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बंजर खेतों का पुनरुद्धार कर किसानों को अच्छी आय दे सकता है लेमनग्रास

08/11/19
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
लेमनग्रास प्रचलित नामः नीबू घास
अंग्रेजी नाम- मालाबार ग्रास, ईस्ट इन्डियन लेमन ग्रास पौध परिचय नीबू घास एक बहुवर्षीय पौधा है जो लगभग 3 मीटर ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ पतली रेखाकार एवं अन्तिम सिरा लम्बा तथा नील हरित रंग का होता है। स्पाइकिका स्पाइकलेट 4.5.5 मिमि लम्बा, निचला तूष गूल्म द्वि.नौतल कील व ऊपरी तूष नाव के आकार का होता है। पुष्पवृन्त स्पाइकिका नर अथवा नपुंसक होता है। उपयोगी अंग वायवीय ऊपरी भाग सुगन्धित तेल का मुख्य स्रोत है। मुख्य रासायनिक घटक पूर्वी भारत में मिलने वाली नीबू घास के तेल का मुख्य घटक सिट्राल है। सूक्ष्म घटकों में लीनालूल, जिरेनियॉल, सिट्रोनेलोल निरॉल, 1.8 सिनियाल, लिनेलिल एसिटेट इत्यादि है’। पश्चिमी भारतीय नीबू घास के तेल का मुख्य घटक सिट्राल.ए और सिट्राल बी, मिरसीन व सूक्ष्म घटकों में अल्फा पाइनिन, बीटा.फिलेण्ड्रीन, सिट्रोनेलिल, सिट्रोनेलायल एसिटेट, जिरेनियॉल आदि है।
औषधीय गुण एवं उपयोग इसके तेल का उपयोग धुलाई के साबुन तथा दूसरे घरेलू उत्पादों को सुगन्धित बनाने में किया जाता है। एंटी आक्सीडेंट का सबसे बेहतर सोर्स लेमनग्रास में विटामिन सी भारी मात्रा में होता है। दुनिया की एक बड़ी आबादी इसकी चाय यानी लेमन.टी पीने लगी है। लेकिन लेमनग्रास ऑयल तेल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल परफ्यूम और कास्मेटिक उद्योग में होता है। जैसे जैसे ये इंड्रस्ट्री बढ़ रही है लेमनग्रास की भी मांग बढ़ी है। इसलिए किसानों के लिए ये फायदे का खेती बनती जा रही है। किसानों की आमदनी बढ़ाने की कवायद में जुटी सरकार पूरे देश में एरोमा मिशन के तहत इसकी खेती को बढ़ावा भी दे रही है, लेमनग्रास की खूबी ये है कि इसे सूखा प्रभावित इलाकों में भी लगाया जा सकता है।
भारत सालाना करीब 700 टन नींबू घास के तेल का उत्पादन करता हैए जिसकी एक बड़ी मात्रा निर्यात की जाती है। भारत का लेमनग्रास तेल किट्रल की उच्च गुणवत्ता के चलते हमेशा मांग में रहता है। 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के वादे को पूरा करने की कवायद में जुटी भारत सरकार ने एरोमा मिशन के तहत जिन औषधीय और सगंध पौधों की खेती का रकबा बढ़ा रही है लेमनग्रास की खेती में कमाई और मुनाफे का गणित प्रति हेक्टेयर सलाना लागत. 40,000 रुपए सिंचाई समेत 30,000 रुपए बिना सिंचाई कुल उत्पादन से कमाई. 1,60,000 रुपए सिंचाई समेत 1,00,000 रुपए बिना सिंचाई शुद्ध मुनाफा सालाना 1,20,000 रुपए सिंचाई समेत 70.000 रुपए बिना सिंचाई नोट. उपरोक्त आंकड़े सीमैप 2018 की किसानों को वितरित की गई किताब से हैं। आंकड़े बाजार भाव और उत्पादन के मुताबिक कम ज्यादा हो सकते हैं।
उत्तराखंड में किसानों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने लेमन ग्रास से बंजर खेतों का पुनरुद्धार कार्यक्रम शुरू किया है। शुक्रवार को कृषि व उद्यान मंत्री सुबोध उनियाल ने विभिन्न ब्लाॅकों में वितरण के लिए 70 लाख लेमन ग्रास के पौधों से भरे वाहनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने दावा किया कि अगले तीन साल में राज्य की असिंचित भूमि लेमन ग्रास से लहलहा उठेगी।सगंध पौधा केंद्र सेलाकुई की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कृषि मंत्री ने कहा कि जंगली जानवरों से खेती को नुकसान, सिंचाई की कमी, कृषि उत्पाद के ढुलान की समस्या और खेतों की घरों से लंबी दूरी जैसी समस्याओं के कारण किसानों का खेती से मोहभंग हो रहा है। राज्य के 1 हजार 65 गांव पलायन से खाली हो चुके हैं। 3 लाख 67 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर हो चुकी है। इसलिए, केंद्र सरकार के सहयोग से राज्य में 31 लेमन ग्रास के क्लस्टर विकसित किए गए हैं। इनमें 660 हेक्टेयर क्षेत्र में लेमन ग्रास फैलाकर 31 फील्ड डिस्टिलेशन यूनिटों के जरिए उत्पाद का प्रसंस्करण किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बंजर खेतों में लेमन ग्रास की खेती करने से किसान आर्थिक रूप से मजबूत होंगे। इस पर सगंध पौधा केंद्र ने कहा कि लेमन ग्रास को उत्तराखंड में प्रमोट करने की योजना 2005 में शुरू की गई थी। वर्तमान में किसानों को लेमन ग्रास का समर्थन मूल्य एक हजार रुपये प्रति किलो दिया जा रहा है।
उत्तराखंड में इन दिनों लेमन ग्रास की खेती बढ़ावा को आमदनी बेहतर करने हेतु महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा के तहत गांव के 16 किसानों का एक समूह गठित कर यह खेती की जा रही है। बता दें कि लेमन ग्रास की खेती कई बीघे में की जा रही है। किसान लेमन ग्रास से तेल निकालकर 11 सौ रुपए से 14 सौ रुपए तक प्रति लीटर के भाव से बेच रहे हैं। उत्तराखंड 9 नवंबर को अपनी उत्तराखंड राज्य के 20वें वर्षगांठ स्थापना दिवस के मनाने जा रहा है लेकिन राज्य आंदोलनकारियों का सपना आज भी अधूरा है। राज्य आंदोलनकारियों का मानना है कि जिस मकसद को लेकर उत्तराखंड का गठन किया गया था, वो आज भी पूरा नहीं हो पाया है। पहाड़ों से युवा लगातार पलायन कर रहे हैं। कहीं न कहीं इस पलायन के लिए पहाड़ के नेता जिम्मेदार हैं, क्योंकि राजनेता ही पलायन कर मैदान पहुंच रहे हैंण् प्रदेश सरकार राज्य के 20वें स्थापना दिवस के मौके पर सप्ताह भर कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। ये कार्यक्रम मुख्य रूप से सैनिकोंए महिलाओंए युवाओं पर केंद्रित हैं पर किसान के लिए गंभीर नहीं है।

’लेखक का शोघ पत्र वर्ष 2010 सम्मेलन में जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान कोसी कटारमल अल्मोड़ा में प्रकाशित हुआ है।

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