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इस साल भी कैलाश मानसरोवर यात्रा के आयोजन पर संशय

13/03/21
in उत्तराखंड, दुनिया
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पिछ्ले साल तक इस प्रसिद्ध ओम पर्वत के दर्शन के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रियों को नजंग से मालपा, बूंदी, गर्बयांग होते हुये 69 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई को पार कर नाभीढांग पहुंचना पड़ता था। मगर अब चीन सीमा से सटे लिपुलेख तक सड़क बनने के बाद यहां का सफर और आसान हो गया है। आध्यात्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम होने के कारण अब इस पूरे इलाके को विश्व पर्यटन के मानचित्र में स्थापित करने की मांग उठने लगी है। कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग में नाभीढांग से नेपाल की ओर दिखायी देने वाले इस ओम पर्वत के दर्शन का मौका आज तक गिने चुने लोगों को ही मिल पाया है।

दरअसल, उच्च हिमालयी क्षेत्र में मौजूद ओम पर्वत आमतौर पर बादलों से घिरा रहता है। मौसम साफ होने पर ओम पर्वत दिखाई देता है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में इस बार अधिक बर्फबारी होने के कारण गर्मियों के सीजन में भी ये इलाका पूरी तरह बर्फ से ढका हुआ है। 4,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नाभिढांग में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण सांस का फूलना एक आम बात है। मगर नाभीढांग पहुंचकर ओम पर्वत के दुर्लभ दीदार की जो अनुभूति है, उसे शब्दों में बयां कर पाना काफी मुश्किल है। चारों ओर बर्फ से आच्छादित हिमालय की श्रृंखलाओं के बीच ओम पर्वत का आकर्षण देखते ही बनता है। इसे कुदरत का करिश्मा ही कहा जायेगा कि तीन देशों की सीमाओं पर स्थित होने के बावजूद सिर्फ भारत से ही ओम पर्वत का ये अद्भुत नजारा दिखायी पड़ता है। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले हर एक तीर्थयात्री का सपना होता है कि वो नाभीढांग से दिखायी देने वाले ओम पर्वत के दर्शन कर पाये। कैलाश मानसरोवर यात्री यहां ओम का जाप करते हुये भगवान शिव को अपनी अंतरात्मा का समर्पण करते हैं। दरअसल, नाभीढांग से नजर आने वाला ये पूरा इलाका दैवीय अनुभूति का आभास कराता है।

यहां जर्रे.जर्रे में भगवान शिव मौजूद हैं। ओम पर्वत के ठीक बायीं ओर भारतीय भू.भाग में एक ऐसा हिमाच्छादित पर्वत है जहां भगवान शिव की आकृति हूबहू दिखायी पड़ती है। इसी पर्वत के दूसरी ओर बर्फ से बनी माता पार्वती की आकृति का भी आभास होता है। ओम पर्वत प्रकृति का एक ऐसा रहस्य है जो किसी ईश्वरीय चमत्कार से कम नहीं है। विश्व के गिने.चुने प्राकृतिक अजूबों में से ओम पर्वत भी एक है। हिमालय में ओम पर्वत का विशेष स्थान है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार ये पर्वत भगवान शिव का सबसे पसंदीदा स्थान है। हर श्रद्धालु के मन में ये इच्छा जरूर होती है कि वो जीवन में एक बार प्रसिद्ध ओम पर्वत के दीदार कर पाये। चीन सीमा से सटे लिपुलेख तक सीधी रोड कनेक्टिविटी के बाद अब इस पर्वत के दर्शन तीर्थयात्रियों के लिए आसान हो गये हैं। लिपुलेख सड़क बनने के बाद उम्मीद की जा रही है कि ओम पर्वत अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के मानचित्र में एक नया मुकाम हासिल करेगा। कैलाश पर्वत पर साक्षात भगवान शंकर विराजे हैं, जिसके ऊपर स्वर्ग और नीचे मृत्यलोक है, इसकी बाहरी परिधि 52 किमी है। मानसरोवर पहाड़ों से घिरी झील है जो पुराणों में क्षीर सागर के नाम से वर्णित है। क्षीर सागर कैलाश से 40 किमी की दूरी पर है व इसी में शेष शैय्या पर विष्णु व लक्ष्मी विराजित हो, पूरे संसार को संचालित कर रहे हैं। यह क्षीर सागर विष्णु का अस्थाई निवास है।

कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है। इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। बौद्ध धर्मावलंबियों अनुसार, इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं। मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार सूर्य के समान है। दूसरा, यहां पर लगभग 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र, 84 किलोमीटर परिधि तथा 150 फुट गहरी राक्षस नामक झील, जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के समान है। ये दोनों झीलें सौर और चन्द्र बल को प्रदर्शित करती हैं जिसका संबंध सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से है। जब दक्षिण से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिह्न वास्तव में देखा जा सकता है। इन दो सरोवरों के उत्तर में कैलाश पर्वत है। इसके दक्षिण में गुरला पर्वतमाला और गुरला शिखर है।

मानसरोवर के कारण कुमाऊं की धरती पुराणों में उत्तराखंड के नाम से जानी जाती हैं। लिपुलेख दर्रे से होकर की जाने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को प्रशासन, कुमाऊं मंडल विकास निगम, पुलिस एवं आईटीबीपी ने अत्यधिक दुर्गम और चुनौतीपूर्ण की श्रेणी में रखा है। दिल्ली से लिपुलेख तक 696 किलोमीटर की इस यात्रा में कई प्रकार के अवरोध आते रहते हैं। अभी यात्रा ठीक मानसून सीजन में होती है, इस कारण सड़क मार्ग के अलावा पैदल मार्गों पर हर समय खतरा बना रहता है। यात्रियों को 16730 फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रे को पार कर तिब्बत में प्रवेश करना पड़ता है। यह बात अलग है कि तिब्बत में कैलाश परिक्रमा क्षेत्र में यात्रियों को कम से कम आवागमन और संचार की दिक्कत पड़ता है विश्व प्रसिद्ध कैलाश मानसरोवर यात्रा के आयोजन पर इस साल भी संशय के बादल मंडरा रहे हैं। यात्रा को लेकर विदेश मंत्रालय की ओर से आयोजित होने वाली जरूरी बैठक के बाबत अभी कोई सूचना नहीं है, जबकि हर साल यह बैठक जनवरी के अंतिम सप्ताह में होती थी।

यात्रा के आयोजन में इस बैठक की अहम भूमिका होती है। पिछले साल मानसरोवर यात्रा कोविड की वजह से संपन्न नहीं हो पाई थी। सैकड़ों यात्री भगवान शिव के धाम कैलाश के दर्शन करने के लिए जाते हैं। इस यात्रा के आयोजन में सरकार और प्रशासन को भी काफी तैयारी करनी पड़ती है। कुमाऊं से होने वाली यात्रा में कुमाऊं मंडल विकास निगम की अहम भूमिका रहती है। केएमवीएन के जीएम अशोक जोशी ने बताया कि जनवरी के अंतिम सप्ताह में हर साल कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू होने से पहले एक बैठक का आयोजन विदेश मंत्रालय करवाता था, जिसमें कुमाऊं मंडल विकास निगम केएमवीएन, आईटीबीपी और जिला प्रशासन पिथौरागढ़ के अधिकारी शामिल होते थे। इस बैठक में यात्रा के लिए तैयारियों की समीक्षा और रणनीति तय की जाती थी।

कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए यह बैठक बहुत अहम होती है क्योंकि एक तरह से यात्रा की तैयारी की शुरुआत भी इसी बैठक के साथ ही होती है। इसके बाद मार्च में जब बर्फ पिघलनी शुरू हो जाती है, तब यात्रा की तैयारियों में और तेजी आ जाती है। जरूरी बुनियादी सुधारों पर जोर दिया जाता है। केएमवीएन के अधिकारियों ने बताया कि इस बैठक की सूचना जनवरी के दूसरे सप्ताह तक आ जाती थी और जनवरी के अंत तक बैठक हो जाती थी। जून से यात्रा शुरू हो जाती थी। इस साल अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। हालांकि वह इससे ज्यादा कुछ कहने से बच रहे हैं। फिर भी इस बात के संकेत मिलते हैं कि इस साल कैलाश मानसरोवर यात्रा के आयोजन में एक बार फिर से संशय के बादल मंडरा रहे हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा रद्द होने से कुमाऊं मंडल विकास निगम को करोड़ों का घाटा हुआ है। कैलाश यात्रा केएमवीएन की आय का प्रमुख जरिया है। एक यात्री के एवज में निगम को फिलहाल 35 हजार का भुगतान किया जाता है। पिछले साल केएमवीएन ने 949 यात्रियों के जरिये 33215000 की आय अर्जित की थी। 2020 में अनुमान था कि 1000 यात्रियों को कुमाऊं के रास्ते कैलाश मानसरोवर भेजा जाएगा। इससे निगम को 3.50 करोड़ की आय होने की उम्मीद थी, लेकिन यात्रा का आयोजन हुआ ही नहीं।

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