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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस शांति, स्वास्थ्य और एकता का वैश्विक महामंत्र

20/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को वैश्विक मान्यता दिलाने का पूरा श्रेय भारत के प्रधानमंत्री के विजन और भारत की मजबूत सांस्कृतिक कूटनीति को जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने पहली बार दुनिया के सामने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने वैश्विक नेताओं के सामने योग की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा था कि योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह मन और शरीर, विचार और कर्म, संयम और पूर्ति की एकात्मकता का प्रतीक है। यह मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला है। यह केवल व्यायाम नहीं है, बल्कि अपने आप में, दुनिया और प्रकृति के साथ एकात्मता की भावना को खोजने का माध्यम है। जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी यह हमारी जीवनशैली को बदलकर चेतना जागृत कर सकता है। आइए, हम एक अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस शुरू करने की दिशा में काम करें। भारत द्वारा रखे गए इस प्रस्ताव का दुनिया के देशों ने अभूतपूर्व स्वागत किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के तत्कालीन स्थायी प्रतिनिधि ने प्रस्ताव संख्या 69/131 पेश की। इस प्रस्ताव को रिकॉर्ड 175 देशों का सह-प्रायोजन प्राप्त हुआ। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में आज तक किसी भी सामान्य सभा के प्रस्ताव को इतने बड़े पैमाने पर देशों का समर्थन नहीं मिला था। बिना किसी मतदान के, सर्वसिद्ध रूप से इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और घोषणा की गई कि हर साल 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में महज 75 दिनों का समय लगा, जो संयुक्त राष्ट्र में अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इसी वजह से लगातार 12वें साल में प्रवेश कर चुका अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस अपनी चरम पर है। योग का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। भारतीय सनातन परंपरा में भगवान शिव को ‘आदिगुरु’ या ‘आदियोगी’ माना गया है। उन्होंने ही सबसे पहले हिमालय पर कांति सरोवर के तट पर अपने सात शिष्यों (सप्तऋषियों) को योग का गूढ़ ज्ञान दिया था। यही ज्ञान बाद में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैला। वेदों (विशेषकर ऋग्वेद) और उपनिषदों में योग का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है कि कर्मों में कुशलता ही योग है। योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘युज’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है-जुड़ना, एकत्र होना या मिलना। आध्यात्मिक स्तर पर इसका अर्थ जीवात्मा का परमात्मा से मिलन है, जबकि व्यावहारिक स्तर पर यह शरीर, मन और चेतना के बीच पूर्ण सामंजस्य स्थापित करने की कला है। यानी शरीर, मन और चेतना का पूर्ण संतुलन योग के माध्यम से ही है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए 21 जून की तारीख का चयन कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरा भौगोलिक और आध्यात्मिक महत्व है। ग्रीष्म संक्रांति जून उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन होता है। इस दिन सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सबसे लंबे समय तक रहती हैं। इसे ‘ग्रीष्म संक्रांति’ कहा जाता है। भारतीय खगोल विज्ञान और अध्यात्म के अनुसार, 21 जून के बाद सूर्य दक्षिणायन की ओर बढ़ने लगता है। दक्षिणायन के समय को आध्यात्मिक साधनाओं और आत्म-निरीक्षण के लिए बेहद अनुकूल माना जाता है। इसकी पृष्ठभूमि में यह भी मान्यता है कि ग्रीष्म संक्रांति के बाद आने वाले पहले चक्र (पूर्णिमा) पर ही आदिगुरु शिव ने सप्तऋषियों को योग की दीक्षा दी थी, जिसे ‘गुरु पूर्णिमा’ के रूप में भी मनाया जाता है। वहीं जिस प्रकार 21 जून का दिन साल का सबसे लंबा दिन होता है और सूर्य की ऊर्जा चरम पर होती है, उसी प्रकार योग भी मनुष्य को दीर्घायु और असीमित ऊर्जा प्रदान करता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को एक ‘विश्व गुरु’ और ‘वैश्विक कल्याणकर्ता’ के रूप में स्थापित किया है। योग ने भौगोलिक सीमाओं, धर्मों, जातियों और राजनीतिक विचारधाराओं की दीवारों को तोड़ दिया है। आज अमेरिकी राष्ट्रपति के व्हाइट हाउस से लेकर एफिल टॉवर (पेरिस) और चीन की महान दीवार तक, हर जगह योग दिवस पर लोग चटाइयां बिछाए नजर आते हैं। वैश्विक स्तर पर योग के प्रसार से भारत में वैलनेस टूरिज्म का तेजी से विकास हुआ है। ऋषिकेश, मैसूर, और केरल जैसे क्षेत्र वैश्विक योग हब बन चुके हैं। योग मैट, परिधानों और ऑर्गेनिक उत्पादों का वैश्विक बाजार अरबों डॉलर का हो चुका है। यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस ने योग को जन-आंदोलन बना दिया है, लेकिन अभी भी कुछ चुनौतियां मौजूद हैं। वैश्विक स्तर पर योग के कई विकृत रूप जैसे ‘हॉट योग’, ‘बीयर योग’ आदि सामने आए हैं। योग के मूल आध्यात्मिक और वैज्ञानिक स्वरूप को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। कई लोग योग को केवल 21 जून के एक दिन का उत्सव मान लेते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इसे ‘कैलेंडर इवेंट’ से निकालकर ‘डेली हैबिट’ (दैनिक आदत) बनाया जाए। भविष्य में योग को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम, कॉर्पोरेट कार्यसंस्कृति और सार्वजनिक  स्वास्थ्य नीतियों का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए ताकि एक  स्वस्थ और शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण हो सके। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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