• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

उत्तराखंड में पहाड़ के खेतों से गायब हुई कौणी की परंपरागत खेती

14/09/25
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
31
SHARES
39
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter
https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
प्रदेश में न सिर्फ खेती सिमट रही, बल्कि पारंपरिक फसलों पर भी संकट गहरा रहा है। पहाड़ से चार पारंपरिक फसलों की छह प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं। उत्तराखंड सतत पर्वतीय विकास शिखर सम्मेलन में शिरकत करने आए बीज बचाओ आंदोलन के सूत्रधार ने यह खुलासा किया। इन फसलों में कौणी के अलावा गेहूं की मिश्री व मुंडरी और धान की रिख्वा व बंक्वा प्रजातियां हैं। उन्होंने कहा कि यदि पोषक तत्वों से भरपूर इन समेत अन्य फसलों के बीज बचाने पर ध्यान नहीं दिया गया तो इन्हें इतिहास के पन्नों पर सिमटते देर नहीं लगेगी। कौणी पहाड़ी परंपरा तथा पूर्वजों से जुड़ा मोटा अनाज है, जो पौष्टिकता से भरपूर है. विलुप्त होते अनाजों का संरक्षण कर हरियाली वैली को मिलेट वैली के रूप में विकसित कर युवा बागवानों को जोड़कर स्वरोजगार की दिशा में भी कार्य योजना तैयार की जा रही है. कौणी सबसे पुरानी मिलेट है, जो अपनी पौष्टिकता के कारण हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था. बढ़ते पलायन और जलवायु परिवर्तन तथा नवीन बीजों के बढ़ते चलन ने लोगों को कौणी से दूर कर दिया था, जिस कारण कौणी विलुप्त हो गयी. कंगनी यानी कौणी अनाज में फाइबर अधिक होने के कारण यह मधुमेह रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी है. कौणी अनाज या कंगनी का एक फायदा यह भी है कि यह अनाज खून में कोलेस्ट्रॉल लेबल कंट्रोल करता है. इसे 6 से 8 घंटे भिगा कर बनाकर छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भोजन में दिया जा सकता है. वजन कम करने में भी कंगनी अनाज सहायक है. कंगनी में पाए जाने वाले एंटीऑक्सिडेंट की वजह से यह कैंसर से लड़ने में सहायक है. पहाड़ी ढ़लानों पर सीढ़ीदार खेतों की मेडों पर लहराती कौंणी की फसल बला की खूबसूरत लगती है। सियार की सुनहरी पूंछ सी खेतों के किनारे हिलती-डुलती रहती है। कौणी विश्व की प्राचीनतम फसलों में से एक है। चीन में तो नवपाषाण काल में भी इसके उपयोग के अवशेष मिलते हैं।यह बाजारा की ही एक प्रजाति है। जिसे अंग्रेजी में फाॅक्सटेल मिलेट कहा जाता है। इसकी बाली को देखकर ही संभवतः इसे अंग्रेजी में यह नाम दिया गया हो। खेतों में जब यह पककर तैयार होती है तो किसी पूंछ की तरह कौंणी की पौध से लहराती रहती है।कौणी पोएसी परिवार का पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम सेतिरिया इटालिका है। इसको संस्कृत में कंगनी तो गुजराती में कांग नामों से जाना जाता है। यह भारत, रूस, चीन, अफ्रीका और अमेरिका आदि देशों में उगाया जाता है। विश्वभर में कौंणी की लगभग 100 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।कौंणी गर्म मौसम में उपजने वाली फसल है। इसलिये उत्तराखण्ड में इसकी खेती ज्यादातर धान के साथ ही की जाती है। इसको धान व झंगोरा के साथ खेतों में बोया जाता है। धान के खेतों के किनारे-किनारे कौणी और झंगोरा बोया जाता है। कोणी की जड़े काफी मजबूत और मिट्टी को बांधे रखती है इसलिये यह खेतों के किनारों को भी टूटने या मिटटी के बहने से रोकती है। इसकी कटाई सितम्बर-अक्टूबर में होती है।उतराखण्ड में इसको खीर व भात बनाकर खाया जाता है। कौणी की खीर और कौणी का खाजा-बुखणा किसी दौर में बहुत प्रचलित था। इसका खाजा कटाई के दौरान ही भूनकर तैयार किया जाता है। लेकिन विकास और आधुनिकता की दौड़ ने पहाड़ के रहवासियों ने इसको मुख्य खाने से किनारे कर लिया है।इसमें डाइबिटिज के रोगियों के लिये बहुत उपयुक्त माना जाता है। इस वजह से भी धीरे-धीरे बाजार में इसकी मांग बढ़ रही है। इसके बिस्कुट, लड्डू इडली-डोसा और मिठाइयां काफी पसंद की जा रही है। इसके अलावा ब्रेड, नूडल्स, चिप्स तथा बेबी फूड, बीयर, एल्कोहल तथा सिरका बनाने में भी प्रयुक्त किया जा रहा है।संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की सन् 1970 की रिपोर्ट तथा अन्य कई वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार कौंणी में क्रूड फाइबर, वसा, फाइवर, कार्बोहाईड्रेड के अलावा कुछ अमीनो अम्ल होने की वजह से आज विश्वभर में कई खाद्य उद्योगों में इसकी मांग हो रही है। सुगर के मरीजों के लिये यह वरदान जैसा है। इससे तमाम बिमारियों में होने वाली थकान से मुक्ति मिलती है। तंजानिया में तो एड्स रोगियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिये कौंणी से बनाये गये भोजन को परोसा जाता है।एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कौंणी के सेवन से यह खून में ग्लूकोज की मात्रा 70 प्रतिशत तक कम कर देता है। संभवतः इसीलिये पारम्परिक घरेलू नुस्खों में इसको तमाम व्याधियों में सेवन की बातकीजातीहै।कौणी में 9 प्रतिशत तक तेल की मात्रा भी पाई जाती है। विश्व के बहुत से देश इसी वजह से कौंणी को तिलहन के तौर पर भी उपयोग करते हैं। जिसकी वजह से विश्व के कई देशो में कौंणी से तेल का उत्पादन भी किया जाता है।कौणी की पौष्टिकता और औषधीय उपयोगिता की वजह से विश्वभर में बेकरी उद्योग की पहली पसंद बनता जा रहा है। कौंणी से तैयार किये ब्रेड में अन्य अनाजों से तैयार किये ब्रेड से प्रोटीन की मात्रा 11.49 की अपेक्षा 12.67, वसा 6.53 की अपेक्षाकृत कम 4.70 तथा कुल मिनरल्स 1.06 की अपेक्षाकृत अधिक 1.43 तक पाये जाते हैं।संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन ने सन 2023 को मिलेट इयर मनाने की घोषणा की है। भारत सरकार के सुझाव पर यह कदम उठाया गया है। यूएन ने इसकी उपयोगिता, औषधीय गुणों और पौष्टिकता को देखते यह कदम उठाया है।कितनी अजीब बात है कि पौष्टिकता और औषधीय गुणों के बावजूद कौंणी आज उत्तराखण्ड में विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुका है। विश्व और भारत के स्तर पर इसको लेकर किये जा रहे प्रयास कितने कारगर होंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है। सफलता की कहानियों के क्रम में एक ऐसे कहानी भी सामने आई हरियाली वैली में महत्वपूर्ण मोटा अनाज कौणी विलुप्ति के 12 साल बाद फिर से लहलहाने लगी है. क्षेत्र के एक युवा ने कौणी का उत्पादन कर मिसाल कायम की है. उन्होंने जंगली जानवरों के संघर्षों के बीच बड़ी मुश्किलों से कौणी की फसल को बचाया. कौणी की फसल को कई सालों बाद देख उनकी मां भी भावुक हो गयीं.  युवा कृषक गगन सिंह चौधरी ने अथक मेहनत से अपने खेतों में कौणी उगाकर इसके संरक्षण का जिम्मा उठाया है. वे पिछले दो वर्षों से पहाड़ की इस विलुप्त होती कौणी अनाज के संरक्षण को लेकर कार्य कर रहे थे. कृषक ने अपनी पारंपरिक तकनीकी से कौणी के बीज अपने खेतों में झंगोरा और कोदे के साथ बोए, जो बहुत अच्छी फसल के साथ उग आए. कृषक को लगभग 15 किलो कौणी के बीज प्राप्त हुए थे. उनको वे अगले वर्ष के लिए संरक्षित रखेंगे, जिससे वे अधिक मात्रा में कौणी की खेती कर पायेंगे. उनका कहना है कि जंगली जानवरों से संघर्षों के बीच बड़ी मुश्किल से कौणी की फसल को बचाया गया. कौणी की फसल को कई सालों बाद देख उनकी मां भी भावुक हो गयीं.  उन्होंने बताया कि कौणी पहाड़ी परंपरा तथा पूर्वजों से जुड़ा मोटा अनाज है, जो पौष्टिकता से भरपूर है. विलुप्त होते अनाजों का संरक्षण कर हरियाली वैली को मिलेट वैली के रूप में विकसित कर युवा बागवानों को जोड़कर स्वरोजगार की दिशा में भी कार्य योजना तैयार की जा रही है. कौणी सबसे पुरानी मिलेट है, जो अपनी पौष्टिकता के कारण हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था. बढ़ते पलायन और जलवायु परिवर्तन तथा नवीन बीजों के बढ़ते चलन ने लोगों को कौणी से दूर कर दिया था, जिस कारण कौणी विलुप्त हो गयी. सरकार और जिला प्रशासन को युवा कर्मठ बागवानों को सहयोग करना चाहिए, जिससे अन्य युवाओं को भी प्रेरणा मिलेगी और स्वरोजगार की दिशा में कौणी का उत्पादन कर ग्रामीण क्षेत्र की आजीविका को मजबूत किया जा सकता है. उत्तराखण्ड सरकार की ओर से फसलों की सुरक्षा के लिए स्थाई कदम उठाये गये तो आने वाले दिनों में स्थानीय व पारम्परिक फसलों के उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। हमें खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने के लिए कौणी की खेती पर ध्यान केंद्रित कर इसकी खेती पुनः शुरू करनी चाहिए। कौणी को बहुत कम पानी की जरूरत होती है, खराब मिट्टी पर अच्छी तरह से बढ़ता है, तेजी से बढ़ता है और बहुत कम बीमारियों से ग्रस्त होता है। एक बार कटाई के बाद इसे अनेकों वर्षों तक अच्छी तरह से भंडारित रखा जा सकता है। हम जलवायु परिवर्तन की स्थिति में स्थानीय महिलाओं व कास्तकार किसानों को सशक्त बनाने के लिए कौणी को उन्नत जैविक खेती के रूप में अपनाकर रोजगार सृजन भी कर सकते हैं।!. *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

Share12SendTweet8
Previous Post

सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज ज्योर्तिमठ में कक्षा दसवीं एवं बारहवीं बोर्ड परीक्षा के छात्र-छात्राओं की अभिभावक गोष्ठी विद्यालय सभागार में आयोजित

Next Post

पहाड़ की कृषि आर्थिकी को संवार सकता है कुट्टू

Related Posts

उत्तराखंड

पोस्टर प्रतियोगिता में शिखा एवं भाषण प्रतियोगिता भावना ने प्रथम स्थान प्राप्त किया

April 19, 2026
4
उत्तराखंड

स्कूली बच्चों ने नुक्कड़ नाटक के माध्यम से दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश

April 19, 2026
11
उत्तराखंड

कोठली में एक व्यक्ति की कथित हत्या के हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग को थाना थराली का घेराव

April 19, 2026
4
उत्तराखंड

गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खुले

April 19, 2026
6
उत्तराखंड

दुनिया के 7 देशों की राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी 64% तक

April 19, 2026
8
उत्तराखंड

केदारनाथ धाम मार्ग पर डेंजर जोन की निगरानी

April 19, 2026
6

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67671 shares
    Share 27068 Tweet 16918
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45776 shares
    Share 18310 Tweet 11444
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38050 shares
    Share 15220 Tweet 9513
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37438 shares
    Share 14975 Tweet 9360
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37329 shares
    Share 14932 Tweet 9332

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

पोस्टर प्रतियोगिता में शिखा एवं भाषण प्रतियोगिता भावना ने प्रथम स्थान प्राप्त किया

April 19, 2026

स्कूली बच्चों ने नुक्कड़ नाटक के माध्यम से दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश

April 19, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.