डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की देवभूमि इस समय एक बड़ी समस्या से गुजर रही है. एक तरफ पर्यटन के लिए सड़कों का जाल बिछाने का विकास मॉडल है, तो दूसरी तरफ हिमालय के अस्तित्व को बचाने की पर्यावरण की पुकार. गंगोत्री से लेकर चमोली और देहरादून तक हजारों पेड़ों के कटान ने स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है. उत्तराखंड में लगातार मानसून सीजन में पहाड़ धड़कते रहे हैं. राज्य में कई ऐसी बड़ी घटनाएं घटी हैं, जिन्होंने यह साबित किया है कि पहाड़ों से छेड़छाड़ ठीक नहीं है. ये उस धरती में हो रहा है, जिसमें चिपको आंदोलन चलाया गया था. चिपको की धरती में सत्तर के दशक में रेणी की महिलाओं ने पर्यावरण को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी थी, जिसके बाद विश्व भर में गौरा देवी ने प्रसिद्धि प्राप्त की थी. गौरा देवी की प्रेरणा से आज भी चमोली में समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर हलचल देखी जा सकती है. वनों में हर वर्ष लगने वाली आग वन्यजीवों एवं पर्यावरण के लिए खतरा बनती जा रही है. विभाग वनों की आग को रोकने में पूरी तरह से फेल नजर आता है. पर्यावरण को नुकसान के साथ लाखों प्रजाति के पेड़-पौधे वन्य जीवों को जीवन खतरे में है. जंगलों का कटान हिमालय की सेहत के लिए ठीक नही है .उत्तराखंड में हजारों पेड़ों को कटवाने के लिए इन दिनों खुद वन विभाग कसरत में जुटा है. स्थिति ये है कि अलग-अलग डिवीजन में पेड़ों का चिह्नीकरण या तो हो चुका है या फिर तेजी से इस पर काम चल रहा है. खास बात ये है कि प्रदेशभर में करीब एक लाख से ज्यादा पेड़ों को कटवाने की जरूरत महसूस हो रही है, जिसमें से 70 हजार पेड़ तो चिह्नित भी हो चुके हैं.उत्तराखंड के हरे-भरे जंगल एक बार फिर बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़े हैं. प्रदेशभर में हजारों पेड़ों को काटने की तैयारी चल रही है. सबसे बड़ी बात ये है कि यह काम किसी सड़क, बांध या विकास परियोजना के लिए नहीं, बल्कि खुद जंगलों को बचाने के नाम पर किया जा रहा है. वन विभाग इन दिनों प्रदेश के अलग-अलग वन प्रभागों में फायर लाइन तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों का चिह्नीकरण कर रहा है. हालात ये हैं कि प्रदेशभर में करीब एक लाख से ज्यादा पेड़ों को हटाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जिनमें से करीब 70 हजार पेड़ों का चिह्नीकरण किया जा चुका है. यह पूरा मामला अब पर्यावरण संरक्षण और वन सुरक्षा के बीच संतुलन की बड़ी बहस बनता जा रहा है. एक ओर वन विभाग इसे जंगलों को वनाग्नि से बचाने के लिए जरूरी कदम बता रहा है, तो वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविद् सवाल उठा रहे हैं कि क्या हरे-भरे पेड़ों की कटाई ही एकमात्र विकल्प है.दरअसल, उत्तराखंड के जंगल हर साल भीषण वनाग्नि की चपेट में आते हैं. गर्मियों के मौसम में सूखी घास, चीड़ की पत्तियां और बढ़ता तापमान जंगलों को आग के लिए बेहद संवेदनशील बना देता है. पिछले कुछ सालों में राज्य में वनाग्नि की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. इन्हीं घटनाओं ने वन विभाग को पुराने सिस्टम यानी फायर लाइन व्यवस्था को फिर से मजबूत करने के लिए मजबूर किया है. असल समस्या तब शुरू हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने 1000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले वन क्षेत्रों में हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी. इस फैसले का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों के पर्यावरण और जैव विविधता की रक्षा करना था, लेकिन इसका एक दूसरा असर भी सामने आया. जिन क्षेत्रों में पहले फायर लाइन बनाई गई थी, वहां समय के साथ बड़े-बड़े पेड़ और घनी वनस्पति उग आई. धीरे-धीरे फायर लाइन का अस्तित्व लगभग खत्म हो गया. ऐसी स्थिति में जब जंगलों में आग लगती थी, तो उसे रोकने के लिए कोई प्राकृतिक अवरोध नहीं बचता था. नतीजा ये हुआ कि आग तेजी से बड़े क्षेत्रों में फैलने लगी और वन विभाग को उसे नियंत्रित करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं और उसके गंभीर प्रभावों को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया. सरकार ने दलील दी कि फायर लाइन के रखरखाव के बिना जंगलों को आग से बचाना बेहद मुश्किल हो गया है. इसके बाद साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में राहत देते हुए फायर लाइन क्षेत्र में आवश्यक पेड़ों की कटाई की अनुमति दे दी. सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद वन विभाग ने राज्यभर में व्यापक सर्वे शुरू किया. अलग-अलग वन प्रभागों में यह देखा गया कि फायर लाइन क्षेत्रों में कितने पेड़ आ चुके हैं और किन क्षेत्रों में तत्काल सफाई की जरूरत है? सर्वे के बाद अब पेड़ों की कटाई की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा रहा है.वन विभाग का दावा है कि यह कदम जंगलों को बचाने के लिए उठाया जा रहा है, क्योंकि यदि फायर लाइन साफ नहीं की गई तो आने वाले सालों में वनाग्नि और ज्यादा भयावह रूप ले सकती है. विभाग के मुताबिक, प्राथमिकता उन क्षेत्रों को दी जा रही है, जो वनाग्नि की दृष्टि से सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं. सूबे के कई प्रमुख वन प्रभाग इस अभियान के दायरे में हैं. हल्द्वानी, नैनीताल और रामनगर डिवीजन में ही करीबन 40 हजार पेड़ों को हटाने की प्रक्रिया चल रही है. इसी तरह भागीरथी सर्कल के नरेंद्र नगर और उत्तरकाशी डिवीजन में भी 20 हजार से ज्यादा पेड़ों को चिह्नित किया गया है. इसके अलावा आसपास के कई अन्य डिवीजनों में भी हजारों पेड़ इस सूची में शामिल हैं. हालांकि, यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है. कई वन क्षेत्र ऐसे हैं, जो वन्यजीव संवेदनशील जोन या संरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत आते हैं. ऐसे क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई के लिए केवल राज्य सरकार की अनुमति पर्याप्त नहीं है. इसके लिए भारत सरकार और केंद्रीय वन्यजीव बोर्ड से भी अनुमति लेनी पड़ती है. लिहाजा, वन विभाग इन औपचारिकताओं को पूरा करने में जुटा हुआ है. वन विभाग ये भी तर्क दे रहा है कि फायर लाइन केवल पेड़ों को काटने का नाम नहीं है, बल्कि यह जंगलों की दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है. विभाग के मुताबिक, यदि आग पर शुरुआती स्तर पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो लाखों पेड़, वन्यजीव और जैव विविधता खतरे में पड़ सकते हैं. ऐसे में सीमित क्षेत्र में पेड़ों की कटाई करके बड़े जंगलों को बचाया जा सकता है. यदि मौजूदा वनाग्नि के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल स्थिति पहले की तुलना में कुछ बेहतर दिखाई दे रही है. लगातार बारिश और वन विभाग की तैयारी के कारण आग की घटनाओं में कमी आई है. अब तक राज्य में करीब 270 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिनमें करीबन 220 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है. पिछले सालों की तुलना में यह आंकड़ा कम माना जा रहा है और वन विभाग इसे अपनी तैयारी का सकारात्मक परिणाम बता रहा है, लेकिन इस पूरी कवायद ने पर्यावरणविदों और बुद्धिजीवियों की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं. उनका कहना है कि फायर लाइन के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई भविष्य में पर्यावरणीय असंतुलन पैदा कर सकती है. दरअसल, उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि यहां की जलवायु, जलस्रोत, पर्यटन और स्थानीय लोगों की आजीविका का आधार भी हैं. ऐसे में हजारों पेड़ों की कटाई का निर्णय स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है. जबकि, पूरी दुनिया इस वक्त ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रहा है. साथ ही पर्यावरण भी असंतुलित हो रहा है. उत्तराखंड वन विभाग जहां पौधारोपण को लेकर सालभर में कई अभियान चलाता है. इसके अलावा अवैध रूप से पेड़ों को काटने से रोकने के लिए विशेष निगरानी का दावा भी करता है, लेकिन इन सब के बावजूद राज्य में अवैध रूप से पेड़ काटे जाने के मामले बेहद ज्यादा नजर आते हैं. पेड़ों के काटने जाने के मामले में सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हैं, जिसकी गवाही खुद वन विभाग दे रहा है. जबकि, जिन पेड़ों की जानकारी वन विभाग को ही नहीं, ऐसे भी कई मामले होने की प्रबल संभावना है.हमें परिस्थितियों से सबक लेते हुए पर्यावरण संरक्षण की ओर ध्यान देना चाहिए. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











