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हरिद्वार में प्रस्तावित कुंभ मेले पर वन विभाग के सामने बड़ी परीक्षा?

23/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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‘डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
हरिद्वार में प्रस्तावित कुंभ मेले की तैयारियां पूरे जोर-शोर से चल रही हैं. राज्य सरकार इस आयोजन को भव्य, दिव्य और सुरक्षित बनाने के लिए हर स्तर पर व्यापक तैयारियों में जुटी हुई है. हालांकि इस बार राज्य में अर्धकुंभ प्रस्तावित है, लेकिन व्यवस्थाएं महाकुंभ के स्तर की की जा रही हैं. सरकार को उम्मीद है कि देश-दुनिया से करोड़ों श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचेंगे. ऐसे में सुरक्षा, यातायात, आवास और अन्य व्यवस्थाओं के साथ-साथ एक ऐसी चुनौती भी सामने है, जो न तो किसी निमंत्रण की मोहताज है और न ही किसी प्रशासनिक आदेश को मानती है. यह चुनौती है जंगलों से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने वाले हाथियों के झुंडों की. वन विभाग के सामने इस समय सबसे बड़ी चिंता उन गजराज गैंग को लेकर है, जो हरिद्वार डिवीजन और आसपास के क्षेत्रों में लगातार सक्रिय रहते हैं. इन हाथियों के कई समूह ऐसे हैं, जो जंगलों से निकलकर खेतों, गांवों और शहरों की ओर पहुंच जाते हैं. खास बात यह है कि इनमें कुछ हाथी इतने जिद्दी और आदतन हो चुके हैं कि उन्हें इंसानी आबादी और खेती वाले क्षेत्र जंगल से ज्यादा आकर्षित करते हैं.  वन विभाग ने ऐसे हाथियों को लेकर विशेष रणनीति तैयार की है. विभाग का मानना है कि हाथियों के इन समूहों को नियंत्रित करने के लिए उनके नेताओं यानी कमांडर हाथियों पर नजर रखना सबसे जरूरी है. यही वजह है कि इस बार वन विभाग की पूरी खाकी ब्रिगेड इन शैतान कमांडरों की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है, ताकि उनकी प्लानिंग को पहले ही विफल किया जा सके. हरिद्वार डिवीजन में रहने वाले लोगों के बीच एक हाथी खासा चर्चित है. स्थानीय लोग उसे एक दांत वाला हाथी कहकर पुकारते हैं. वन विभाग के रिकॉर्ड में भी यह हाथी बेहद शैतान माना जाता है. यह हाथी कई बार आबादी वाले क्षेत्रों में देखा गया है और इसकी गतिविधियों ने वन विभाग की चिंता बढ़ाई है. विभाग ने इस हाथी का चिन्हीकरण कर लिया है और इस पर विशेष निगरानी रखने की योजना बनाई है. अधिकारियों का मानना है कि यह हाथी न केवल अपने व्यवहार के कारण अलग पहचान रखता है, बल्कि कई बार मानव-हाथी संघर्ष की स्थितियां भी पैदा कर चुका है. यही कारण है कि कुंभ मेले से पहले इसे लेकर विशेष सतर्कता बरती जा रही है. अध्ययन के दौरान वन विभाग ने ऐसे चार प्रमुख गजराज गैंग की पहचान की है, जो सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण माने जा रहे हैं. ये हाथी समूह बेहद जिद्दी हैं और कई बार वन विभाग के प्रयासों के बावजूद अपने पारंपरिक मार्ग छोड़कर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं. अधिकारियों के अनुसार ये हाथी अब शहरों और गांवों के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि सप्ताह में कई बार जंगल से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों में घूमते हुए देखे जाते हैं. यही वजह है कि कुंभ जैसे विशाल आयोजन के दौरान इनकी गतिविधियां गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों के प्राकृतिक मार्गों में लगातार हस्तक्षेप होने के कारण उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में कठिनाई होती है. नतीजतन वे गांवों और कस्बों से होकर गुजरने को मजबूर हो जाते हैं. यही कारण है कि हरिद्वार डिवीजन को मानव-हाथी संघर्ष के लिहाज से राज्य के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है.. वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार प्रत्येक हाथी समूह में कुछ प्रमुख टस्कर हाथी होते हैं, जो पूरे झुंड का नेतृत्व करते हैं. विभाग ने ऐसे 8 टस्कर हाथियों की पहचान की है, जो अपने-अपने समूह के लीडर हैं. वन विभाग का मानना है कि यदि इन टस्कर हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखी जाए, तो पूरे समूह की गतिविधियों का आकलन किया जा सकता है. यही कारण है कि विभाग अब इन हाथियों के व्यवहार और आवाजाही के पैटर्न का अध्ययन कर रहा है.रिकॉर्ड के अनुसार श्यामपुर रेंज और झिलमिल झील के आसपास के क्षेत्र हाथियों की आवाजाही के प्रमुख मार्ग हैं. वन विभाग ने जगजीतपुर और भोगपुर गांव के आसपास के इलाकों को महत्वपूर्ण हॉटस्पॉट के रूप में चिन्हित किया है, जहां हाथियों की गतिविधियां सबसे ज्यादा दर्ज की जाती हैं. वन विभाग इस कार्य के लिए WWF और WII जैसी संस्थाओं के साथ समन्वय कर रहा है. अध्ययन पूरा होने के बाद चयनित हाथियों को रेडियो कॉलर पहनाए जाएंगे. रेडियो कॉलर की मदद से वन विभाग को हाथियों की लोकेशन और गतिविधियों की रियल टाइम जानकारी मिल सकेगी. अधिकारियों का मानना है कि यह तकनीक कुंभ मेले के दौरान संभावित खतरों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.  कुंभ मेले के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं के हरिद्वार पहुंचने की संभावना है. ऐसे में हाथियों की मौजूदगी किसी भी समय गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हाथियों का कोई झुंड भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में पहुंच जाता है, तो भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है.सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि जिन क्षेत्रों से हाथी आबादी वाले इलाके में प्रवेश करते हैं, उन्हीं क्षेत्रों के आसपास कुंभ के दौरान पार्किंग स्थल, टेंट सिटी और अस्थायी आवास बनाए जाते हैं. यानी जहां हाथियों की आवाजाही दर्ज होती है, वहीं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी भी रहती है. ऐसे में वन विभाग की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है.  वन विभाग ने हाथियों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए भौतिक अवरोध भी तैयार करने की योजना बनाई है. इसके तहत लगभग 8 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में खाई बनाई जाएगी, ताकि हाथी आसानी से आबादी वाले क्षेत्रों की ओर न बढ़ सकें. इसके साथ ही इसी क्षेत्र में सोलर फेंसिंग भी लगाई जाएगी. विभाग दो वॉच टावर स्थापित करने की तैयारी में है, जहां से संवेदनशील इलाकों की निगरानी की जाएगी. इसके अलावा पांच क्विक रिस्पॉन्स टीम (QRT) भी तैनात की जाएंगी. प्रत्येक टीम में लगभग 30 कर्मचारी होंगे और उनका नेतृत्व एसडीओ स्तर के अधिकारी करेंगे. किसी भी आपात स्थिति में ये टीमें तुरंत मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करेंगी.कुंभ मेले के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता है. लेकिन इसके साथ ही वन विभाग के सामने एक और जिम्मेदारी है, वो है हाथियों और इंसानों के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखना. चार सक्रिय गजराज गैंग, करीब 30 चिन्हित हाथी, आठ प्रमुख टस्कर और एक कुख्यात एक दांत वाला हाथी फिलहाल वन विभाग की निगरानी सूची में हैं. इनकी गतिविधियों पर चौबीसों घंटे नजर रखी जा रही है. साफ है कि कुंभ के सफल आयोजन के लिए सिर्फ यातायात और सुरक्षा प्रबंधन ही पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि जंगलों के इन बिन बुलाए मेहमानों की गतिविधियों को नियंत्रित करना भी उतना ही जरूरी होगा. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वन विभाग की खाकी ब्रिगेड इन शैतान कमांडरों की चाल को किस हद तक नाकाम कर पाती है और करोड़ों श्रद्धालुओं के बीच मानव और वन्यजीव संघर्ष की आशंका को कितना कम कर पाती है. अर्ली वार्निंग सिस्टम फॉर एलीफेंट प्रोजेक्ट के तहत एक विशेष मोबाइल एप भी विकसित किया जा रहा है. यह एप वन विभाग के सभी कर्मचारियों के मोबाइल में इंस्टॉल रहेगा. जैसे ही कैमरे में हाथियों की मूवमेंट डिटेक्ट होगी, तत्काल अलर्ट जारी होगा और संबंधित पूरे स्टाफ को तुरंत सूचना मिल जाएगी. जिससे मौके पर जाकर हाथियों को जंगल में खदेड़ा जाएगा. इसके अलावा जंगल और शहर की सीमा पर एक दो किलोमीटर लंबा पेट्रोलिंग ट्रैक भी बनाया जाएगा. कुंभ मेले के करीब डेढ़ करोड़ रुपए के बजट से अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाएगा. साथ ही चालीस लाख रुपए के बजट से ट्रैक का निर्माण होगा. ट्रैक बनने के बाद वन कर्मचारियों को आवाजाही में दिक्कत नहीं आएंगी. 2027 कुंभ मेले के दौरान भारी भीड़ को देखते हुए यह व्यवस्था सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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