्तराखंड में मूल रूप से पाई जाने वाली प्रमुख जनजातियों में थारू, जौनसारी, बुक्सा, भोटिया, थारू आदि हैं, इनकी जनसंख्या कुल आबादी का 2.89 प्रतिशत है. इन्हें मूल जनजातियों को ज्यादातर समय पर प्रदेश में अनदेखा किया गया है और इन्हें अपने मूलभूत अधिकारों के लिए भी आवाज उठानी पड़ी है. जातिगत जनगणना होने से इनकी पहचान हो सकेगी और इनके मुद्दों पर भी बात की जा सकेगी.उत्तराखंड भी प्रमुख समस्याओं में से एक पहाड़ों से होने वाला पलायन भी है, हर साल बड़ी संख्या में नौजवान लोग रोजगार की तलाश में अपने गांवों को छोड़कर शहरों की तरफ चले जाते हैं. इससे जहां एक तरफ जनसंख्या असंतुलन हो रहा है, तो वहीं सुविधाओं पर दबाव भी पड़ रहा है. जातिगत जनगणना करने से इसे रोकने और युवाओं के लिए नई रोजगार संबंधी नीतियां बनाने में भी मदद मिल सकती हैं. नई जनगणना के बाद जनसंख्या की अद्यतन स्थिति सामने आ सकेगी। केंद्र सरकार के अगली जनगणना के साथ ही जातीय जनगणना कराने के निर्णय को सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।प्रदेश में अभी तक विधानसभा चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए एक भी सीट आरक्षित नहीं हैं। ओबीसी आरक्षण पंचायत चुनाव के लिए भी लागू होगा। इस बीच जातीय जनगणना कराने के केंद्रीय कैबिनेट के निर्णय से आने वाले समय में चुनाव के साथ ही राजनीतिक दलों के भीतर भी ओबीसी की हैसियत मजबूत होना तय है। ओबीसी जनसंख्या का सर्वाधिक प्रभाव हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर और देहरादून जिलों में देखने को मिलेगा। उत्तराखंड में जातीय समीकरणों की बात करें तो वोटरों के लिहाज से सीएसडीएस-लोकनीति के द्वारा एक सर्वे कुछ समय पहले किया गया था। जिसके मुताबिक प्रदेश में करीब 12 फीसद ब्राह्मण, 33 फीसद ठाकुर, सात फीसद अन्य सवर्ण, सात फीसद अन्य पिछड़ा वर्ग, 19 फीसद दलित, 14 फीसद मुसलमान व आठ फीसद अन्य वोटर हैं।जातीय जनगणना को लेकर सियासत लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखी जा रही है। ऐसे में देखना यही होगा कि आखिरकार जातीय जनगणना को लेकर जो सियासी दावा पेंच अपनाएं जा रहे हैं, उसे किस राजनीतिक दल को ज्यादा फायदा होता है।जातिगत जनगणना के केंद्र सरकार के फैसले के अलग अलग पहलुओं पर विचार करने से पहले एक पंक्ति का यह निष्कर्ष बता देना जरूरी है कि यह एक दूरदर्शी फैसला है, जिसे पर्याप्त विचार विमर्श के बाद देशहित को ध्यान में रख कर किया गया है। यह भी समझ लेना चाहिए कि यह कोई तात्कालिक फैसला नहीं है और राजनीतिक लाभ हानि अपनी जगह है परंतु इसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। ऐसा नहीं है कि राजनीति को ध्यान में रख कर या किसी विपक्षी पार्टी का एजेंडा छीन लेने या किसी बड़ी घटना से ध्यान भटकाने के लिए यह फैसला हुआ है। यह एक सोचा समझा फैसला है, जो देश के पिछड़े, दलित, आदिवासी और वंचित समूहों के उत्थान के लिए   प्रधानमंत्री  की प्रतिबद्धता और उनके संकल्प को प्रतीकित करता है।सर्वप्रथम इस बात पर विचार करें कि इस निर्णय की क्या आवश्यकता थी। वास्तविकता यह है कि दशकों तक देश में सरकार चलाने वाली विपक्षी पार्टी ने इस आवश्यकता की अनदेखी की थी। ध्यान रहे जितने आवश्यक कार्यों की अनदेखी विपक्षी सरकारों ने की है उनको पूरा करने की ऐतिहासिक भूमिका    प्रधानमंत्री   को निभानी है। चूंकि विपक्षी की सरकारों ने समय पर यह फैसला नहीं किया इसलिए सरकार ने आगे बढ़ कर यह फैसला किया है। सरकार पिछड़े और वंचित समूहों के उत्थान के लिए अनेक योजनाएं चला रही है लेकिन ज्यादातर योजनाओं को लेकर नीतियां अनुमानों के आधार पर बनी हैं। किसी को पता नहीं है कि वास्तव में किस जातीय समूह की कितनी आबादी है। न तो जातियों की वास्तविक संख्या पता है और न उनकी आर्थिक, सामाजिक स्थिति का पता है।कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2011 की जनगणना में सामाजिक, आर्थिक गणना के जरिए जातियों और उनकी आर्थिक स्थिति के आंकड़े जुटाए थे। लेकिन पता नहीं किस दबाव या किस तुष्टिकऱण की सोच में उसने आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए। आज कांग्रेस के शहजादे   राहुल गांधी पिछड़ी जातियों के हितों की बात कर रहे हैं लेकिन उनकी सरकार ने 2011 में जुटाए जातियों के आंकड़े क्यों नहीं सार्वजनिक किए या उन आंकड़ों के आधार पर नीतिगत फैसले क्यों नहीं किए इसका कोई जवाब उनके पास नहीं है। असल में यह कांग्रेस की सोच का दोहरापन है। आखिर कांग्रेस की सरकारों ने ही 10 साल तक मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू होने से रोके रखा और उसके बाद जब जाति गणना कराई तो उसके आंकड़े नहीं जारी ।जातियों के आंकड़े नहीं होने और आर्थिक स्थिति की ठोस जानकारी नहीं होने की वजह से सभी जातियों का आरक्षण अनुमानित आधार पर दिया गया है। अब जातिगण गणना होगी और सरकार के सामने वास्तविक आंकड़े होंगे तो उनके आधार पर आरक्षण का फैसला होगा। मिसाल के तौर पर अंग्रेजों के जमाने में 1931 में हुई जनगणना के मुताबिक बिहार में पिछड़ी जातियों की आबादी 52 फीसदी थी, लेकिन बिहार सरकार ने जनगणना कराई तो पिछड़ी जातियों की आबादी 63 फीसदी निकली। सौ साल पुराने आंकड़े और ताजा आंकड़े में 11 फीसदी का अंतर है। जाहिर है राष्ट्रीय स्तर पर भी अलग अलग जातियों की संख्या में अंतर होगा। संख्या कम हुई होगी या ज्यादा हुई होगी। अगर वास्तविक आंकड़ा सामने होगा तो उस आधार पर आरक्षण दिया जाएगा। ऐसे ही आरक्षण के प्रावधान में क्रीमी लेयर का प्रावधान किया गया है।यह सीमा तय की गई है कि आठ लाख रुपए से ज्यादा की सालाना आय वाली पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। यह सीमा पिछड़ी जातियों की आर्थिक स्थिति के वास्तविक आंकड़ों के बगैर तय की गई है। अब सामाजिक, आर्थिक गणना में उनकी आर्थिक स्थिति की वास्तविकता सामने आएगी तो उस आधार पर क्रीमी लेयर की सीमा भी तय होगी। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ पिछड़ी या दलित जातियों के लिए होगा, बल्कि सामान्य वर्ग की जातियों को भी 10 फीसदी आरक्षण मिल रहा है। उनके लिए भी आठ लाख रुपए की सालाना आय की सीमा तय की गई है। उनकी आबादी और उनकी आर्थिक स्थिति के आंकड़े सामने आएंगे तो आरक्षण का प्रतिशत और क्रीमी लेयर के बारे में फैसला वैज्ञानिक तरीके से किया जा सकेगा।जातिगत जनगणना से जाति की संख्या और उसकी आर्थिक स्थिति की जानकारी तो मिलेगी ही साथ ही यह भी पता चलेगा कि अभी तक की आरक्षण की व्यवस्था का लाभ किन जातियों को कितना मिला है। उन आंकड़ों के आधार पर यह पता चल पाएगा कि कौन सी जाति आरक्षण की व्यवस्था से ज्यादा सशक्त हुई है और कौन सी जातियां आरक्षण की व्यवस्था का लाभ लेने से वंचित रह गई हैं। वास्तविक आंकड़ों के आधार पर ज्यादा जरूरतमंदों के लिए अतिरिक्त आरक्षण की व्यवस्था की जा सकेगी।    प्रधानमंत्री   नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना विधानसभा चुनाव के दौरान अनुसूचित जाति के आरक्षण में वर्गीकरण का वादा किया था। इस वादे को पूरा करने का काम भी शुरू हो गया है।इससे उन जातियों की पहचान होगी, जिनको आरक्षण की ज्यादा जरुरत है। चूंकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आंकड़े हर जनगणना में जुटाए जाते हैं इसलिए उनके वर्गीकरण का एक ठोस आधार है। कांग्रेस की सरकारों की अनदेखी के कारण पिछड़ी जातियों के बारे में ऐसी कोई ठोस जानकारी नहीं है। जातिगत गणना के आंकड़े आने के बाद सरकार अपेक्षाकृत ज्यादा कमजोर जातियों को सशक्त बनाने का फैसला वैज्ञानिक तरीके से कर पाएगी। इसलिए यह समझ लेने की जरुरत है कि यह कोई मामूली फैसला नहीं है। यह बहुत बड़ा, ऐतिहासिक, दूरदर्शी और देश के करोड़ों करोड़ लोगों के जीवन में गुणात्मक परिवर्तन लाने वाला निर्णय है।प्रधानमंत्री ने यह निर्णय किया है तो निश्चित रूप से इसके सभी पहलुओं और आयामों पर विचार करने के उपरांत ही यह निर्णय किया है। उनकी सोच के अनुरूप इस निर्णय के अनुपालन से देश में बहुत सी चीजें बदल सकती हैं। सरकार अगली जनगणना के साथ ही जातियों की गिनती भी कराएगी। उसके साथ ही वर्षों से लंबित राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनआरसी की परियोजना को भी लागू कर देना चाहिए। जब सरकारी कर्मचारी नागरिकों की गिनती करेंगे, उनकी जाति व धर्म पूछेंगे, उनके रोजगार, काम धंधे, संपत्ति की जानकारी जुटाएंगे, उनके घरों की गिनती करेंगे तो साथ साथ कुछ और जानकारी जुटाई जा सकती है।उनके और उनके पूर्वजों के जन्मस्थान की जानकारी भी पूछी जा सकती है ताकि देश के अलग अलग हिस्सों में रह रहे बाहरी नागरिकों की पहचान की जा सके। ध्यान रहे यह भारत की एक बड़ी समस्या है। जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद जब पाकिस्तानी नागरिकों की पहचान शुरू की गई है तो पता चल रहा है कि हजारों विदेशी लोग किसी न किसी तरीके से भारत में रह रहे हैं। अगली जनगणना में पाकिस्तानियों के साथ साथ बांग्लादेश और म्यांमार के घुसपैठियों की भी पहचान सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि उन्हें देश से निकाला जा सके। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे प्राथमिक आवश्यकता है। इसके साथ ही सरकार सबकी पहचान के लिए एक नागरिकता नंबर का नियम भी बना सकती है। आधार, पैन और इपिक यानी वोटर आई कार्ड के अलग अलग नंबर की जगह एक नंबर नागरिकों को दिया जाना चाहिए और उसके साथ उसकी पूरी बायोमीट्रिक डिटेल्स होनी चाहिए। ऐसा कर दिया गया तो देश के अंदर के तमाम स्लीपर सेल्स को खत्म किया जा सकेगा और देश की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।जहां तक राजनीति की बात है तो वह इस निर्णय की प्राथमिकता नहीं है। यह अलग बात है कि तमाम विपक्षी पार्टियां इसे राजनीतिक नजरिए से ही देख रही हैं क्योंकि उनकी आदत है हर चीज में राजनीति करने की। वे देश की सुरक्षा के मामले में जब राजनीति कर सकते हैं तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है! जातिगत गणना को राजनीति के नजरिए से देखने वालों को शायद पता नहीं है कि मतदान के दौरान देश की पिछड़ी जातियों की पहली पसंद भाजपा ही है। पिछले लोकसभा चुनाव में यानी 2024 में भाजपा को पिछड़ी जाति के 43 फीसदी मतदाताओं ने वोट किया, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 19 फीसदी ओबीसी वोट मिला। देश की 43 फीसदी पिछड़ी आबादी ने भाजपा को इसलिए वोट दिया क्योंकि उनको नरेंद्र मोदी पर भरोसा है कि वे उनके उत्थान में प्राण पण से जुटे हैं। उन्होंने ऐसे काम किए, जो आजादी के बाद सात दशक में नहीं हुए थे। प्रधानमंत्री ने पिछड़ी जाति आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया। सबसे बड़ी संख्या में पिछड़ी जातियों के मंत्री बनाए। सैनिक स्कूलों में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराया और यहां तक की मेडिकल के दाखिले के लिए होने वाली नीट की परीक्षा में केंद्र सरकार का जो कोटा होता है उसमें भी ओबीसी आरक्षण का प्रावधान किया। ये ऐसे काम हैं, जिनका लाभ पिछड़ी जातियों को मिल रहा है। इसलिए वे भाजपा के साथ जुड़ रही हैं। दूसरी ओर कांग्रेस हो या दूसरी प्रादेशिक पार्टियां वे एक परिवार की बेहतरी के लिए काम कर रही हैं। तभी पिछड़ी जातियों का उनके ऊपर भरोसा नहीं बन रहा है। उत्तराखंड में भी चुनाव में क्षेत्रीयवाद और जातिवाद का काफी बड़ा रोल रहता है। टिकट बंटवारे से लेकर वोटिंग तक इन मुद्दों पर कई बार सीधे तौर पर बहस होती नजर आती है। जाति डेटा संग्रह करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उन समुदायों और जातियों के कल्याण के लिए हो, जो पिछड़े हैं और जिन्हें विशेष ध्यान देने की जरूरत है।उन्होंने कहा था, “यह डेटा पहले भी एकत्रित किया जाता रहा है, लेकिन इसका उपयोग केवल उन समुदायों के कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि चुनावी राजनीतिक हथियार के रूप में। राजनीति का नहीं! कमाल है, ‘हिंदू एकता’ को समाज का नहीं, राजनीति का विषय मानने वाले जाति आधारित अन्याय से मुक्ति को राजनीति का नहीं, समाज का विषय बताते थकते नहीं!  ‘समता’ के बिना ‘समरसता’ की बात करते हैं। ‘समानता’ का रास्ता काफी लंबा बताते हैं, संसाधनिक वितरण में संतुलन की चिंता किये बिना ‘सामाजिक समरसता’ के लिए सामाजिक संरचना को समझने की बात बहुत ‘कोमल वाणी’ पेश करते हैं।कहना जरूरी है कि जातिवार जनगणना का समर्थन और वर्ण-व्यवस्था आधारित आचरण को हिंदू धर्म के नाम पर अपनाने का विरोध भारत में लोकतंत्र के होने की अनिवार्य शर्त है। चुनावी हार-जीत अपनी जगह लेकिन सामाजिक समता हो या समरसता सुनिश्चित करने के लिए संसाधनिक वितरण में संतुलन का सवाल भारत के लोकतंत्र की पहली राजनीतिक जरूरत है।. *लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

Share23SendTweet15
Previous Post

उर्गम में आयोजित किया गया मौन पालन प्रशिक्षण

Next Post

उत्तराखंड का सपना सौर ऊर्जा आर्थिक मोर्चे पर कमजोरी बनी मुसीबत

Related Posts

उत्तराखंड

स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत’ अभियान चलाने की जरूरत : सुरक्षित दूध से वैज्ञानिक उत्तराखंड की ओर प्रतिबंध से आगे बढ़कर वैज्ञानिक दुग्ध सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता

August 9, 2026
13
उत्तराखंड

भारत विकास परिषद कोटद्वार द्वारा बेटी पढ़ाओ, बेटी बसाओं के तहत आर्थिक रुप से कमजोर 25 छात्राओं की वार्षिक फीस की जमा

August 8, 2026
36
उत्तराखंड

रोटरी क्लब कोटद्वार के तत्वावधान में जागरूकता शिविर का आयोजन

August 8, 2026
22
उत्तराखंड

ग्वालदम में जंगली जानवर का मांस बताक़र कुत्ते का मांस बेचने की एक अफवाह पूरे क्षेत्र में फैली

August 8, 2026
699
उत्तराखंड

डोईवाला: छात्र-छात्राओं को बांटी निःशुल्क नोटबुक

August 8, 2026
30
अल्मोड़ा

जनभावनाओं के अनुरूप उच्च न्यायालय और स्थायी राजधानी गैरसैंण में स्थापित की जाए: उपपा

August 8, 2026
9

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67718 shares
    Share 27087 Tweet 16930
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45787 shares
    Share 18315 Tweet 11447
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38074 shares
    Share 15230 Tweet 9519
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37453 shares
    Share 14981 Tweet 9363
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37374 shares
    Share 14950 Tweet 9344

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत’ अभियान चलाने की जरूरत : सुरक्षित दूध से वैज्ञानिक उत्तराखंड की ओर प्रतिबंध से आगे बढ़कर वैज्ञानिक दुग्ध सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता

August 9, 2026

भारत विकास परिषद कोटद्वार द्वारा बेटी पढ़ाओ, बेटी बसाओं के तहत आर्थिक रुप से कमजोर 25 छात्राओं की वार्षिक फीस की जमा

August 8, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.