डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
केदारनाथ यात्रा मार्ग पर घोड़े-खच्चरों की लीद के निस्तारण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. एक तरफ पतंजलि और पशुपालन विभाग आमने-सामने हैं, तो दूसरी तरफ पर्यटन विभाग के एक पायलट प्रोजेक्ट पर भी सवाल उठ रहे हैं. केदारनाथ पैदल मार्ग पर यात्रा सीजन में हर साल आठ से दस हजार घोड़े-खच्चर संचालित होते हैं. यात्रा सीजन में इनके गोबर का निस्तारण बड़ी चुनौती बन जाता है. यह गंदगी जहां पैदल यात्रियों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं, पर्यावरण के लिहाज से भी घातक है. एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार समेत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कई बार पत्र लिखा है कि घोड़े खच्चर के गोबर (लीद) से मंदाकिनी नदी प्रदूषित हो रही है. इससे जलीय जीवों को खतरा पैदा होने के साथ ही नदी की शुद्वता भी प्रभावित हो रही है. इसी समस्या के समाधान के लिए वर्ष 2024 में पशुपालन विभाग ने पतंजलि के साथ अनुबंध किया. पतंजलि तब से अपने संसाधनों से लीद का निस्तारण कर रहा था. केदारनाथ यात्रा मार्ग पर घोड़े-खच्चरों की लीद के निस्तारण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. एक तरफ पतंजलि और पशुपालन विभाग आमने-सामने हैं, तो दूसरी तरफ पर्यटन विभाग के एक पायलट प्रोजेक्ट पर भी सवाल उठ रहे हैं. केदारनाथ पैदल मार्ग पर यात्रा सीजन में हर साल आठ से दस हजार घोड़े-खच्चर संचालित होते हैं. यात्रा सीजन में इनके गोबर का निस्तारण बड़ी चुनौती बन जाता है. यह गंदगी जहां पैदल यात्रियों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं, पर्यावरण के लिहाज से भी घातक है. एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार समेत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कई बार पत्र लिखा है कि घोड़े खच्चर के गोबर (लीद) से मंदाकिनी नदी प्रदूषित हो रही है. इससे जलीय जीवों को खतरा पैदा होने के साथ ही नदी की शुद्वता भी प्रभावित हो रही है. इसी समस्या के समाधान के लिए वर्ष 2024 में पशुपालन विभाग ने पतंजलि के साथ अनुबंध किया. पतंजलि तब से अपने संसाधनों से लीद का निस्तारण कर रहा था. अप्रैल 2026 में पशुपालन विभाग ने लापरवाही और प्लांट बंद होने का हवाला देते हुए यह अनुबंध समाप्त कर दिया. इसके जवाब में पतंजलि ने विभाग को कानूनी नोटिस भेज दिया है. नोटिस में दावा किया गया है कि संस्था इस परियोजना पर अब तक करीब 40 लाख रुपये खर्च कर चुकी है और बिना पक्ष सुने अनुबंध समाप्त करना नियमों और अनुबंध की शर्तों के खिलाफ है. पतंजलि ने अनुबंध बहाल नहीं होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है. इससे अब पशुपालन विभाग पसोपेश में है क्योंकि उसने अनुबंध की शर्तों के अनुसार दूसरे पक्ष को सुनने के लिए या काम में सुधार के लिए 90 दिन के समय का भी इंतजार नहीं किया. पशुपालन मंत्री का कहना है कि पतंजलि का अनुबंध समाप्त होने और नोटिस देने का मामला उनके संज्ञान में नहीं था. इस पूरे मामले को दिखवाया जा रहा है. अप्रैल 2026 में पशुपालन विभाग ने लापरवाही और प्लांट बंद होने का हवाला देते हुए यह अनुबंध समाप्त कर दिया. इसके जवाब में पतंजलि ने विभाग को कानूनी नोटिस भेज दिया है. नोटिस में दावा किया गया है कि संस्था इस परियोजना पर अब तक करीब 40 लाख रुपये खर्च कर चुकी है और बिना पक्ष सुने अनुबंध समाप्त करना नियमों और अनुबंध की शर्तों के खिलाफ है. पतंजलि ने अनुबंध बहाल नहीं होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है. इससे अब पशुपालन विभाग पसोपेश में है क्योंकि उसने अनुबंध की शर्तों के अनुसार दूसरे पक्ष को सुनने के लिए या काम में सुधार के लिए 90 दिन के समय का भी इंतजार नहीं किया. पशुपालन मंत्री का कहना है कि पतंजलि का अनुबंध समाप्त होने और नोटिस देने का मामला उनके संज्ञान में नहीं था. इस पूरे मामले को दिखवाया जा रहा है. मामले में नया मोड़ तब आया जब यह सामने आया कि पशुपालन विभाग द्वारा अनुबंध समाप्त करने से पहले ही पर्यटन विभाग ने फरवरी 2026 में लीद और पिरुल से पेलेट बनाने का एक पायलट प्रोजेक्ट हाईफीड नामक संस्था को सौंप दिया था. बताया गया कि इस प्रोजेक्ट का उदेश्य घोड़े-खच्चरों की लीद और पिरुल से ईंधन पेलेट तैयार करना था, जिन्हें जलाकर यात्रा मार्ग पर श्रद्धालुओं और पशुओं के लिए गर्म पानी उपलब्ध कराया जाना था. हालांकि परियोजना को लेकर बड़े दावे किए गए, लेकिन अब तक यह धरातल पर उतरती नजर नहीं आई. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस काम को पतंजलि बिना सरकारी खर्च के कर रही थी, उसी लीद के निस्तारण और उपयोग के लिए पर्यटन विभाग ने हाईफीड को करीब डेढ़ करोड़ रुपये जारी कर दिए. इसके बावजूद परियोजना शुरू नहीं हो पाई. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब नई व्यवस्था तैयार ही नहीं थी, तो पहले से काम कर रही संस्था का अनुबंध समाप्त करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? क्या विभागों के बीच समन्वय की कमी थी या फिर इसके पीछे कोई और वजह है? हाईफीड संस्था के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर कमल बहुगुणा का कहना है कि संस्था ने प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है. अभी केवल तीन व्वायलर जिनमें से एक लिंचोली और दो केदारनाथ में लगाए जाने हैं, उनका काम शेष है. पतंजलि के कानूनी नोटिस और करोड़ों रुपये के पायलट प्रोजेक्ट पर उठ रहे सवालों ने केदारनाथ यात्रा मार्ग पर लीद निस्तारण के पूरे मॉडल को विवादों के केंद्र में ला दिया है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब नई व्यवस्था तैयार ही नहीं थी, तो पहले से काम कर रही संस्था का अनुबंध समाप्त करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? क्या विभागों के बीच समन्वय की कमी थी या फिर इसके पीछे कोई और वजह है? हाईफीड संस्था के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर कमल बहुगुणा का कहना है कि संस्था ने प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है. अभी केवल तीन व्वायलर जिनमें से एक लिंचोली और दो केदारनाथ में लगाए जाने हैं, उनका काम शेष है. पतंजलि के कानूनी नोटिस और करोड़ों रुपये के पायलट प्रोजेक्ट पर उठ रहे सवालों ने केदारनाथ यात्रा मार्ग पर लीद निस्तारण के पूरे मॉडल को विवादों के केंद्र में ला दिया है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











