डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का मूल्यांकन केवल उसके नारों, प्रचार अभियानों और उपलब्धियों के दावों से नहीं किया जा सकता। सरकार की वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि उसके फैसलों का आम नागरिक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की स्थिति में कितना सुधार हुआ, युवाओं को कितने अवसर मिले और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कितनी मजबूत हुई। वर्ष 2014 में मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद देश ने कई बड़े नीतिगत फैसले देखे। इन फैसलों के समर्थकों ने उन्हें परिवर्तनकारी बताया, लेकिन अनेक निर्णयों और घटनाओं ने गंभीर सवाल भी पैदा किए। इन सवालों को किसी दल के पक्ष या विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठकर देखना आवश्यक है।मोदी सरकार के कार्यकाल की आलोचनात्मक समीक्षा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि हर समस्या का एकमात्र कारण केंद्र सरकार नहीं होती। कुछ विषय राज्य सरकारों, वैश्विक परिस्थितियों, न्यायपालिका, प्रशासनिक संस्थाओं और लंबे समय से चली आ रही आर्थिक संरचनाओं से भी जुड़े हैं। फिर भी, जिस सरकार के पास राष्ट्रीय नीतियां बनाने, संसाधनों का वितरण करने और प्रमुख संस्थागत सुधार लागू करने की शक्ति होती है, उससे उसके फैसलों के परिणामों पर जवाब मांगना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में बहुमत सरकार को शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन उसे आलोचना से मुक्त नहीं करता।मोदी सरकार के कार्यकाल की आलोचनात्मक समीक्षा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि हर समस्या का एकमात्र कारण केंद्र सरकार नहीं होती। कुछ विषय राज्य सरकारों, वैश्विक परिस्थितियों, न्यायपालिका, प्रशासनिक संस्थाओं और लंबे समय से चली आ रही आर्थिक संरचनाओं से भी जुड़े हैं। फिर भी, जिस सरकार के पास राष्ट्रीय नीतियां बनाने, संसाधनों का वितरण करने और प्रमुख संस्थागत सुधार लागू करने की शक्ति होती है, उससे उसके फैसलों के परिणामों पर जवाब मांगना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में बहुमत सरकार को शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन उसे आलोचना से मुक्त नहीं करता।8 नवंबर 2016 को रात में घोषित नोटबंदी मोदी सरकार के सबसे बड़े और विवादित आर्थिक फैसलों में शामिल रही। सरकार ने इसका उद्देश्य काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद के वित्तपोषण पर अंकुश लगाना बताया था। अचानक पुराने 500 और 1,000 रुपये के नोटों को अमान्य किए जाने से देशभर में बैंक शाखाओं और एटीएम के बाहर लंबी कतारें लगीं। नकदी पर निर्भर छोटे कारोबारियों, दिहाड़ी मजदूरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तत्काल कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जिन लोगों की जीविका रोजाना की कमाई पर निर्भर थी, उनके लिए यह फैसला विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हुआ।विशेष रूप से 2021 में दूसरी लहर के दौरान कई शहरों से अस्पतालों में बिस्तरों, ऑक्सीजन, दवाओं और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की खबरें सामने आईं। अनेक परिवार अपने परिजनों के उपचार के लिए भटकते रहे। महामारी ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद कमियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर निवेश की जरूरत और आपातकालीन तैयारी की सीमाओं को उजागर कर दिया। यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं था, लेकिन उसकी गंभीरता ने केंद्र और राज्य सरकारों की तैयारी तथा समन्वय पर सवाल उठाए।केंद्र सरकार की जिम्मेदारी थी कि राज्यों के साथ समन्वय स्थापित करके ऑक्सीजन, चिकित्सा उपकरणों और जरूरी संसाधनों की आपूर्ति को प्रभावी बनाया जाए। साथ ही, नागरिकों को समय पर विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराई जाए और संक्रमण की संभावित लहरों के लिए तैयारी की जाए। महामारी के दौरान विभिन्न राज्यों की परिस्थितियां अलग थीं और स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा हिस्सा राज्य सरकारों के अधीन था। इसलिए हर कमी का दोष केवल केंद्र पर डालना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। फिर भी, राष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति, दिशा-निर्देशों और समन्वय से संबंधित निर्णयों की समीक्षा करना आवश्यक है।इस संकट ने यह प्रश्न भी उठाया कि क्या स्वास्थ्य सुविधाओं को पर्याप्त प्राथमिकता दी गई थी। किसी भी देश की आर्थिक प्रगति का अर्थ तभी पूरा होता है, जब संकट के समय उसके नागरिकों को समय पर उपचार और आवश्यक सुविधाएं मिल सकें। महामारी के अनुभव से सबक लेते हुए सार्वजनिक अस्पतालों, ऑक्सीजन उत्पादन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, चिकित्सा कर्मचारियों और आपातकालीन प्रबंधन को मजबूत करना चाहिए। यदि संकट के बाद भी कमियों को दूर करने की गंभीर कोशिश नहीं होती, तो भविष्य में ऐसी त्रासदियों का जोखिम बना रहता है। सरकार की जिम्मेदारी केवल संकट के दौरान राहत देने की नहीं, बल्कि उससे सीखकर व्यवस्था को बेहतर बनाने की भी है।देश की बड़ी युवा आबादी को रोजगार, बेहतर शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा की आवश्यकता है। मोदी सरकार ने कौशल विकास, स्टार्टअप, विनिर्माण और स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। इसके बावजूद बेरोजगारी, गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी और सरकारी नौकरियों के लिए अत्यधिक प्रतिस्पर्धा जैसे विषय लगातार सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहे हैं। आर्थिक विकास के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका मूल्यांकन इस आधार पर भी होना युवाओं की परेशानी केवल नौकरी नहीं मिलने तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में अभ्यर्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में कई वर्ष और परिवार की बचत खर्च करते हैं। जब भर्ती प्रक्रिया में देरी होती है, परीक्षाएं रद्द होती हैं या प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप सामने आते हैं, तो उनके सामने आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ जाता है। 2024 में नीट-यूजी परीक्षा को लेकर विवाद और बाद के वर्षों में सामने आए परीक्षा संबंधी मामलों ने भर्ती तथा प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। इन मामलों में प्रत्येक आरोप की जांच और संबंधित संस्थाओं की भूमिका का तथ्यात्मक आकलन जरूरी है।सरकार के लिए रोजगार सृजन को केवल योजनाओं और घोषणाओं की संख्या से मापना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि नियमित रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, श्रमिकों की आय, महिला रोजगार और युवाओं के कौशल विकास से जुड़े परिणाम सार्वजनिक रूप से सामने रखे जाएं। यदि आर्थिक विकास का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुंचता, तो विकास की गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे। युवा देश की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक हैं, लेकिन यह संभावना तभी वास्तविक शक्ति बन सकती है जब उन्हें शिक्षा, रोजगार और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें।अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त करने से संबंधित निर्णय लिया और तत्कालीन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख—में पुनर्गठित किया। सरकार ने इस फैसले को राष्ट्रीय एकीकरण, विकास और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। दूसरी ओर, इस निर्णय के साथ लगाए गए प्रतिबंधों, राजनीतिक नेताओं की हिरासत, संचार व्यवस्था पर रोक और राज्य के दर्जे के सवाल को लेकर आलोचना हुई। इस विषय पर राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर व्यापक बहस हुई।दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के फैसले को बरकरार रखा और जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने तथा राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही। यह कानूनी स्थिति स्पष्ट करती है कि फैसले की संवैधानिक वैधता और उसके राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सामाजिक प्रभाव अलग-अलग प्रश्न हैं। किसी निर्णय को न्यायालय से वैधता मिलने के बाद भी उसके क्रियान्वयन, स्थानीय प्रतिनिधित्व और नागरिकों के अनुभवों का मूल्यांकन किया जा सकता है।जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में सरकार की जिम्मेदारी केवल सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है। नागरिकों का विश्वास, राजनीतिक भागीदारी, आर्थिक अवसर और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सामान्य संचालन भी महत्वपूर्ण हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े वास्तविक जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन लंबे समय तक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया कमजोर रहने से लोगों की भागीदारी प्रभावित हो सकती है। स्थायी शांति के लिए सुरक्षा के साथ संवाद, विकास और जवाबदेह प्रशासन की आवश्यकता बनी रहती है।भारत की विविधता उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग समुदायों का साथ रहना भारतीय समाज की वास्तविकता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की आशंकाओं, धार्मिक पहचान और सार्वजनिक भाषणों से जुड़े मुद्दों पर देशभर में तीखी बहस हुई। नागरिकता संशोधन कानून के समर्थकों ने इसे पड़ोसी देशों में उत्पीड़ित कुछ धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की व्यवस्था बताया, जबकि आलोचकों ने धर्म आधारित वर्गीकरण और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों को लेकर प्रश्न उठाए।इन मुद्दों पर असहमति का होना लोकतांत्रिक समाज में असामान्य नहीं है। लेकिन जब सार्वजनिक विमर्श में समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ता है या किसी समूह के विरुद्ध भेदभाव और हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं, तो प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। किसी विशेष घटना की जवाबदेही तय करने के लिए उसके तथ्य, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और कानूनी कार्रवाई को देखना चाहिए। व्यापक आरोपों के बजाय प्रमाणों पर आधारित चर्चा अधिक उपयोगी होती है।सरकार की जिम्मेदारी है कि कानून का संरक्षण सभी नागरिकों को समान रूप से मिले और किसी भी समुदाय के विरुद्ध हिंसा या भेदभाव के मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई हो। राजनीतिक नेतृत्व के शब्दों का सार्वजनिक वातावरण पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए सार्वजनिक संवाद में संयम और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान आवश्यक है। भारत की एकता केवल प्रशासनिक शक्ति से नहीं, बल्कि नागरिकों के बीच भरोसे और समान अधिकारों की भावना से मजबूत होती है।देश में बुनियादी ढांचे, सड़कों, रेल, औद्योगिक परियोजनाओं और शहरी विकास का विस्तार किसी भी सरकार की प्राथमिकताओं का हिस्सा हो सकता है। मोदी सरकार ने भी बड़े पैमाने पर निर्माण और संपर्क परियोजनाओं पर जोर दिया है। लेकिन विकास के साथ पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करना उतना ही आवश्यक है। दिल्ली और उत्तर भारत में वायु प्रदूषण, हिमालयी क्षेत्रों में संवेदनशील पारिस्थितिकी, जंगलों पर दबाव और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियां लगातार ध्यान मांगती हैं।प्रदूषण के लिए केवल केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इसमें राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों, परिवहन, उद्योग, कृषि अवशेष जलाने और मौसमी परिस्थितियों की भी भूमिका होती है। फिर भी, केंद्र के पास राष्ट्रीय मानक, वित्तीय सहायता, पर्यावरण नीति और राज्यों के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। जब प्रदूषण का असर बच्चों, बुजुर्गों, श्रमिकों और आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ता है, तब इसे केवल मौसमी समस्या मानकर टालना उचित नहीं है।विकास की सफलता का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उससे पर्यावरण और नागरिकों के स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ा। परियोजनाओं की मंजूरी, पर्यावरणीय आकलन, प्रभावित समुदायों से परामर्श और नुकसान की भरपाई पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए। यदि आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधनों को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाता है, तो उसकी लागत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है। इसलिए सरकार को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए प्रभावी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले दशक में कई क्षेत्रों में विस्तार देखा है और देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लेकिन तेज आर्थिक वृद्धि अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करती कि उसका लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचे। रोजगार की गुणवत्ता, छोटे कारोबारों की स्थिति, ग्रामीण आय, महंगाई और संपत्ति के वितरण जैसे विषय यह समझने के लिए आवश्यक हैं कि विकास आम नागरिकों के जीवन में कितना बदलाव ला रहा है। आर्थिक नीतियों का आकलन केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि से नहीं, बल्कि नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा से भी होना चाहिए।महामारी के दौरान छोटे कारोबारों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर गंभीर दबाव पड़ा। इसके बाद आर्थिक गतिविधियों में सुधार के बावजूद सभी वर्गों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं रहीं। छोटे उद्यमों के लिए ऋण, बाजार तक पहुंच, लागत और प्रतिस्पर्धा से जुड़े प्रश्न बने रहे। गरीब परिवारों के लिए खाद्य सुरक्षा और सामाजिक कल्याण योजनाओं का महत्व भी इस बात को दर्शाता है कि बड़ी आबादी को आर्थिक असुरक्षा से बचाने के लिए सार्वजनिक सहायता आवश्यक बनी हुई है।सरकार की आर्थिक नीति की कसौटी यह होनी चाहिए कि विकास के अवसर व्यापक हों, रोजगार पैदा हों और कमजोर वर्गों को आगे बढ़ने के साधन मिलें। यदि अर्थव्यवस्था बढ़ती है, लेकिन बड़ी संख्या में युवा स्थिर रोजगार के लिए संघर्ष करते रहते हैं, तो नीतिगत प्राथमिकताओं पर चर्चा जरूरी है। सरकार को उपलब्धियों के साथ चुनौतियों के आंकड़े भी सामने रखने चाहिए और उन क्षेत्रों में सुधार करना चाहिए जहां विकास का लाभ पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच रहा है।मोदी सरकार के कार्यकाल की समीक्षा करते समय नोटबंदी, कोरोना महामारी, किसान आंदोलन, बेरोजगारी, परीक्षा विवाद, चुनावी बॉन्ड, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता, जम्मू-कश्मीर, सामाजिक ध्रुवीकरण और पर्यावरण जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनमें कुछ निर्णयों पर राजनीतिक और आर्थिक मतभेद हैं, कुछ घटनाओं ने प्रशासनिक कमियों को उजागर किया और कुछ मामलों में न्यायालयों ने स्पष्ट संवैधानिक निर्णय दिए। इन सभी को एक ही श्रेणी में रखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय प्रत्येक मामले के तथ्यों, परिणामों और जिम्मेदारियों की अलग-अलग समीक्षा की जानी चाहिए।लोकतंत्र में सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं होती। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संस्थाएं और नागरिक अधिकार स्थायी महत्व रखते हैं। जिस सरकार से जनता ने विकास और बेहतर भविष्य की अपेक्षा की हो, उससे उन वादों की प्रगति का हिसाब मांगना नागरिकों का अधिकार है। इसी तरह सरकार को भी अपनी उपलब्धियों के साथ कमियों को स्वीकार करने, आलोचना का उत्तर देने और नीतियों में सुधार करने के लिए तैयार रहना चाहिए।देश को किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में स्थायी भावनात्मक विभाजन से अधिक आवश्यकता है—ऐसी व्यवस्था की, जहां रोजगार के अवसर हों, स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हों, किसानों को उचित सुरक्षा मिले, परीक्षाएं निष्पक्ष हों, राजनीतिक चंदा पारदर्शी हो और कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो। मोदी सरकार का मूल्यांकन भी इन्हीं कसौटियों पर होना चाहिए। अंततः लोकतंत्र की वास्तविक ताकत सत्ता की लोकप्रियता में नहीं, बल्कि उसकी जवाबदेही, संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों के जीवन में आने वाले सकारात्मक बदलाव में निहित है।इसी उम्मीद में अनेक अभिभावक अपनी सीमित आय के बावजूद बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग, पुस्तकों, किराये और अन्य आवश्यकताओं पर अपनी सामर्थ्य से अधिक व्यय करते हैं। वे विश्वास करते हैं कि बच्चे की सफलता पूरे परिवार की कठिनाइयों का अंत करेगी। ऐसे में प्रश्नपत्र लीक केवल एक परीक्षा को प्रभावित नहीं करता, बल्कि वर्षों की मेहनत, विश्वास और आर्थिक त्याग को भी तोड़ देता है। कई परिवार मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरे संकट में पहुँच जाते हैं, और कुछ युवाओं के लिए यह निराशा असहनीय रूप ले लेती है। इन प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए पेपर लीक मामले ने उन हजारों प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे छात्रों को मानसिक,सामाजिक और आर्थिक रुप से गहरे संकट में डालकर सरकारी सिस्टम के प्रति निराशा का भाव पैदा किया है।आज आवश्यकता केवल किसी एक परीक्षा को सफलतापूर्वक आयोजित करने की नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में विश्वास बहाल करने की है। यदि मेहनत करने वाले युवाओं का भरोसा व्यवस्था से उठने लगे, तो इसका प्रभाव केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर भी पड़ेगा।परीक्षाओं की शुचिता, पारदर्शिता और निष्पक्षता केवल विद्यार्थियों का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रश्न है। सरकार, शैक्षणिक संस्थाओं, अभिभावकों और समाज—सभी की यह साझा जिम्मेदारी है कि युवाओं की मेहनत को उसका उचित सम्मान मिले और उन्हें ऐसा वातावरण उपलब्ध कराया जाए, जहाँ सफलता का आधार केवल प्रतिभा, परिश्रम और ईमानदारी हो।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














