डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला बेडू पाको बारो मासा नरण काफल पाको चैता मेरी छे ला” अगर आपने कभी पहाड़ी लोक गीतों के बारे सुना है तो ये गाना भी जरूर सुना होगा। हर पहाड़ी की जुबान पर रहने वाले इस लोकगीत में जिस फल का जिक्र हो रहा है क्या आप जानते हैं कि ये कौन सा फल है? अगर नहीं जानते तो हम आपको बता देते हैं। इस फल का नाम ‘काफल’ है। जो उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में पाया जाता है। ये फल बेहद स्वादिष्ट और गुणों से भरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस फल को चखने के बाद स्वाद के दीवाने हो गएपहाड़ों में फलों के राजा से नाम से प्रसिद्ध जंगलों का खट्टा-मीठा रसीला फल काफल बाजार में आ चुका हैं. यह पहाड़ी फल कई औषधीय गुणों से युक्त है. इस वक्त बाजार में काफल करीब 300 से 400 रुपए प्रति किलो बिक रहा है. यहां तक कहा जाता है कि इसके सेवन से स्ट्रोक और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है.काफल हिमलायी क्षेत्र में पाया जाने वाला खास तरह का फल है. फरवरी में काफल के पेड़ पर फूल आने शुरू हो जाते है. शुरू में काफल का रंग हरा होता है अप्रैल के आखिर तक ये लाल हो जाता है. काफल देवदार व बांच के पेड़ों के बीच उगता है. नैनीताल जिले के आमतौर पर कपाल के पेड़ आमपड़ाव, बसगांव, चोपड़ा, बलियाखान, कूड़, खुरपाताल और भवाली क्षेत्र मिलते है. कफाल पहाड़ में काफी सीमित मात्रा में उगता है, इसीलिए ये स्थानीय बाजार या मंडी में ही बिक पाता है.रसीले, खट्टे और मीठे स्वाद से भरपूर काफल का स्वाद जंगलों की आग ने कम कर दिया है। बैशाख माह में पकने वाला काफल बाजार में विशेष पहुंच रखता है। जिससे स्थानीय ग्रामीणों जंगलों की आग आर्थिकी भी जुड़ी हुई है। काफल तीन महीने तक स्थानीय बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार का भी साधन बनता है। इसके पेड़ ठंडी जलवायु में पाए जाते हैं। इसका लुभावना गुठली युक्त फल गुच्छों में लगता है। प्रारंभिक अवस्था में इसका रंग हरा होता है और अप्रैल माह के आखिर में यह फल पककर तैयार हो जाता है, तब इसका रंग बेहद लाल हो जाता है। तराई क्षेत्र में गर्मी शुरू होते ही पर्यटकों का रुख पहाड़ की ओर है । सैलानी यहां पहाड़ की सुरीली हवा और रसीले काफल का स्वाद ले रहे हैं। चार सौ रुपये प्रति किलो तक काफल बिक रहा है। निवासी ने कहा कि वह काफल बेचकर दस से बीस हजार रुपये तक कमाई करते थे। लेकिन जंगलों में आग लगने से काफल खराब हुआ है। काफल का वानस्पतिक नाम मेरिका एस्कुलाटा है। यह मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाला सदाबहार वृक्ष है। गर्मी के मौसम में काफल के पेड़ पर अति स्वादिष्ट फल लगता है, जो देखने में शहतूत की तरह लगता है।1300 मीटर से 2100 मीटर (4000 फीट से 6000 फीट) तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पैदा होता है। यह स्वाद में खट्टा-मीठा मिश्रण लिए होता है। काफल के कई फायदे हैं यह कई रोगों में फायदेमंद है।काफल को लेकर पहाड़ के लोकगीत भी हैं। प्रसिद्ध रंगकर्मी मोहन उप्रेती रचित बेडु पाको बार मासा, नरेन काफल पाको चेत मेरी छैला, आज भी हर पहाड़ के लोग गनगुनाते रहते हैं। काफल के अनेक औषधीय गुण हैं. यह फल अपने आप में एक जड़ी-बूटी है. चरक संहिता में भी इसके अनेक गुणकारी लाभों के बारे में वर्णन किया गया है. काफल के छाल, फल, बीज और फूल सभी का इस्तेमाल आयुर्विज्ञान में किया जाता है. कफाल का वैज्ञानिक नाम माइरिका एसकुलेंटा है. कफाल में एंटी-आक्सीडेंट काफी मात्रा में पाया जाता है, जो पेट से संबंधित बीमारियों के लिए काफी लाभदायक है. डॉक्टर अक्सर काफल खाने की सलाह देते है. यहीं कारण है कि उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में हर साल लोगों काफल का बेसब्री से इंतजार करते हैं. बाजार में इस समय मौसमी फल छाए हुए हैं, मगर बात चाहे स्वाद व पसंद की हो या फिर कीमत की, पर्वतीय क्षेत्र से आने वाले काफल, आड़ू, पुलम, खुबानी आदि फल अन्य फलों पर हावी हैं। काफल की कीमत ने तो सभी फलों को पीछे छोड़ दिया है। काफल आम से पांच गुना ज्यादा कीमत पर बिक रहा है। काफल से महंगा बाजार में कोई फल नहीं है। इसकी डिमांड भी सबसे ज्यादा है। आम जहां 60 से 80 रुपये किलो तक बिक रहा है, वहीं काफल 400 रुपये किलो तक बिक रहा है। आड़ू, पुलम, खुमानी के रेट भी 100 रुपये से नीचे नहीं हैं। काफल हल्द्वानी मंडी में नहीं आता, यह फुटपाथों पर ही बिकता है। महिला अस्पताल के सामने फुटपाथ काफल बेचने वाले का कहना है कि एक दिन में करीब 10 किलो तक बिक जाता है। पहाड़ से खरीदकर वह काफल बेचने आते हैं। जंगल से कई काफल के पेड़ जल भी चुके हैं। पहाड़ों में इन दिनों सड़क किनारे टोकरी में भरकर काफल बेचते बच्चे, बूढ़े, युवा और महिलाएं आसनी से नजर आ जाते हैं. वह प्रतिदिन 800 से 1200 रुपये के बीच कमा लेते हैं. इसी से उनके परिवार की इन दिनों आजीविका चल रही है. जबकि राज्य में आने वाले पर्यटकों के बीच भी यह फल बेहद लोकप्रिय है.माना जाता है कि इसके सेवन से स्ट्रोक और कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है. एंटी-ऑक्सीडेंट तत्व हाेने के कारण इसे खाने से पेट संबंधित रोगों से भी निजात मिलती है. गर्मियां आते ही काफल स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का साधन भी बनता है. स्थानीय लोग काफल को पेड़ से तोड़कर मंडी तक लाते हैं और मंडी में इस फल को बेचते हैं, जिससे किसानों को इससे लाभ होता है. प्रारंभिक अवस्था में इसका रंग हरा होता है और अप्रैल माह के आखिर में यह फल पककर तैयार हो जाता है. तब इसका रंग बेहद लाल हो जाता है काफल आम फलों की तरह नहीं है। क्योंकि ये पूरे साल नहीं मिलता है। सिर्फ कुछ महीने ही इस फल का स्वाद चख सकते हैं। काफल दुर्लभ फलों की श्रेणी में आता है। यह साल में सिर्फ दो महीने ही मिलता है। इस फल के पेड़ को कहीं भी नहीं लगाया जा सकता। यह पहाड़ों और जंगलों में अपने आप उगते हैं और वहां के लोगों के जीवन में मिठास भर देता है। कुमांऊ आर्मी की बैंड की धुनों में सुमार बेडू पाको बार मासा… ओ नारायण काफल पाको चैता मेरी छेला की धुनों को जहां अक्सर सुना जा सकता है. वहीं, चम्पावत जिले के जंगलों में लगे काफल के फल अब बाजर में बिकने को आ गए हैं. हालांकि, बारिश कम होने का असर जहां काफल के फल को भी पड़ा है. वहीं, स्थानीय लोगों के साथ बहार से आने वाले सैलानी भी काफल का स्वाद चख रहे हैं और अपने घरों को ले जा रहे हैं. पहाड़ी फल काफल ने जहां आजकल बाजारों की रौनक बढ़ाई है. वहीं, स्थानीय लोगों को भी इस से रोजगार मिला है, जिसके चलते काफल का फल बाजार में दो सौ रुपए किलो बिक रहा है और स्थानीय लोग काफल बेच कर अपने परिवार को पाल रहे है. फिलहाल पहाड़ के कटते जंगलों से ने जहां काफल की पैदावर में असर डाला है. वहीं, स्थानीय लोगों को दो महीने के रोजगार भी अवसर दिया है. अब जरूरत है की वन विभाग काफल के पेड़ो के संरक्षण कोई कदम उठाएं.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











