डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
किसी दिन आप रुद्रप्रयाग के बुग्यालों में ट्रैकिंग करने जाएं और आपको वहां बिना पूंछ वाला चूहा दिख जाए तो आप क्या करेंगे? यकीन मानिए आप चिल्लाए बिना नहीं रहेंगे और उस चूहे को देखते ही रह जाएंगे. बुग्यालों में जैव विविधता को बनाये रखने में इस छोटे हिमालयन पिका की महत्वपूर्ण भूमिका है. वहां के इको सिस्टम का यह अभिन्न अंग है. लेकिन, टूरिस्टों की लापरवाही के चलते हिमालयन पिका के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है.दरअसल, केदारनाथ यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से गंदगी भी फैलने लगी है. तीर्थयात्री धाम पहुंचने के बाद यहां-वहां कूड़ा-कचरा फेंक रहे हैं, जो भविष्य के लिए किसी खतरे से कम नहीं है. साल 2013 की केदारनाथ आपदा आज भी सभी को याद है. जिस कारण हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और सैकड़ों लोग बेघर हो गये थे. बावजूद इसके अभी भी सबक नहीं लिया जा रहा है, जो चिंता का विषय है. किसी दिन आप रुद्रप्रयाग के बुग्यालों में ट्रैकिंग करने जाएं और आपको वहां बिना पूंछ वाला चूहा दिख जाए तो आप क्या करेंगे? यकीन मानिए आप चिल्लाए बिना नहीं रहेंगे और उस चूहे को देखते ही रह जाएंगे. बुग्यालों में जैव विविधता को बनाये रखने में इस छोटे हिमालयन पिका की महत्वपूर्ण भूमिका है. वहां के इको सिस्टम का यह अभिन्न अंग है. लेकिन, टूरिस्टों की लापरवाही के चलते हिमालयन पिका के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है.दरअसल, केदारनाथ यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से गंदगी भी फैलने लगी है. तीर्थयात्री धाम पहुंचने के बाद यहां-वहां कूड़ा-कचरा फेंक रहे हैं, जो भविष्य के लिए किसी खतरे से कम नहीं है. साल 2013 की केदारनाथ आपदा आज भी सभी को याद है. जिस कारण हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और सैकड़ों लोग बेघर हो गये थे. बावजूद इसके अभी भी सबक नहीं लिया जा रहा है, जो चिंता का विषय है. किसी दिन आप रुद्रप्रयाग के बुग्यालों में ट्रैकिंग करने जाएं और आपको वहां बिना पूंछ वाला चूहा दिख जाए तो आप क्या करेंगे? यकीन मानिए आप चिल्लाए बिना नहीं रहेंगे और उस चूहे को देखते ही रह जाएंगे. बुग्यालों में जैव विविधता को बनाये रखने में इस छोटे हिमालयन पिका की महत्वपूर्ण भूमिका है. वहां के इको सिस्टम का यह अभिन्न अंग है. लेकिन, टूरिस्टों की लापरवाही के चलते हिमालयन पिका के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है.दरअसल, केदारनाथ यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से गंदगी भी फैलने लगी है. तीर्थयात्री धाम पहुंचने के बाद यहां-वहां कूड़ा-कचरा फेंक रहे हैं, जो भविष्य के लिए किसी खतरे से कम नहीं है. साल 2013 की केदारनाथ आपदा आज भी सभी को याद है. जिस कारण हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और सैकड़ों लोग बेघर हो गये थे. बावजूद इसके अभी भी सबक नहीं लिया जा रहा है, जो चिंता का विषय है. बाबा केदारनाथ के कपाट आम श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ के लिए खोल दिये गए. तब से लेकर अब तक बाबा के दरबार में दो लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंच चुके हैं. हर दिन हजारों की संख्या में केदारनाथ पहुंच रहे श्रद्धालु पैदल मार्ग से लेकर धाम तक चारों ओर फैले बुग्यालों में प्लास्टिक कचरा फेंक रहे हैं. जिसके कारण धाम की सुंदरता भी बदरंग होती जा रही है. प्लास्टिक कचरे को लेकर भी जिला प्रशासन कोई बड़ा कदम नहीं उठा रहा है. यह प्लास्टिक कचरा आपदा की दृष्टि से भी संवेदनशील है. प्लास्टिक कचरे के कारण इसके जीवन पर भी खतरा मंडरा रहा है. केदारनाथ धाम के बगल से मंदाकिनी नदी बह रही है. प्लास्टिक कचरे से नदी को भी भारी नुकसान पहुंचता है. यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्रियों को प्लास्टिक कचरे को अपने साथ वापस ले जाना चाहिए. अन्यथा इस प्लास्टिक कचरे के कारण भविष्य में बहुत बड़ी घटना हो सकती है. उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में फैले मखमली घास से लिपटे बुग्याल जो कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध थे, वह अब खतरे की जद में हैं. भारी संख्या में पहुंच रहे पर्यटक और बदलते जलवायु चक्र ने इन बुग्यालों की प्राकृतिक बनावट और पर्यावरणीय संतुलन को गहरा नुकसान पहुंचाया है. वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हिमालयी पारिस्थितिकी और औषधीय वनस्पतियां नष्ट हो सकती हैं.गौर हो कि तुंगनाथ धाम के साथ चंद्रशिला पहुंच रहे पर्यटक व ट्रेकर्स रास्ते भर में प्लास्टिक कचरा बिखेर रहे हैं. जो बुग्यालों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. यहां पाए जाने वाले जीव जंतुओ के अस्तित्व पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, ऐसे में वैज्ञानिक, पर्यावरणविद खासे चिंतित नजर आ रहे हैंउत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में फैले मखमली घास से लिपटे बुग्याल जो कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध थे, वह अब खतरे की जद में हैं. भारी संख्या में पहुंच रहे पर्यटक और बदलते जलवायु चक्र ने इन बुग्यालों की प्राकृतिक बनावट और पर्यावरणीय संतुलन को गहरा नुकसान पहुंचाया है. वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हिमालयी पारिस्थितिकी और औषधीय वनस्पतियां नष्ट हो सकती हैं.प्लास्टिक कचरा बन रहा चिंता का कारणगौर हो कि तुंगनाथ धाम के साथ चंद्रशिला पहुंच रहे पर्यटक व ट्रेकर्स रास्ते भर में प्लास्टिक कचरा बिखेर रहे हैं. जो बुग्यालों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. यहां पाए जाने वाले जीव जंतुओ के अस्तित्व पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, ऐसे में वैज्ञानिक, पर्यावरणविद खासे चिंतित नजर आ रहे हैं यहां हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु पहुंचते हैं. वन विभाग ने तारबाड़ और निगरानी की व्यवस्था की है, फिर भी पर्यटक शॉर्टकट रास्तों का इस्तेमाल कर बुग्यालों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. जहां कभी मखमली घास की हरियाली थी, वहां अब मिट्टी के रास्ते और कचरे के ढ़ेर नजर आने लगे हैं. यह ना सिर्फ सौंदर्य को बिगाड़ रहा है, बल्कि क्षेत्र की जैव विविधता और जलवायु संतुलन को भी प्रभावित कर रहा है. यहां हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु पहुंचते हैं. वन विभाग ने तारबाड़ और निगरानी की व्यवस्था की है, फिर भी पर्यटक शॉर्टकट रास्तों का इस्तेमाल कर बुग्यालों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. जहां कभी मखमली घास की हरियाली थी, वहां अब मिट्टी के रास्ते और कचरे के ढ़ेर नजर आने लगे हैं. यह ना सिर्फ सौंदर्य को बिगाड़ रहा है, बल्कि क्षेत्र की जैव विविधता और जलवायु संतुलन को भी प्रभावित कर रहा है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











