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लीचीः बाग ठेकेदारों को भारी नुकसान की आशंका

09/06/21
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
दक्षिण चीन में यह बहुतायत में उगायी जातीं है, इसके साथ ही दक्षिण.पूर्व एशिया खासकर थाईलैंड, लाऔस, कम्बोडिय वियतनाम बांग्लादेश, पाकिस्तान, भारत, दक्षिणी जापान, ताईवान में। और अब तो यह कैलिफ़ोर्निया, हवाई और फ्लोरिडा में भी उगायी जाने लगी है। देहरादून में कुछ बहुत से स्वादिष्ट फलों की खेती होती है। इनमें प्रमुख है लीची। लीची की खेती देहरादून में 1890 से ही प्रचलित है। हालांकि शुरुआत में लीची की खेती यहां के लोगों में उतनी लोकप्रिय नहीं थी। पर 1940 के बाद इसकी लोकप्रियता जोर पकड़ने लगी। इसके बाद तो देहरादून के हर बगीचे में कम से कम दर्जन भर लीची के पेड़ तो होते ही थे। 1970 के करीब देहरादून लीची का प्रमुख उत्पादक बन गया। लीची एक फल के रूप में जाना जाता है, जिसे वैज्ञानिक नाम से बुलाते हैं, जीनस लीची का एकमात्र सदस्य है। इसका परिवार है सोपबैरी।

यह ऊष्णकटिबन्धीय फल है, जिसका मूल निवास चीन है चीन दुनिया का नम्बर एक लीची उत्पादक देश है। भारत का स्थान दूसरा है। भारत में कुल 92 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में लीची की खेती होती है। बिहार भारत का सबसे बड़ा लीची उत्पाद राज्य है। यहां करीब 32 हजार हेक्टेयर में लीची के बगान हैं। यह कुल खेती का 40 फीसदी हिस्सा है। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, असम और त्रिपुरा में लीची की पैदावार होती है। लेकिन मुजफ्फरपुर की शाही लीची का कोई जवाब नहीं है। देश विदेश में इसकी धूम है। मुजफ्फरपुर के अलावा वैशाली, पूर्वी चम्पारण, समस्तीपुर, बेगूसराय और भागलपुर जिले में भी लीची की खेती होती है। 2017 में बिहार में 3 लाख मीट्रिक टन लीची का उत्पादन हुआ था। 2018-19 में बिहार से 137.27 लाख रुपये की लीची का निर्यात हुआ था। बिहार में करीब 50 हजार किसान परिवार लीची से रोजी रोटी चलाते हैं।

फल के अंदर एक भूरे रंग का बड़ा सा बीज होता है। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल फ़रवरी से जून तक होता है। इसके फल में शर्करा, मैलिक अम्ल, साइट्रिक अम्ल, टार्टरिक अम्ल, विटामिन तथा खनिज पदार्थ पाये जाते हैं। गर्मियों में जब शरीर में पानी व खनिज लवणों की कमी हो जाती है तब लीची का रस बहुत फायदेमंद रहता है। लीची सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद फल है। इसमें बहुत से पोषक तत्व जैसे कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, सोडियम, विटामिन सी, विटामिन ए, विटामिन बी कांपलेक्स, विटामिन के, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और आयरन जैसे मिनरल्स पाए जाते हैं। इसके इन्हीं गुणों के कारण इसे सुपर फल भी कहा जाता है। देहरादून के विकास नगर, नारायणपुर, वसंत विहार, रायपुर, कालूगढ़, राजपुर रोड और डालनवाला क्षेत्र में लगभग 6500 हेक्टेयर भूमि पर इस स्वादिष्ट फल की खेती होती है। लेकिन अब लीची की खेती में भारी कमी आई है। अब लीची की खेती सिर्फ 3070 हेक्टेयर भूमि पर ही होती है। लीची वियतनामए चीनी और दक्षिण एशियाई बाजारों में ताज़ी बिकतीं हैं और विश्व भर के सुपरमार्किटों में भी। इसके प्रशीतन में रखने पर भी इसका स्वाद नहीं बदलता है रामनगर में 875 हैक्टेयर क्षेत्रफल में लीची का उत्पादन होता है। इस बार लीची का उत्पादन 50 हजार क्विंटल होने का अनुमान है। रामनगर के लीची की खपत बाहरी राज्यों में काफी होने से इसके रेट भी महंगे थे। बाहर से व्यापारी अपने वाहन लाकर रामनगर की लीची मुंह मांगे रेट पर खरीद कर ले जा रहे थे। पिछले साल लीची का उत्पादन ढाई हजार मीट्रिक टन रहने से बगीचे के ठेकेदारों को नुकसान झेलना पड़ा था। लेकिन इस बार उत्पादन दोगुना साढ़े चार हजार तक पहुंच गया।

पिछले साल तक लीची बाहरी राज्यों को औसतन 50 रुपये किलो तक बेची जाती थी। इस बार 90 व 100 रुपये किलो रेट होने के बाद भी खपत में कमी नहीं आई है। ऐसे मे लीची की बढ़ती खपत को पूरा करना स्थानीय बगीचे वालों के लिए मुश्किल हो रहा है। लीची की फसल इस बार काफी अच्छी थी। पहले जहां लीची के दाम 50 रुपये तक हो जाते थे। इस बार लीची के दाम 90 रुपये से नीचे नहीं आए। कई बगीचों से लीची सीधे दूसरे राज्य के व्यापारी खरीदकर ले जा रहे हैं। वहीं उद्यान विभाग के प्रभारी ने बताया कि रामनगर की लीची का अच्छा स्वाद रहता है। जितनी धूप होगी लीची उतनी रसभरी व मोटी होगी। इस बार लीची का उत्पादन ठीक हुआ है। यहां की जलवायु लीची के लिए परिपूर्ण रहती है। लीची का सीजन अब लगभग खत्म होने को है।

पिछले साल लॉकडाउन में नुकसान उठा चुके लीची के बाग ठेकेदारों के सामने एक बार फिर से संकट की स्थिति है। कोविड क‌र्फ्यू के चलते इस बार भी लीची के व्यापार में घाटा होने की आशंका बनी हुई है। ठेकेदारों का कहना है यदि फसल के मंडियों में जाने के समय तक क‌र्फ्यू नहीं हटा तो इसका खामियाजा उन्हें आर्थिक हानि के रूप में भुगतना पड़ जाएगा।पछवादून के बागों में लीची की फसल तैयार हो चुकी है। जैसे.जैसे लीची तोड़ने का समय नजदीक आ रहा है। बाग ठेकेदारों की चिता भी बढ़ रही है। पिछले साल कोरोना महामारी के चलते लीची की फसल में नुकसान उठा चुके ठेकेदार फिल्हाल की स्थिति को लेकर परेशानी में हैं। पिछले वर्ष कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए लागू लॉकडाउन के समय में ही लीची की फसल तैयार हुई थी। इस बार भी कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर चरम पर है। कोविड कफ्र्यु के कारण बाजार बंद है और फल सब्जियों की दुकान संचालकों को दो तीन घंटे में ही सामान बेचकर घरों के लिए निकलना होता है। ऐसे में ठेकेदारों के सामने लीची की बिक्री को लेकर गंभीर समस्या है। बाग ठेकेदार का कहना है कि लीची की बिक्री विकासनगर, देहरादून, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और सहारनपुर आदि की मंडियों में की जाती है। जिस मंडी में ठेकेदार को उचित मूल्य मिलता है, वह वहीं ले जाकर लीची को बेच देता है, लेकिन लीची की खरीददारी से मंडी के आढ़ती भी बच रहे हैं। इसका कारण यह है कि डिमांड कम है, फल और सब्जी बेचने वालों के पास सामान बेचने के लिए समय भी कम है। ऐसे में उनके सामने अपनी फसल को कम दाम में लोकल बाजार में ही बेचने की मजबूरी रहेगी। उनका कहना है कि यदि एक सप्ताह के भीतर क‌र्फ्यू नहीं खुलता है तो इससे उन्हें इस बार फिर से भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। राज्य में कृषि और उद्यान के भारी भरकम विभाग तो है पर किसानों और बागवानों को हो रहे आर्थिक नुकसान के लिए कोई ठोस नीती नहीं है। जिस का खामियाजा यहाँ के लोगो को हर साल उठाना पड़ता है। मौसम की मार से हर साल लीची की फसलों को भारी नुकसान होता है लेकिन सरकार ठोस कृषि निति न होने से कभी भी किसानो और बागवानो की मदद नहीं कर पाती ए और वो साल दर साल भारी नुक्सान उठाते है।

फिलहाल किसानों और कास्तकारों को उम्मीद है की आने वाले समय में लीची की फसल सही हो सकेगी। छोटे राज्य में रोजगार का सबसे आसान तरीका कृषि और बागवानी है जो पलायन पर कुछ हद तक रोक लगाये हुयी है धीरे ण्धीरे युवा भी नगदी फसलों के जरिये इस क्षेत्र में अपनी पहचान बना रहे है ऐसे में कृषि मंत्रालय को भी इन के समयण्समय हो रहे नुकसान के लिए भी ठोस कदम उठाने चाहिएए जिससे युवा स्व रोजगार के जरिये अपनी रोज़ी रोटी कम कर पलायान पर अंकुश लगा सकेगे और उत्तराखंड भी हिमाचल की तर्ज़ पर विकास कर सकेगा। उत्तराखंडए उत्तर प्रदेशए झारखंडए पंजाबए असम और त्रिपुरा आदि राज्यों में भी लीची उगाई जाती है पर न के बराबर। हिंदुस्तान में लीची की फसल विशेषकर उत्तरपूर्वी भागों तक ही सीमित है। लीची के बागानों के ठेके लेने वाले बताते हैं कि इस बार लॉकडाउन के चलते वो बगीचों में दवाओं का छिड़काव नहीं कर पाएए इसकी वजह से फल पेड़ में नहीं रूक सका। इसका खामियाजा बागान मालिकों और बगीचे के ठेकेदारों को हुआ है। साथ ही इस साल बार.बार बारिश होने के चलते ठंड देर से गई जिससे लीची में बौर करीब 15 दिन देर से आयाण् उसका भी फसल को नुकसान हुआ है। इसके बाद हुई बेमौसम बारिश, ओले और आंधी ने इस वर्ष उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया है। इस बार की पैदावार में लीची में यह कमी 60 फीसदी तक है। इस बार कोरोना के साथ ही मौसम की ऐसी मार पड़ी कि लीची का उत्पादन चार हजार मीट्रिक टन सिमट कर रह गया।

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