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उत्तराखंड मूल के हिन्दी साधक कैलाश चन्द्र पन्त को मिला पद्म पुरस्कार

25/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
कैलाश चन्द्र पन्त का जन्म 26 अप्रैल 1936 को महू में हुआ. माता श्रीमती हरिप्रिया पन्त और पिता स्व. लीलाधर पन्त थे. पैतृक गांव उत्तराखंड का खन्तोली है. शिक्षा: प्राथमिक- पब्लिक बॉयज प्राइमरी स्कूल, महू; मैट्रिक के.बी.ई.पी. मेमोरियल हाईस्कूल, महू; एम.ए. (हिन्दी) – क्रिश्चियन कॉलेज, इंदौर; साहित्याचार्य. भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है, जिसमें मध्य प्रदेश के प्रमुख हिन्दी-साहित्यकार, पत्रकार और हिन्दी सेवी कैलाश चन्द्र पन्त को पद्म श्री से सम्मानित किया गया है. 89 वर्षीय पन्त जी हिन्दी भाषा, साहित्य और राष्ट्रभाषा प्रचार के क्षेत्र में दशकों से अथक योगदान दे रहे हैं.  उनका जन्म 26 अप्रैल 1936 को मध्य प्रदेश के महू (इंदौर के पास) में हुआ था, जबकि पैतृक गांव उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का खन्तोली है. उन्होंने नौकरी छोड़कर स्वतंत्र प्रेस स्थापित की और साप्ताहिक ‘जनधर्म’ का 22 वर्षों तक नियमित प्रकाशन किया, जो सामाजिक जागरण का माध्यम बना.पद्म श्री प्राप्ति से पन्त जी उन ‘अनसंग हीरोज’ में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने साहित्य, शिक्षा और सामाजिक कार्य में योगदान दिया. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के राष्ट्रीय संयोजक के रूप में वे अभी भी सक्रिय हैं. यह सम्मान हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार और साहित्यिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देता है. पन्त जी की उपलब्धियां मध्य प्रदेश और उत्तराखंड दोनों राज्यों के लिए गौरव की बात हैं, जहां वे ‘मालवांचल में कूर्मांचल’ जैसे ग्रंथों से जुड़े हैं.पन्त जी का जीवन प्रेरणादायक है, क्योंकि उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर स्वतंत्र पत्रकारिता चुनी और हिन्दी को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया. ‘स्वाध्याय विद्यापीठ’ की स्थापना से शिक्षा क्षेत्र में योगदान दिया, जबकि भोपाल में किसान भवन और हिन्दी भवन के विकास से सांस्कृतिक केंद्र मजबूत किए. पद्म पुरस्कार 2026 की सूची में उनका नाम ‘अनसंग हीरोज’ कैटेगरी में शामिल है, जो स्वास्थ्य, कला, साहित्य और सामाजिक कार्य में योगदान देने वालों को सम्मानित करती है. पंत जी सजग और दायित्वप्रवण पत्रकार के रूप में बहुत जल्द ही अपनी पहचान बना चुके थे। क्या ‘जनधर्म’ नामक साप्ताहिक की सुदीर्घ कार्यशीलता से और क्या अक्षरा के प्रधान संपादक की हैसियत से। पत्रकारिता हमारा क्षेत्र नहीं है, किन्तु समझदार और संवेदनशील पत्रकारिता क्या होती है, क्या होनी चाहिए इसका पर्याप्त पुष्ट प्रमाण उनका विशाल पाठक वर्ग उनके संपादकीयों से, लेखों से निरंतर पाता रहा होगा। मिसाल के तौर पर मात्र अक्षरा के एक अंक का सम्पादकीय ही देख लें; जिसकी शुरुआत ही यों होती है: ”देश में जिस प्रकार के नित्य नये रहस्योद्घाटन हो रहे हैं, भ्रष्टाचार तथा अपराधों के समाचार बढ़ रहे हैं, और उसके बाद भी बुनियादी चिंताओं के प्रति नागरिकों में व्याप्त उदासीनता क्या हमें एक जनतांत्रिक देश का नागरिक कहलाने का नैतिक अधिकार देती है?” महू में ‘स्वाध्याय विद्यापीठ’ की स्थापना, शिक्षा प्रसार के लिए.22 वर्षों तक साप्ताहिक ‘जनधर्म’ का नियमित प्रकाशन, स्वतंत्र पत्रकारिता का प्रतीक.भोपाल में किसान भवन निर्माण और हिन्दी भवन का विकास, सांस्कृतिक केंद्र मजबूत.पुस्तकें: ‘कौन किसका आदमी’ और ‘धुंध के आर पार’ का प्रकाशन.20 मई 1995 को भोपाल में नागरिक अभिनंदन, 1.61 लाख रुपये भेंट.‘मालवांचल में कूर्मांचल’ अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशन.राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सहायक मंत्री और राष्ट्रीय संयोजक.‘हम भारतीय’ अभियान के राष्ट्रीय संयोजक. साधारण भारतीयों के असाधारण योगदान का सम्मान करने के सिद्धांत को जारी रखते हुए, इस साल के पद्म पुरस्कार भारत के कोने-कोने से कई अनजाने नायकों को पहचान देते हैं। हर पुरस्कार विजेता शांत, पक्की सेवा का प्रतिनिधित्व करता है जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती है, फिर भी एक स्थायी बदलाव लाती है।कई लोगों ने बहुत ज्यादा निजी मुश्किलों और दुखों का सामना किया है, न सिर्फ अपने चुने हुए क्षेत्रों में बेहतरीन प्रदर्शन करने के लिए, बल्कि आगे बढ़कर पूरे समाज की सेवा करने के लिए भी। इनमें हाशिये पर पड़े पिछड़े और दलित समुदायों, आदिम जनजातियों और दूरदराज और मुश्किल इलाकों से आने वाले लोग शामिल हैं। ज्यादातर लोग इस मामले में चूकते ही नजर आते हैं, उनका जजमेंट विश्वसनीय नहीं होता, क्योंकि वह उनके ईगो की पल-पल बदलती रंगतों के अनुसार रंग पकड़ता है : न कि जो वास्तविक मानुषी सत्ता सामने है, उसके यथावत् साक्षात्कार से। यह ईगो प्राब्लम हमारे पढ़े-लिखे और सत्ताधारी समाज की बहुत बड़ी कमजोरी है, लगभग लाईलाज व्याधि जिसके दुष्परिणाम क्या शिक्षाजगत, क्या विद्वतजगत और क्या साहित्यिक परिवेश सब जगह उजागर है। ईगो भला किसमें नहीं होता? बिना ईगो के तो हम खड़े ही नहीं हो सकते। समस्या एक परिपक्व अहम विकसित करने की होती है। जो यथास्थान स्वयं को स्थगित और विसर्जित भी करने में सहज सक्षम हो। जिसमें दूसरे के दूसरेपन का भी यथावत अनुभव और आकलन शामिल हो। पंत जी का लोकसंग्रही व्यक्तित्व इस माने में बड़ा सजग संवेदनशील रहा है, उनके क्रियाकलाप, उनकी उपलब्धियां उसी से प्रेरित और संभव हुई हैं, यह देख पाना उन्हें करीब से जानने वालों के लिए तो सजग है ही, सामान्य जानकारों के लिए भी कठिन होना चाहिए। कहना न होगा कि उनकी भावी गतिविधियों के, भावी प्रवृतियों के और भावी सफलताओं के भी पर्याप्त लक्षण उनके उन आरंभिक दिनों में प्रगट हो चुके थे, ऐसा मुझे प्रथम दृष्टि से देखने पर स्पष्ट प्रतीत होता है।पंत जी सजग और दायित्वप्रवण पत्रकार के रूप में बहुत जल्द ही अपनी पहचान बना चुके थे। किंतु समझदार और संवेदनशील पत्रकारिता क्या होती है, क्या होनी चाहिए इसका पर्याप्त पुष्ट प्रमाण उनका विशाल पाठक वर्ग उनके संपादकीयों से, लेखों से निरंतर पाता रहा होगा। ।पंत जी के का सभी लोहा मानते हैं। जितनी गतिविधियां आज उनके द्वारा पोषित – संचालित हिंदी भवन में चल रही है, किसी को भी चकरा देने वाली है। उनका साहित्यानुराग इन गतिविधियों से प्रमाणित होता है। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। देश की महत्वपूर्ण मीडिया पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ अक्षरा के यशस्वी संपादन के लिए अखिलभारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत कर रही है। इस अवसर उन्हें बहुत-बहुत शुभकामनाएं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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