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कुप्रबंधन का शिकार हैं ‘कीड़ा जड़ी’ कई रोगों के लिए काल समान

10/07/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
हिमायल की ऊंचाई वाले इलाकों में कई बेशकीमती जड़ी बूटियां
मिलती हैं, जो किसी खजाने से कम नहीं हैं। इनमें से एक है यारसा गंबू,
जिसे कीड़ा जड़ी, कैटरपिलर फंगस और हिमायलन वियाग्रा भी कहते
हैं। यह एक मशरूम की तरह दिखती है। कीड़ा जड़ी एक कीड़े के अंदर
पाई जाती है, जो सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह जड़ी
बूटी काफी मंहगी होती है। यह जड़ी बूटी पीले कैटरपिलर और मशरूम
से मिलकर बनती है। यह जड़ी बूटी घोस्ट मॉथ लार्वा के सिर से
निकलता है, इसीलिए इसे कैटरपिलर फंगस कहते हैं। कहा जाता है कि
यह जड़ी बूटी ज्यादातर हिमालय के बर्फ वाले चरागाहों में पाई जाती
है। जैसे-जैसे बर्फ पिघलने लगती है ऊंचाई पर रहने वाले लोग कीड़ा
जड़ी की खोज में लग जाते हैं। यह जड़ी बूटी लगभग 3000 मीटर की
ऊंचाई पर पाई जाती है। यह जड़ी बूटी तब बनती है जब एक
कैटरपिलर किसी प्रकार की घास खाती है और उसकी मौत हो जाती है।
कैटरपिलर की मौत के बाद उसके अंदर एक जड़ी बूटी उगती है, जिसे
कीड़ा जड़ी कहते हैं।इस जड़ी बूटी का वैज्ञानिक नाम कॉर्डिसेप्स
साइनेसिस है। यह जड़ी बूटी जिस कीड़े पर उगती है उसका नाम
हैपिलस फैब्रिकस है। इसमे प्रोटीन, अमीनो एसिड, विटामिन बी-

1,विटामिन बी-2, विटामिन बी-3 और पेप्टाइड्स जैसे गुण होते हैं। ये
सारे पोषक तत्व शरीर को ताकत देते हैं। इस जड़ी बूटी का इस्तेमाल
ज्यादातर खिलाड़ी करते हैं। कीड़ा जड़ी में एंटी-कैंसर गुण होते हैं, जो
कोलन, फेफड़े, लीवर और त्वचा के कैंसर की कोशिकाओं को रोकने में
सक्षम होते हैं। इस जड़ी बूटी का इस्तेमाल कैंसर से बचाव के लिए भी
किया जाता है।कीड़ा जड़ी ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद
करता है। यह दिल के स्वास्थ को बेहतर करने में बेहद सहायक है। इसके
सेवन से तनाव और चिंता भी दूर होती है। जिन लोगों का इम्यून
सिस्टम काफी कमजोर है तो वे लोग कीड़ा जड़ी बूटी का सेवन कर
सकते हैं। कीड़ा जड़ी बूटी इम्यून सिस्टम को तेजी से बूस्ट करता है।
इसका इस्तेमाल सूजन को कम करने के लिए भी किया जाता है। यह
जड़ी बूटी अस्थमा के मरीजों के लिए वरदान से कम नहीं है।हिमालय के
ऊंचाई वाले इलाकों में मिलने वाली नायाब कीड़ाजड़ी (यारशागंबू) का
यहां भले ही कोई मोल न हो लेकिन विदेशी बाजार और खास कर चीन
में यह कीड़ाजड़ी 'बेशकीमती' है। चीन में इसका इस्तेमाल प्राकृतिक
स्टीरॉयड के तौर पर किया जा रहा है। अपनी कारामाती क्षमता के
कारण इस कीड़ाजड़ी का उपयोग शक्तिवर्धक के तौर पर तथा
खिलाड़ियों में क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है।यह जड़ी 3500
मीटर की ऊंचाई वाले इलाके में पाई जाती है।सामान्य तौर पर
कीड़ाजड़ी आधा कीड़ा और आधा जड़ होती है। यह एक कीड़े की
झिल्ली यानी कैटरपिलर्स को मारकर उस पर पनपता है। इस जड़ी का
वैज्ञानिक नाम कार्डिसेप्स साइनेसिस और जिस कीडे़ के कैटरपिलर्स पर
यह उगता है उसका नाम हैपिलस फैब्रिकस है। मई से जुलाई माह में
जब बर्फ पिघलती है तो इसके पनपने का चक्र भी तभी शुरू होता है।
कीड़ाजड़ी की तलाश करना भी आसान नहीं है। यह नरम घास के

बिल्कुल भीतर छुपा होता है और इसे तेज नजर वाला व्यक्ति ही
पहचान सकता है। उत्तराखंड के चमोली व धारचूला क्षेत्र में यह
बहुतायत में पाया जाता है। यहां कीड़ाजड़ी की खोज के लिए ग्रामीणों
के बीच संघर्ष की बातें भी विगत वर्षो में सामने आई है। यूं तो वन
विभाग भी ग्रामीणों से कीड़ाजड़ी को खरीदने का दावा करता है। मगर,
सरकारी कीमत के मुकाबले खुले बाजार से मिलने वाली कई गुनी
अधिक कीमत से कीड़ाजड़ी का गुपचुप कारोबार ज्यादा पनप रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली क्रीड़ा स्पर्धाओं के दौर में कीड़ा जड़ी
की अधिक मांग बढ़ जाती है। पूर्व में चीन में विजिंग ओलंपिक के बाद
चीन की महिला एथलीटों के रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन के बाद एक एथलीट
कोच ने इस बात को स्वीकार भी किया था कि उन्होंने अपने धावकों को
नियमित रूप से यारशागंबू का सेवन करवाया था। कीड़ाजड़ी में कई
पोषक तत्व पाए जाते हैं पिछले कुछ वर्षो में इसकी बढ़ती मांग के बाद
अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत में भी जबरदस्त इजाफा हुआ है।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में कीड़ाजड़ी यानी यारशागंबू के अंधाधुंध दोहन से
यहां का पारस्थितिकी तंत्र भी बिगड़ रहा है। उत्तराखंड के हिमालयी
क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर यारशागंबू का अवैध दोहन हो रहा है। लोग
इसके लिए खुदाई भी कर रहे हैं, जिससे आसपास की वनस्पति व जीवों
को नुकसान पहुंच रहा है। दवाइयों में उपयोग के लिए जरूरी हो तो
इसका नियंत्रित ढंग से दोहन किया जाए। यह भी चिंता का विषय है
कि कीड़ाजड़ी का बड़ा बाजार विदेशों में है और विदेशों में भी यह वन
संपदा अवैध ढंग से पहुंच रही है। उत्तराखंड सरकार की ओर से वर्ष
2018 में विस्तृत गाइडलाइन जारी की गई थी, जिसमें कीड़ा जड़ी की
तस्करी रोकने के साथ स्थानीय लोगों को स्वरोजगार से जोड़ने की
कार्ययोजना तैयार की गई थी. इसमें कीड़ा जड़ी के संग्रह, विदोहन और

रॉयल्टी को लेकर नियम बनाए गए थे. बावजूद इसके अब तक कीड़ा
जड़ी की तस्करी पर लगाम नहीं लग पाई है. दुनिया में अपने अद्भुत
फायदों के लिए जानी जाने वाली बेशकीमती कीड़ा जड़ी (यारसा गंबू)
के विदोहन का फायदा माफिया और कालाबाजारियों के बजाय
स्थानीय लोगों को मिले, इसके लिए सरकार की ओर से नए सिरे से
प्रयास शुरू किए गए हैं. इसके तहत उत्तराखंड में सेटेलाइट के माध्यम
से रिसोर्स मैपिंग और ग्राउंड सर्वे किया जाएगा, ताकि कीड़ा जड़ी के
क्षेत्र को सूचीबद्ध किया जा सके. अंतरराष्ट्रीय संघ आईयूसीएन ने इसे
संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में शामिल किया है. अंतरराष्ट्रीय
बाजार में कीड़ा जड़ी की कीमत लगभग 20 लाख रुपये प्रति किलोग्राम
है. हिमालयन वियाग्रा’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके
इस्तेमाल से नपुंसकता और लीवर की बीमारियों से लेकर कैंसर तक
का इलाज करने में मदद मिल सकती है। कीड़ा जड़ी संग्रहण, विदोहन
और रॉयल्टी के संबंध में वर्ष 2018 में एक जीओ जारी किया गया था,
लेकिन देखने में आ रहा है कि स्थानीय संग्रहणकर्ताओं को इसका उतना
लाभ नहीं मिल पा रहा है, जितना दूसरे लोग कमा रहे हैं. हमारा
उद्देश्य है कि माफिया और दूसरे खरीदारों के बजाय इसका लाभ
स्थानीय लोगों को मिले. इसके लिए कई प्रक्रियाओं में बदलाव के निर्देश
दिए गए हैं. पड़ोसी देश नेपाल और भूटान के उच्च हिमालयी इलाकों में
भी कीड़ाजड़ी का दोहन होता है। नेपाल में जहाँ यह यारसा गुम्बा के
नाम से जाना जाता है, दरअसल इसका दोहन भारत के पिथौरागढ़
जनपद में हो रहे दोहन से बहुत पहले आरम्भ हो चुका था। वहां हो रहे
अतिदोहन ने इसकी उत्पादकता को बुरी तरह प्रभावित किया,
परिणामस्वरूप गाँव के लोग के साथ साथ सरकार भी इसके सतत
दोहन के लिए दिशा-निर्देश और नीति बनाने को बाध्य हुई। भूटान में

यारसा गुम्बा के वर्तमान स्थिति और उत्पादन को लेकर कोई ठोस
आकड़े उपलब्ध नहीं हैं।हाँ यह अवश्य कहा जा सकता है कि चूँकि
भूटान में इसके दोहन का सिलसिला अभी नया-नया ही है तो वहां की
सरकार ने शुरुआत से ही एक बेहतर दोहन रणनीति बना डाली। भूटान
की सरकारी संस्थाओं ने सीधे  यार्त्सा गुंबू के खरीददारों के लिए
नीलामी प्रक्रिया को अत्यधिक सरल और सहज बनाने में अहम् भूमिका
निभाई है। इस फंगस की कीमत तकरीबन 8से10 लाख रुपये प्रति
किलोग्राम है। अंतरराष्ट्रीय मार्केट में इस बूटी की कीमत करीब
₹60लाख तक है । यह दुर्लभ औषधि वर्षों से दुनिया के तस्करों की
मुट्ठी में है। यह एक तरह की फफूंद है जो हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में पाई
जाती है। यह एक कीड़े पर हमला करती है और उसे चारों तरफ से
अपने आप में लपेट लेती है । यह जड़ी पहाड़ों के लगभग 3500 मीटर
की ऊंचाई वाले इलाकों में पाई जाती है । मई से जुलाई तक जब बर्फ
पिघलती है तो इसके पनपने का चक्र शुरू होता है । इस जड़ी की
उपयोगिता को देखकर कई स्थानीय लोग इसका दोहन और तस्करी
करते हैं । क्योंकि चीन में इसकी मुंह मांगी कीमत मिलती है। यह एक
नर्म घास के बिल्कुल अंदर छिपी होती है और बड़ी कठिनाई से ही से
पहचाना जा सकता है  कीड़ा जड़ी के अवैध व्यापार को लेकर तस्कर
माफिया और पुलिस का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा हो गया है। लोकल डीलर
कीड़ा जड़ी हिमालय के उच्च क्षेत्रों से जुटाकर दिल्ली सप्लाई करते हैं।
इंटरनेशनल तस्कर माफि या कीड़ा जड़ी को दुनियाभर में सप्लाई करता
है।यह नेटवर्क बेहद संगठित है। अगर नेटवर्क से बाहर का कोई व्यक्ति इस धंधे
में घुसता है तो तस्कर पुलिस को खबर कर देते हैं और उसे पकड़वा देते हैं।
स्थानीय स्तर पर यार्सागुम्बा की कीमत 9 लाख से 15 लाख रुपये किलो तक
पहुंच जाती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत दोगुनी है। बताया जा रहा

है कि इस वर्ष कीड़ा जड़ी बहुत कम मिल रही है, इसलिए कीमत भी ज्यादा
वसूली जा रही है।पर्यावरणविद् का कहना है कि यह जड़ी-बूटी का अवैध
खनन है, जिस तरह हाथी दांत और शेर के पंजों की तस्‍करी होती है
यार्सागुम्‍बा की तस्‍करी उसी तरह चल रही है। उन्‍होंने अरोप लगाया कि
कहीं न कहीं इस पूरे अवैध कारोबार में पुलिस-प्रशासन की भी मिलीभगत
है।  *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में*
*कार्यरत हैं।*

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