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उत्तराखंड की कौणी विलुप्त होती फसल

12/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में काश्तकारों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए राज्य सरकार ने ‘मिलेट पॉलिसी’ के तहत मोटे अनाजों (मिलेट्स) की खेती को बढ़ावा देने की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है। इस नीति का उद्देश्य न केवल किसानों की आय में वृद्धि करना है, बल्कि उत्तराखंड के मोटे अनाजों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना भी है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के काश्तकारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए सरकार मिलेट पॉलिसी के तहत मोटा अनाज को बढ़ावा दे रही है. इसके लिए किसानों को मोटे अनाज उत्पादन के बीज और उर्वरक में 80 फीसदी अनुदान दे रही है. वहीं इसकी बुवाई को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को 4000 रुपये से 1500 प्रति हेक्टेयर धनराशि भी दे रही है जिससे कि किसान अधिक से अधिक मोटा अनाज उत्पादन कर सके.मोटे अनाजों को खाने के अपने फायदे हैं. सरकार भी मिलेट की खेती को लेकर किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. ऐसा ही एक दुलर्भ अनाज है फॉक्सटेल. फॉक्सटेल मिलेट को कौणी या फिर बाजरा के नाम से भी जाना जाता है. वैसे तो कर्नाटक में फॉक्सटेल मिलेट की पैदावार सबसे अधिक होती है. लेकिन उत्तराखंड में की जाने वाली कौणी यानी फॉक्सटेल मिलेट में अधिक पोषक तत्वों की मात्रा पाई जाती है. हालांकि पलायन व खेती से दूर होते किसानों की वजह से इसके उत्पादन में गिरावट आई है.फॉक्सटेल मिलेट (कौणी/बाजरा) दुनिया का सबसे पुराना मिलेट है. फॉक्सटेल मिलेट का रंग हरा होता है पकने पर यह पीला होता है. साथ ही यह स्वाद में हल्का मीठा होता है. इसे गेहूं, चावल के साथ खाया जा सकता है. इसके अलावा कौणी का भात व खीर भी उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में प्रचलित है. कौंणी में  विटामीन बी 12 सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है. उन्होंने बताया  कि अन्य किसी अनाज में विटामिन बी 12 इतनी मात्रा में नहीं मिलता है, इसके साथ कैल्शियम, प्रोटीन कंटेंट भी उच्च मात्रा में पाया जाता है. कौणी में पाये जाने वाले पोषक तत्वों के कारण यह हार्ट की हेल्थ के साथ मेमोरी ग्रोथ में भी कारगर है. कौणी में फाइबर की प्रचुर मात्रा पाई जाती है, ऐसे में अगर कौणी का भात खाया जाए तो शरीर से सारे विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं. मई-जून में अगर कौणी की फसल को लगाया जाता है तो अगस्त-सितंबर माह तक यह तैयार हो जाती है. उन्होंने बताया  कि उत्तराखंड में बारिश आधारित खेती होती है, लेकिन फॉक्सटेल मिलेट के लिए न अधिक पानी की आवश्यकता होती है, न ही अधिक तापमान की आवश्यकता होती है.ऐसे में कौणी की खेती उत्तराखंड के किसानों के लिए उपयुक्त है. साथ ही बाजार में महंगे दामों पर यह बिकती भी है. कौणी या फॉक्सटेल मिलेट देखने में बिल्कुल लोमड़ी की पूंछ की तरह लगती है. यही कारण है कि इसे फॉक्सटेल के रूप में जाना जाता हैं.उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में फॉक्सटेल की खेती विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है. ऐसे में अगर किसान फिर से शुरुआत कर फॉक्सटेल मिलेट की खेती करें तो यह फायदेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि उत्तराखंड होने वाले कौणी की पैदावार में हाई वैल्यू पोषक तत्व  पाये जाते हैं.  उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के काश्तकारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए सरकार मिलेट पॉलिसी के तहत मोटा अनाज को बढ़ावा दे रही है. इसके लिए किसानों को मोटे अनाज उत्पादन के बीज और उर्वरक में 80 फीसदी अनुदान दे रही है. वहीं इसकी बुवाई को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को 4000 रुपये से 1500 प्रति हेक्टेयर धनराशि भी दे रही है जिससे कि किसान अधिक से अधिक मोटा अनाज उत्पादन कर सके.  यहां उगाए जाने वाले पारंपरिक फसलों में पोषक तत्वों की भरमार है. यही कारण है कि पहाड़ के लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है. इन पारंपरिक अनाजों को स्थानीय लोक बोली में बारह नाजा अर्थात 12 प्रकार के अनाज के नाम से जाना जाता है. लेकिन बदलते वक्त के साथ पहाड़ के बारह नाजा की फसलें विलुप्त होती नजर आ रही है.पहाड़ के खेत खलिहानों में दम तोड़ते पहाड़ की पारंपरिक फसलों को संरक्षित करने की कवायद भले ही तेज हो गई हो. कौंणी के सेवन से यह खून में ग्लूकोज की मात्रा 70 प्रतिशत तक कम कर देता है। संभवतः इसीलिये पारम्परिक घरेलू नुस्खों में इसको तमाम व्याधियों में सेवन की बात कीजातीहै।कौणी में 9 प्रतिशत तक तेल की मात्रा भी पाई जाती है। विश्व के बहुत से देश इसी वजह से कौंणी को तिलहन के तौर पर भी उपयोग करते हैं। जिसकी वजह से विश्व के कई देशो में कौंणी से तेल का उत्पादन भी किया जाताहै।कौणी की पौष्टिकता और औषधीय उपयोगिता की वजह से विश्वभर में बेकरी उद्योग की पहली पसंद बनता जा रहा है। कौंणी से तैयार किये ब्रेड में अन्य अनाजों से तैयार किये ब्रेड से प्रोटीन की मात्रा 11.49 की अपेक्षा 12.67, वसा 6.53 की अपेक्षाकृत कम 4.70 तथा कुल मिनरल्स 1.06 की अपेक्षाकृत अधिक 1.43 तक पाये जाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन ने सन 2023 को मिलेट इयर मनाने की घोषणा की है। भारत सरकार के सुझाव पर यह कदम उठाया गया है। यूएन ने इसकी उपयोगिता, औषधीय गुणों और पौष्टिकता को देखते यह कदम उठायाहै।कितनी अजीब बात है कि पौष्टिकता और औषधीय गुणों के बावजूद कौंणी आज उत्तराखण्ड में विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुका है। विश्व और भारत के स्तर पर इसको लेकर किये जा रहे प्रयास कितने कारगर होंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है।पूरा विश्व मोटे अनाज वर्ष (मिलेट्स ईयर) के रूप में मना हो, लेकिन काश्तकार खासतौर पर पहाड़ी क्षेत्रों मे रहने वाले किसान इनकी खेती करने से कतरा रहे हैं. इसकी पीछे आधुनिक जीवन शैली की ओर आर्कषण व जंगली जानवरों का फसलों को नुकसान पहुंचाना माना जा रहा है.नई पीढी शहरी जनजीवन मे ढल रही है और खेत बंजर होते जा रहे है इससे प्रदेश मे न केवल खेती सिमट रही है. बल्कि इससे यहां की खास पहचान रही बारह नाजा यानि 12 प्रकार के अनाजों की पारंपरिक फसलों पर भी संकट गहरा रहा है. पर्वतीय क्षेत्रों में परंपरा के रूप मे खेती होती थी जिसमे 12 प्रकार के ऐसे अनाज जिन्हें भारत ही नहीं बल्कि बाहरी देश पोषक तत्वों के लिए बहुतायत मात्रा मे आयात करता है, ये अनाज अब खत्म होने की कगार पर है. आज भी ग्रामीण क्षेत्रों मे इन फसलों को उगाने वाले ग्रामीण इन फसलों के महत्व को भलीभातिं जानते हैं लेकिन नयी पीढ़ी के इन अनाजों का उपयोग न करने से अब ग्रामीण परिवेश में रह रहे लोग इनका उपभोग नहीं करते है. इन फसलों मे मंडवे की रोटी व झंगोरा की खीर से कई संस्थान अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं विदेश मे भी इसे लोग उत्तराखंड का गौरव मानने लगे हैं, लेकिन “कोदा-झंगोरा खाएंगे-उत्तराखंड बनाएंगे” जैसे नारों से बने पृथक राज्य उत्तराखंड मे अब यही फसलें अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है. कौणी पहाड़ी परंपरा तथा पूर्वजों से जुड़ा मोटा अनाज है, जो पौष्टिकता से भरपूर है. विलुप्त होते अनाजों का संरक्षण कर हरियाली वैली को मिलेट वैली के रूप में विकसित कर युवा बागवानों को जोड़कर स्वरोजगार की दिशा में भी कार्य योजना तैयार की जा रही है. कौणी सबसे पुरानी मिलेट है, जो अपनी पौष्टिकता के कारण हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था. बढ़ते पलायन और जलवायु परिवर्तन तथा नवीन बीजों के बढ़ते चलन ने लोगों को कौणी से दूर कर दिया था, जिस कारण कौणी विलुप्त हो गयी. ऐसे मे सरकार इस ओर ध्यान देते हुए तमाम योजनाएं चला रही है.. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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