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भाषाएं सिर्फ संवाद का साधन नहीं होती

22/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जिस भाषा में इंसान सबसे पहले बोलना सीखता है वही उसकी मातृभाषा होती है यानी माँ की गोद की भाषा को मातृभाषा कहते हैं। दादी-नानी के द्वारा सुनाई जानी वाली लोरियों की भाषा और बाल्यावस्था के दौरान मित्र समूहों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। भारतीय संविधान में मात्र 22 भाषाओं का जिक्र है जबकि मात्र छह भाषाओं (तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगू, मलयालम और ओडिया) को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है। हमारे देश की विविधता के कारण ही किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। भाषा के महत्व को देखते हुए ही वर्ष 1964–66 में कोठारी आयोग ने ‘त्रि-भाषा सूत्र’ दिया था।भारत न केवल भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से विविधता को समेटे हुए है बल्कि भाषाई दृष्टिकोण से भी काफी समृद्ध है। वर्ष 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 1652 भाषाएँ थीं। शायद इसीलिए मातृभाषा पर एक कहावत खूब प्रचलित हुई “कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी।” लेकिन कभी-कभी लगता है कि वैश्वीकरण ने पहनावा-ओढ़ावा, खान-पान, साहित्य-सिनेमा के साथ-साथ भाषाई तौर पर भी हमें एकरूपता की तरफ जबरदस्ती धकेला है। अंग्रेजी अथवा अन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं की वैश्विक पटल पर मौजूदगी किसी से छिपी हुई नहीं है।वैश्वीकरण ने मातृभाषा के लिए कई चुनौतियाँ खड़ी की हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मशीन की भाषा ही आजकल उद्योग जगत को पसंद है। ऑनलाइन युग में अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं का बोलबाला है। शोध, अनुसंधान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उन भाषाओं को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जा रही है जो मशीन और तकनीक के लिए अनुकूल हैं। नौकरी की भाषा भी मातृभाषा से शिफ्ट होकर अंग्रेजी हो चुकी है। अंग्रेजी से कोई घृणा नहीं है किंतु यदि मातृभाषा में ही नौकरी के कौशल सीख लिए जाए तो कितना अच्छा होगा!वैश्वीकरण के कारण मातृभाषा पर संकट मंडराने की खबर कोई नहीं है; वर्ष 1961 में भारत में भाषाओं की कुल संख्या आधिकारिक रूप से 1652 थीं लेकिन 1971 में यह घटकर मात्र 808 रह गई। भारतीय लोकभाषा सर्वेक्षण 2013 के आँकड़े को मानें तो पिछले 50 वर्षों में 220 भाषाएँ लुप्त हो गई हैं और 197 भाषाएँ लुप्त होने की कगार पर हैं। व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद, सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों में बदलाव, पारंपरिक बसावट में कमी और पूँजीवाद के दौर में रोज़गार के प्रारूप में परिवर्तन ने मातृभाषाओं को पतन की ओर ले गया है। इसके बावजूद यदि मातृभाषा की चमक कायम है तो कुछ तो बात है कि इसकी हस्ती मिटती नहीं है!मौलिक चिंतन और रचनात्मक लेखन अधिकांशतः मातृभाषा में ही संभव हो पाता है। यही कारण है कि विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य और सिनेमा आए दिन सुर्खियाँ बटोरते रहते हैं। दरअसल अर्जित भाषाओं में कल्पना करना और उन कल्पनाओं को लिपिबद्ध करना मातृभाषाओं की तुलना में कठिन है। मातृभाषा को लोकभाषा इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि यह जन-जन से सीधे जुड़ी हुई होती है। यह वह धरोहर है जिसका कोई विकल्प नहीं है। मातृभाषा में संवाद स्थापित करके संप्रेषण को प्रभावपूर्ण बनाना कोई नई कला नहीं है। नेल्सन मंडेला कहते हैं कि “यदि आप किसी से ऐसी भाषा में बात करें, जो वह समझ सकता है तो वह उसके मस्तिष्क में जाती है। लेकिन यदि आप उसकी अपनी भाषा में बात करते हैं, तो वह सीधे उसके हृदय को छूती है।” इसलिए आजकल मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में टीचिंग-लर्निंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बच्चे जिस भाषा में बचपन को जीता है उसी भाषा में वह पढ़ाई को भी एन्जॉय करेगा। पढ़ाई कोई बोझिल कार्य न लगे इसके लिए मातृभाषा को टीचिंग-लर्निंग की भाषा के रूप में स्वीकारा जा रहा है।दरअसल भाषा पुल का कार्य करती है; जानकारी, अवधारणा और ज्ञान को एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क में पहुँचाती है। जिस प्रकार यदि पुल मजबूत न हो तो दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है उसी प्रकार यदि भाषा पर पकड़ मजबूत न हो तो विषयों पर मास्टरी हासिल नहीं हो पाती है। अर्थ का अनर्थ तभी होता है जब भाषा पर पकड़ कमजोर होती है। यह सर्वज्ञात है कि सबकी अपनी-अपनी मातृभाषा पर पकड़ मजबूत होती है। इसलिए भारत की नई शिक्षा नीति 2020 में इसका प्रावधान किया गया है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाए। इससे बच्चों के सर्वांगीण विकास का रास्ता आसान हो जाएगा।गौरतलब है कि मातृभाषा में अध्ययन का सकारात्मक प्रभाव विद्यार्थियों के संज्ञानात्मक विकास पर पड़ता है। पढ़ाई में रूचि, अमूर्त विषयों को मूर्त रूप में तब्दील करने की शक्ति, विषयवस्तुओं को याद रखने की क्षमता, आत्मविश्वास का विकास, कक्षा में विद्यार्थियों की अच्छी उपस्थिति और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का संबंध मातृभाषा से है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने भी इस बात को स्वीकार किए हैं कि मातृभाषा से ही शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन होगा।अतः विभिन्न कोशिशों के बाद मातृभाषा को टीचिंग-लर्निंग की भाषा के रूप में स्वीकारा जा रहा है। क्योंकि करके सीखने की प्रक्रिया में मातृभाषा का खूब योगदान है। शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति में मातृभाषा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मातृभाषा में पढ़ते हुए विद्यार्थियों को कमतर नहीं आँकना चाहिए। तकनीकी शिक्षा भी मातृभाषा में देनी चाहिए। मातृभाषा का विस्तार इंटरनेट की भाषा के रूप में होनी चाहिए। मातृभाषा को सभी विद्यार्थी लर्निंग की भाषा के रूप में स्वीकार करे, इसके लिए मातृभाषा में रोजगार के अवसर भी सृजित होने चाहिए। और शिक्षण के दौरान शिक्षकों को मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में संवाद स्थापित करते हुए हीन भावना से ग्रसित नहीं होना चाहिए। अब तो कुछ इंजीनियरिंग कॉलेज, मैनेजमेंट संस्थान और मेडिकल कॉलेज भी हिंदी में टीचिंग-लर्निंग कार्य कर रहे हैं।भारत जैसे विशाल उपभोक्ता वाले देश में अब मातृभाषा को संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। इंटरनेट की दुनिया से लेकर साहित्य, मनोरंजन और पत्रकारिता की दुनिया तक में लोकभाषा में विभिन्न प्रकार के मौलिक कंटेंट मुहैया कराए जा रहे हैं। कुछ नया कहने, लिखने और दिखाने की भाषा के रूप में जन-जन की भाषा का प्रभावशाली उपयोग हो रहा है। इससे रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं और मातृभाषा का उत्थान भी हो रहा है। क्षेत्रीय भाषाओं के सिनेमा का डंका खूब बज रहा है। अनेकों न्यूज़ चैनल क्षेत्रीय भाषाओं में ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। यानी संप्रेषण की असल खुशबू मातृभाषा से आती है। जुड़ाव, लगाव और अपनापन का भाव अपनी ही भाषा में महसूस होता है।मातृभाषा को टिकाऊ बनाए रखने के लिए इस भाषा में शोध कार्य किए जाने की आवश्यकता है। वैश्वीकरण को अवसर के रूप में देखते हुए मातृभाषा का दरवाजा विज्ञान, कला, शोध, पत्रकारिता, शिक्षा और मनोरंजन के लिए खोल देना चाहिए। ध्यान इस बात की रखना है कि अंतर्राष्ट्रीय भाषा मातृभाषा को कहीं निगल न जाए! हमें अतीत से सचेत होना चाहिए और सधा हुआ कदम बढ़ाकर विभिन्न मातृभाषाओं को विलुप्त होने से बचाना चाहिए। एक भाषा का विलुप्त होना अनेकों बहुमूल्य धरोहरों का विलुप्त होने जैसा है। मानव सभ्यता में विभिन्न प्रकार की विविधताएँ दुनिया को रंग-बिरंगी बनाती हैं। मातृभाषाओं का गायब हो जाना इंद्रधनुष का बेरंग हो जाना है। महात्मा गांधी कहते हैं कि “राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा में नहीं बल्कि किसी अन्य भाषा में शिक्षा पाते हैं, वे आत्महत्या करते हैं। इससे उनका जन्मसिद्ध अधिकार छिन जाता है।”तकनीकी शिक्षा को मातृभाषा में प्रदान करके ही शिक्षा को असल में समावेशी बनाया जा सकता है। अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करके जापान, फ्रांस तथा जर्मनी ने विकसित देश का तमगा कैसे हासिल किया यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। भारत को अपनी मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए इन देशों द्वारा अपनाए गए तरीकों और नीतियों से सीखना चाहिए। वैसे आजकल कुछ इंजीनियरिंग कॉलेज, मैनेजमेंट संस्थान और मेडिकल कॉलेज में हिंदी में अध्ययन-अध्यापन शुरू हो गया है। इसका दूरगामी सकारात्मक प्रभाव भविष्य में ज़रूर देखने को मिलेगा।समय की माँग है कि मातृभाषा का न सिर्फ एक विषय के रूप में प्रचार प्रसार करें बल्कि प्रशासन और न्यायालयों सहित सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में मातृभाषाओं के प्रयोग को प्रोत्साहित करें। दरअसल एक लोकतंत्र के रूप में यह जरूरी है कि शासन में आम नागरिकों की भागीदारी हो। वह तभी होगा जब शासन की भाषा उनकी अपनी मातृभाषा होगी। यदि न्यायपालिका की कार्यवाही भारतीय भाषाओं में होगी तो लोग न्यायपालिका को अपना पक्ष अपनी भाषा में समझा सकेंगे और उसके निर्णयों को पूरी तरह समझ सकेंगे। इससे न्याय तक सबकी पहुँच संभव हो सकेगी।लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी, बच्चों का सर्वांगीण विकास, समावेशी शिक्षा और विभिन्न विविधताओं का संरक्षण लोकभाषा से संभव हो सकेगा। लोक भावनाएं, लोक कला, लोक साहित्य और लोक संस्कृति जैसे मुद्दों का सीधा जुड़ाव लोकभाषा यानी मातृभाषा से है। भारत में गुलामी के दौरान से मातृभाषाओं का दमन शुरू हो गया था। अंग्रेजों की नितियाँ भारतीयता को खत्म करने की थी। भारतीयता से यहाँ आशय संस्कार, मौलिकता, मातृभूमि से प्रेम और सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को बनाए रखने से है, इसमें मातृभाषा पुल का कार्य करती है। इसलिए अंग्रेज इस पुल को नेस्तनाबूद करने में डटे रहे। आज़ादी के बाद भी स्थितियाँ बहुत नहीं बदली हैं। एक भारतीय के रूप में यह हमारी असफलता ही है कि हम अपनी मातृभाषाओं को शासन, प्रशासन और राष्ट्रीय जीवन में उचित स्थान न दिला पाए। भारतीय भाषाओं को रोजगार और आजीविका से जोड़कर मातृभाषा को ताकत दे सकते हैं मातृभाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपराओं, जीवनमूल्यों और इतिहास को संजोने का एक सशक्त साधन है। यह समाज, संस्कृति एवं राष्ट्र के लिए पहचान का महत्वपूर्ण साधन होती है। शोध बताते हैं कि बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़कर अधिक अच्छी तरह से समझ विकसित करते हैं, वहीं आमजन के लिये संवाद एवं व्यवहार का प्रभावी माध्यम भी यही है। इससे उनकी बौद्धिक क्षमता और रचनात्मकता में वृद्धि होती है। यूनेस्को ने मातृभाषा के महत्व को समझते हुए मातृभाषा के संरक्षण और बहुभाषी शिक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हर साल 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा 1999 में की और 2000 से इसकी शुरुआत की। इस वर्ष 25वीं वर्षगांठ मनाते हुए इसकी थीम “भाषा का महत्व: अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का रजत जयंती समारोह” है, जो 2030 तक अधिक समावेशी और टिकाऊ विश्व के निर्माण के लिए भाषाई विविधता पर प्रगति में तेजी लाने की आवश्यकता को रेखांकित करेगा। भाषाई विविधता को बढ़ावा देने, लुप्तप्राय भाषाओं की रक्षा करने और बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहित करने के प्रयासों को प्रदर्शित करने पर जोर दे रहा है। तकनीकी विकास और इंटरनेट के सुरक्षित विस्तार के साथ, यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि स्थानीय और मातृभाषाओं को डिजिटल माध्यमों में कैसे संरक्षित किया जाए। यह दिवस हमें भाषाओं को डिजिटल रूप में संरक्षित करने और अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए प्रेरित करता है।यूनेस्को का मानना है कि स्थायी समाज के लिए सांस्कृतिक और भाषाई विविधता बहुत जरूरी है। शांति के लिए अपने जनादेश के तहत यह संस्कृतियों और भाषाओं में अंतर को बनाए रखने के लिए काम करता है जो दूसरों के लिए सहिष्णुता और सम्मान को बढ़ावा देते हैं। बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज अपनी भाषाओं के माध्यम से अस्तित्व में रहते हैं जो पारंपरिक ज्ञान और संस्कृतियों को स्थायी तरीके से प्रसारित और संरक्षित करते हैं। भाषाई विविधता लगातार खतरे में पड़ती जा रही है क्योंकि अधिकाधिक भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं। वैश्विक स्तर पर 40 प्रतिशत आबादी को उस भाषा में शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा नहीं है जिसे वे बोलते या समझते हैं। फिर भी, बहुभाषी शिक्षा में प्रगति हो रही है, इसके महत्व की समझ बढ़ रही है, खासकर प्रारंभिक स्कूली शिक्षा में, और सार्वजनिक जीवन में इसके विकास के लिए अधिक प्रतिबद्धता है।मातृभाषा जीवन का आधार है, यह एक ऐसी भाषा होती है जिसे सीखने के लिए उसे किसी कक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं, वही व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। लेकिन मानव समाज में कई दफा हमें मानवाधिकारों के हनन के साथ-साथ मातृभाषा के उपयोग को गलत भी बताया जाता रहा है। ऐसी ही स्थिति पैदा हुई थी 21 फरवरी 1952 को बांग्लादेश में जब 1947 में भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में उर्दू को राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया था। लेकिन इस क्षेत्र में बांग्ला और बंगाली बोलने वालों की अधिकता ज्यादा थी और 1952 में जब अन्य भाषाओं को पूर्वी पाकिस्तान में अमान्य घोषित किया गया तो ढ़ाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया। आंदोलन को रोकने के लिए पुलिस ने छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलानी शुरु कर दी जिसमें कई छात्रों की मौत हो गई। अपनी मातृभाषा के हक में लड़ते हुए मारे गए शहीदों की ही याद में मातृभाषा दिवस मनाया जाता है।विश्व में विगत 40 वर्षों में लगभग डेढ़ सौ से अधिक अध्ययनों के निष्कर्ष हैं कि मातृभाषा में ही शिक्षा होनी चाहिए, क्योंकि बालक को माता के गर्भ से ही मातृभाषा के संस्कार प्राप्त होते हैं। ’’ निश्चित ही सशक्त भारत-विकसित भारत निर्माण एवं प्रभावी शिक्षा के लिए मातृभाषा में शिक्षा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है। 13 जिलों वाले उत्तराखंड में 10 जिलों में मातृ भाषा के रूप में गढ़वाली व कुमाऊंनी की बहुलता है, जबकि शेष तीन जिलों में हिंदी का बोलबाला है। हाल ही में जारी किए गए मातृ भाषा के आंकड़ों में यह तस्वीर सामने आई है।भारत के महापंजीयक व जनगणना आयुक्त कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार, पौड़ी, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी व रुद्रप्रयाग में गढ़वाली मातृ भाषा वाले लोगों की संख्या अधिक है। दूसरी तरफ अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर व चंपावत में कुमाऊंनी भाषा की बहुलता है। शेष बचे हरिद्वार, ऊधमसिंहनगर व देहरादून जिलों में ङ्क्षहदी भाषी लोगों की संख्या अधिक है। खास बात यह कि इन तीन जिलों में हिंदी भाषी लोगों की संख्या, दूसरे जिलों में गढ़वाली-कुमाऊंनी समेत विभिन्न मातृ भाषा वाले लोगों से भी कहीं अधिक है। क्योंकि इन तीन जिलों में हिंदी भाषी लोगों की एकतरफा बहुलता तो है ही, अन्य जिलों में भी मूल रूप से हिंदी भाषी लोगों की संख्या काफी अधिक है। इस तरह देखें तो प्रदेशभर में हिंदी भाषी लोगों की संख्या सबसे अधिक है, जबकि गढ़वाली व कुमाऊंनी का प्रसार सबसे अधिक है।दिलचस्प तथ्य यह भी है कि सबसे अधिक प्रसार वाली गढ़वाली व कुमाऊंनी बोलने वालों की संख्या ऊधमसिंहनगर व हरिद्वार में चौथे स्थान पर है। ऊधमसिंहनगर में जहां पहले स्थान पर हिंदी, दूसरे पर पंजाबी व तीसरे स्थान उर्दू है, वहीं हरिद्वार में हिंदी के बाद उर्दू व फिर पंजाबी भाषा का स्थान है। भाषाएं वह दरवाजे हैं जिनसे सीखने के नए आयाम खुलते हैं। विश्व बंधुत्व की भावना भाषाओं को उदारता से देखने से ही आएगी। भाषाई ताकत प्रदर्शन से नहीं भाषाई संप्रभुता की स्वीकार्यता से आएगी। आज हमें मातृभाषाओं के विस्तृत स्वरूप को समझने की जरूरत है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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