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कभी एशिया की सबसे बड़ी लक्कड़ मंडी था दून का लक्खीबाग!

23/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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*कभी एशिया की सबसे बड़ी लक्कड़ मंडी था दून का लक्खीबाग!*
‘डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसा देहरादून न सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता बल्कि अपने समृद्ध इतिहास के लिए भी जाना जाता है. ब्रिटिश शासनकाल के दौरान देहरादून का भंडारीबाग और उससे सटा लक्खीबाग क्षेत्र व्यापार का एक मुख्य केंद्र बन गया था. उस दौर में इस इलाके को एशिया की सबसे बड़ी ‘लक्कड़ मंडी’ होने का गौरव मिला था. हिमालय के ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों से कटकर आने वाली कीमती लकड़ियां सबसे पहले यहीं इकट्ठी की जाती थीं और फिर यहीं से पूरे देश में भेजी जाती थीं. स ऐतिहासिक इलाके के नामकरण के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है. स्थानीय निवासियों और जानकारों के मुताबिक, पुराने समय में देहरादून के एक महंत ने इस पूरे क्षेत्र में ‘एक लाख’ पेड़ लगवाए थे. इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का बाग होने के कारण ही इस पूरे इलाके का नाम ‘लक्खीबाग’ पड़ गया, जिसे आज भी इसी नाम से पुकारा जाता है. अंग्रेजी शासन के दौरान यहां चारों तरफ घने और हरे-भरे पेड़ हुआ करते थे, जिससे यह पूरा क्षेत्र बेहद खूबसूरत नजर आता था. अंग्रेजों ने भारत में रेलवे नेटवर्क के विस्तार और अपनी ‘रॉयल नेवी’ के पानी वाले जहाजों के निर्माण के लिए उत्तराखंड के जंगलों को अपना मुख्य जरिया बनाया था. लक्खीबाग टिम्बर मार्केट को जानबूझकर देहरादून रेलवे स्टेशन के बिल्कुल नजदीक बसाया गया था, क्योंकि उस समय रेलवे स्टेशन का एक मुख्य गेट सीधे लक्खीबाग की तरफ ही खुलता था. यहीं से ट्रेनों में कीमती लकड़ियां और कोयला लोड-अनलोड किया जाता था. हरिद्वार और देहरादून के बीच साल 1897 में रेलवे ट्रैक बिछाने का काम शुरू हुआ था, जो 1899 में पूरा हुआ और साल 1900 से इस पर रेलगाड़ियां चलनी शुरू हुईं. ट्रेन सेवा शुरू होने के बाद यहां से साल, शीशम, सागौन और देवदार जैसी बेशकीमती लकड़ियों का निर्यात पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर होने लगा. देहरादून की लक्कड़ मंडी का इतिहास भले ही एक सदी पुराना हो चुका है, लेकिन उस दौर की शानदार काष्ठ कला आज भी यहां जिंदा है. चाहे जौनसार बावर के प्रसिद्ध महासू देवता का मंदिर हो, मुख्यमंत्री आवास हो या राजपुर रोड के ब्रिटिशकालीन पुराने बंगले, हर जगह लकड़ी पर की गई सुंदर और बारीक नक्काशी लोगों का मन मोह लेती है. आज भी देहरादून के कई पुराने घरों में लगभग 100 साल पुराने फर्नीचर, खिड़कियां और दरवाजे अपनी पूरी मजबूती के साथ चमक रहे हैं. स्थानीय टिम्बर व्यापारी बताते हैं कि समय बदलने के साथ अब इस ऐतिहासिक मंडी का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है. पहले जहां पेड़ों का अंधाधुंध कटान होता था और बेहिसाब व्यापार था, वहीं अब वन निगम के गठन के बाद वैज्ञानिक तरीके से पेड़ों की कटाई और बिक्री होती है. पुराने समय की तुलना में अब न तो यहां उतने पेड़ बचे हैं और न ही लकड़ी के बड़े व्यापारी. कभी दूर-दूर तक पहचान रखने वाली इस एशिया की सबसे बड़ी मंडी का कारोबार अब मुख्य रूप से उत्तराखंड और कुछ पड़ोसी राज्यों तक ही सीमित होकर रह गया है. आज देश और दुनिया में ‘एजुकेशन हब’ और एक खूबसूरत ‘टूरिस्ट नगरी’ के रूप में अपनी पहचान बना चुका देहरादून सिर्फ आधुनिक शिक्षा या पर्यटन तक सीमित नहीं है. भले ही आज इसे एजुकेशन हब कहा जाता है लेकिन इसका इतिहास सदियों पुराना है जहां सुरम्य वादियों के बीच शैक्षणिक संस्थानों के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षा का भी एक बड़ा केंद्र रहा है. ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देहरादून का नाम आते ही द्रोणाचार्य की याद ताजा हो जाती है. यह वही पावन भूमि है जहां गुरु द्रोणाचार्य ने निवास किया था जिसके कारण इसे ‘द्रोणनगरी’ भी कहा जाता है. केवल द्रोणाचार्य ही नहीं बल्कि भगवान दत्तात्रेय के शिष्यों और कई महान ऋषि-मुनियों ने इस धरती पर तपस्या की और आध्यात्मिक शिक्षा हासिल की. माना जाता है कि रामायण काल में रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण ने भी इस क्षेत्र में आत्मशुद्धि और ध्यान के लिए वक्त बिताया था. वहीं सिख गुरु रामराय के यहां ‘डेरा’ डालने के बाद इस जगह का नाम ‘डेरादून’ और कालान्तर में ‘देहरादून’ पड़ा. समय बदला और देहरादून ने अपनी करवट बदली. कभी ऋषियों की तपोभूमि रहा यह शहर आज देश के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों, सैन्य अकादमी और अनुसंधान संस्थानों का गढ़ बन चुका है.आज का देहरादून भले ही एजुकेशनल हब बन गया हो लेकिन इसकी जड़ों में आज भी वही आध्यात्मिक ऊर्जा और शांति रची-बसी है जो सदियों पहले ऋषि-मुनियों को यहाँ खींच लाती थी. देहरादून में आज नॉर्थ ईस्ट से लेकर साउथ अफ्रीका और विदेश से स्टूडेंट पढ़ने के लिए आते हैं लेकिन यह एकदम ही एजुकेशन हब नहीं बना है क्योंकि यहां कई शैक्षणिक और शोध संस्थान समय पर स्थापित किए गए. शिक्षा की बात करें तो महाभारत काल से ही देहरादून में शिक्षा की शुरुआत हो गई थी. कौरव-पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य देहरादून आए थे और उन्होंने टपकेश्वर की गुफाओं में तपस्या की थी. इसके बाद उन्हें धनुर्विद्या का ज्ञान हासिल हुआ था. इसलिए इस शहर का पुराना नाम द्रोणनगरी था.इसके बाद दत्तात्रेय के अनुयायियों ने भी यहां पड़ाव डाला और तपस्या की. उन्होंने कहा कि रामायण काल में भी भगवान श्री राम और लक्ष्मण ने जब रावण का वध किया था तब ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भी वह इसी भूमि पर आए थे और लक्ष्मण सिद्धमंदिर इसका साक्षी है. इसके बाद गुरु राम राय दरबार साहिब का आगमन और उसके बाद ब्रिटिश काल में यहाँ अंग्रेजों ने कई शैक्षणिक संस्थान बनाए. सुकून का शहर देहरादून आज बेहद व्यस्त है. यहां चौक-चौराहों से लेकर मोहल्लों की गलियों तक में ढूंढे से भी शांति मिलना मुमकिन नहीं, लेकिन यादों के ब्लैक एंड वाइट में हालात इससे बेहद जुदा थे. यहां बसना हर किसी का सपना था. खासतौर पर उनका जो रिटायरमेंट के बाद जीवन की भागम भाग से दूर बाकी जिंदगी सुकून से जीना चाहते थे. जानिए रजत जयंती वर्ष पर देहरादून के छोटे से शहर से महानगर बनने तक के सफर की कहानी.देहरादून में पिछले दो दशक के दौरान सुविधाओं और विकास का खूब बोलबाला रहा है. विकास जिसमें सड़कें, फ्लाई ओवर, एक्सप्रेस वे को गिना जाता है. विकास जिसमें बड़े अस्पताल, उद्योग धंधे और शहर के फैलाव को गिना जाता है. राज्य स्थापना के 26 सालों में देहरादून को वो सब मिला है, जिसके लिए एक राजधानी हकदार होती है. वो बात अलग है कि देहरादून स्थायी राजधानी का नाम नहीं ले पाई और इसका स्थायी राजधानी के रूप में अस्तित्व डामाडोल ही रहा. किसी प्रदेश में विकास को समझना हो तो उसकी राजधानी के हालातों को देख लीजिए. देहरादून भले ही उत्तराखंड की स्थायी राजधानी ना हो, लेकिन यहां पर राजनीतिक, औद्योगिक, सामाजिक समेत दूसरी हर तरह की गतिविधियां स्थायी राजधानी वाली ही रही है. पिछले 25 सालों में जिस तेजी के साथ यहां निर्माण कार्य हुए इस तेजी के साथ जन दबाव भी बढ़ता हुआ दिखाई दिया है. इतिहास के पन्नों में देहरादून का स्वभाव और आकर नए राज्य उत्तराखंड की स्थापना के साथ ही बदलने लगा. जनसंख्या का अचानक भारी दबाव न तो यहां के लोग समझ पाए और ना ही सरकारें. यहां रहने वाले लोगों को पता ही नहीं चला कि कब यह छोटा सा शहर महानगर में तब्दील हो गया. ऐसा इसलिए भी क्योंकि इतने बड़े बदलाव के लिए इस शहर में बहुत कम वक्त लिया. उधर, यहां की सरकारें तो जैसे इन हालातों से पूरी तरह बेखबर रही. शायद यही कारण है कि शहर में अनियोजित विकास होता रहा. नतीजन शहर की शक्ल बदलती रही. जिससे दून घाटी कंक्रीट में तब्दील हो गई. कोई भी सरकार देहरादून की पुरानी पहचान के साथ इसे अस्थायी राजधानी के रूप में विकसित करने पर विचार ही नहीं कर पाई. सड़कों पर बेतरतीब दौड़ती गाड़ियों की रफ्तार भी धीरे होती चली गई. सड़कें चौड़ी होने के बावजूद दोपहिया और चार पहिया वाहन सड़कों पर रेंगते दिखाई देते हैं. देहरादून की सामाजिक स्थिति भी काफी ज्यादा बदली है. यहां पर न केवल पहाड़ से बड़ी संख्या में लोगों ने आशियाना बनाया है. बल्कि, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, बिहार समेत कई राज्यों के लोग भी बड़ी संख्या में देहरादून आकर बसे हैं. इस तरह देहरादून की जनसंख्या भी मिश्रित रूप में अलग-अलग सामाजिक दृष्टिकोण वाली हुई है. देहरादून की सामाजिक स्थिति भी काफी ज्यादा बदली है. यहां पर न केवल पहाड़ से बड़ी संख्या में लोगों ने आशियाना बनाया है. बल्कि, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, बिहार समेत कई राज्यों के लोग भी बड़ी संख्या में देहरादून आकर बसे हैं. इस तरह देहरादून की जनसंख्या भी मिश्रित रूप में अलग-अलग सामाजिक दृष्टिकोण वाली हुई है.  कानून व्यवस्था के रूप में भी देहरादून काफी बदल गया है. कभी बेहद शांत इस घाटी में अब गोलियों की आवाज अक्सर सुनाई दी जाती है. पुलिस से अपराधियों के एनकाउंटर और डकैती, लूट, हत्या, जमीनों की धोखाधड़ी जैसी गंभीर घटनाएं भी अब आम हो गई है.खास बात ये है कि प्रदेश में गंभीर अपराधों को लेकर देहरादून की स्थिति भी चिंताजनक है. महिला अपराध के मामले में देहरादून तीसरा सबसे ज्यादा महिला अपराध वाला जिला है.  देहरादून ने ऐसी कई यादें या पहचान है, जिन्हें खो दिया है. देहरादून जो कभी नहर का शहर भी माना जाता था. वहां अब नहरें पूरी तरह से गायब हो चुकी है. सिंचाई से लेकर पानी की विभिन्न जरूरत को पूरा करने वाली यह नहरें पाइपों में बंद कर दी गई है. इसी तरह देहरादून की लीची भी अपना रंग खोती जा रही है. यहां की बासमती की पहचान तो अब करीब-करीब पूरी तरह से खत्म हो चुकी है. यहां सड़कों पर दौड़ते तांगे, घंटाघर के करीब 5 मिनट में फोटो तैयार करके देने वाले झटपट और तमाम खेल के मैदान सब अब बिसरे दिनों की बात हो गए हैं. राज्य आंदोलनकारी उन पुरानी यादों को ताजा करते हुए देहरादून के उन दिनों को याद करते हैं. वैसे छोटा सा देहरादून अब 26 सालों में काफी बड़ा भी हो चुका है. राजपुर रोड से धर्मपुर और प्रेमनगर से रायपुर के कुछ इलाके तक देहरादून फैल गया है. जो रानीपोखरी और विकासनगर से भी जुड़ गया है. कभी 15 से 20 हजार रुपए में मिलने वाली 100 गज जमीनें अब 20 लाख में भी नहीं खरीदी जा सकती. हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि देहरादून में सब कुछ बिगड़ा ही हो. भले ही देहरादून की हालत पर्यावरण के लिहाज से खराब हुई हो, जाम की स्थिति घंटों लोगों को सड़कों पर रुकने को मजबूर कर रही हो, आपराधिक घटनाएं बढ़ी हो, नहरें, बाग बगीचे और मैदान खत्म हुए हों, लेकिन कुछ है, जो युवाओं को राहत दे रहा है.  देहरादून शहर की यह नहरें शहर के परिस्थितिक तंत्र को भी मजबूत रखती थी. नहरों के पानी के कारण जमीन की नमी जहां कृषि भूमि को उपजाऊ बनाती थी. यहां के मौसम में भी ठंडक बनी रहती थी. कहा जता है कि देहरादून में नहरों का निर्माण योजना बड़ी चतुराई के साथ किया गया था. नहरों के आसपास छोटी-छोटी नलियां भी बनाई गई थी. जहां घोड़े पानी पीते थे. इसके साथ ही नहरों के लिए प्राकृतिक जल निकासी सुनिश्चित की गई थी. जिससे बरसात में कभी शहर जलमग्न नहीं होता था, लेकिन आज ये नहरें बढ़ती आबादी और बसावट की भेंट चढ़ गई हैं.।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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