देहरादून, 23 सितम्बर 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से आज सांयकालीन सत्र में मानव और मकाक (बंदर) के बदलते संबंधों तथा शहरीकरण के बीच गैर-मानवीय प्राणियों के सामने उत्पन्न हो रही नई चुनौतियों पर एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। इस विषय पर देश के प्रमुख प्राइमेटोलॉजिस्ट तथा यूनिवर्सिटी ऑफ ट्रांस-डिसिप्लिनरी साइंसेज, बेंगलुरु के प्रो. अनिंद्य सिन्हा ने अपना व्याख्यान दिया।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र द्वारा इस प्रकार के विषयों पर व्याख्यान आयोजित करने की पहल के पीछे पर्यावरण, समाज, संस्कृति और विज्ञान से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक विमर्श को बढ़ावा देना भी प्रमुख उद्देश्य रहा है।
प्रो. अनिंद्य सिन्हा ने भारत में मनुष्य और मकाक के सह-अस्तित्व की बदलती परिस्थितियों, उसके सामाजिक एवं पारिस्थितिक प्रभावों और भविष्य की चुनौतियों को अनेक उदाहरणों के माध्यम से सामने रखा।
प्रो. सिन्हा ने कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप में गैर-मानवीय जीवों और मानव समुदायों के बीच सह-अस्तित्व की एक लंबी परंपरा रही है। इसका एक कारण भारतीय समाज में प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति मौजूद धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण भी रहा है। विशेष रूप से अनेक गैर-मानवीय प्राइमेट्स को विभिन्न भारतीय समुदायों की धार्मिक मान्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान मिला है। इसके कारण मनुष्य और इन जीवों के बीच एक प्रकार का सामाजिक सह-अस्तित्व लंबे समय तक बना रहा।
हालांकि, उन्होंने कहा कि तेजी से हो रहा शहरीकरण इस पारंपरिक सह-अस्तित्व के सामने नई परिस्थितियां पैदा कर रहा है। जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों में पर्यावरणीय क्षति, कृषि भूमि में बदलाव, आवासीय विस्तार तथा मानव गतिविधियों के बढ़ते दबाव ने अनेक प्राइमेट प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित किया है। इसका असर केवल संरक्षित वनों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे क्षेत्र भी इससे प्रभावित हो रहे हैं जहां मनुष्य और वन्यजीव पहले से एक-दूसरे के निकट रहते आए हैं।
प्रो. सिन्हा ने दक्षिण और उत्तर भारत में पाए जाने वाले बोनेट मकाक और रीसस मकाक के उदाहरणों से समझाया कि इन प्राइमेट्स का जीवन अब तेजी से बदल रहा है। मानव-निर्मित वातावरण में भोजन की उपलब्धता ने उनके व्यवहार, आवागमन और सामाजिक संरचना में परिवर्तन किए हैं। मनुष्यों द्वारा दिया जाने वाला भोजन, बाग-बगीचों, खेतों और फलों के बागानों में उपलब्ध खाद्य सामग्री तथा कूड़े के ढेर इन जीवों को प्राकृतिक पर्यावास से बाहर मानव बस्तियों की ओर आकर्षित कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस तरह के बदलाव केवल उनके भोजन तक सीमित नहीं हैं। लगातार बदलते पर्यावास में जीवित रहने के लिए प्राइमेट्स अपने व्यवहार में भी परिवर्तन कर रहे हैं। मानव गतिविधियों से प्रभावित इन नए सामाजिक-पारिस्थितिक परिवेशों में उन्हें अपने अस्तित्व के लिए नए तरीके अपनाने पड़ रहे हैं। कई स्थानों पर मनुष्य और प्राइमेट्स के बीच बढ़ते संपर्क के कारण संघर्ष की स्थितियां भी उत्पन्न हो रही हैं।
देहरादून जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहरों के संदर्भ में यह विषय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। प्रो. सिन्हा ने बताया कि छोटे और मध्यम आकार के शहरों में हाल के वर्षों में शहरी विस्तार की गति तेज हुई है। कृषि क्षेत्रों, आर्द्रभूमियों और शहरों की परिधि में मौजूद वन क्षेत्रों के सिकुड़ने से प्राइमेट्स के सामने प्राकृतिक आवासों के स्थान पर सड़क, तारकोल, कंक्रीट और मानव बस्तियों से निर्मित नए पर्यावास सामने आ रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में मानव और वन्यजीव के बीच संपर्क बढ़ना स्वाभाविक है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि बंदरों को केवल “समस्या” के रूप में देखने के बजाय उनके व्यवहार और उनके पर्यावास में हो रहे बदलाव को समझना आवश्यक है। मानव व्यवहार और शहरी नियोजन भी इस पूरे परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि शहरों का विस्तार प्राकृतिक क्षेत्रों की संरचना और वन्यजीवों की आवाजाही को ध्यान में रखे बिना होता है, तो भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की परिस्थितियां और जटिल हो सकती हैं।
कार्यक्रम में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी, प्रो. गोविन्द सिंह, सौम्या प्रसाद, पूर्व मुख्य वन अधिकारी राजीव भरतरी तथा जयराज,शिवम्, सुंदर सिंह बिष्ट, शिवप्रकाश, पीयूष बडोनी, जागेश्वर प्रसाद जोशी, अजय शर्मा,बी.एस. रावत, सी.पी. मठपाल, डॉ. वी. के. डोभाल, देवेन्द्र कांडपाल, जे. एस. पसबोला, सुरेन्द्र सजवाण, गौरव बर्तवाल शिव जोशी,आलोक सरीन, जी. एस. बिष्ट, पूजा उपाध्याय सहित कई मुख्य वन अधिकारी, पर्यावरण एवं वन्यजीव विषयों में रुचि रखने वाले नागरिक,शोधार्थी, अध्येता, विद्यार्थी और बड़ी संख्या में पाठक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने प्राकृतिक आवासों के संरक्षण तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उपायों से जुड़े प्रश्न भी किए।
कार्यक्रम का उद्देश्य केवल बंदरों से जुड़ी बढ़ती शहरी समस्या पर चर्चा करना नहीं, बल्कि मनुष्य और अन्य जीवों के बीच सह-अस्तित्व की व्यापक अवधारणा को समझना तथा तेजी से बदलते शहरी और प्राकृतिक पर्यावास के संदर्भ में इस संबंध को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने के लिए संवाद का अवसर उपलब्ध कराना था।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र को केवल पुस्तकों और पठन-पाठन तक सीमित रखने के बजाय ज्ञान, शोध और सार्वजनिक संवाद के केन्द्र के रूप में विकसित करने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रहा है। मानव और प्रकृति के संबंध, पर्यावरणीय बदलाव, जैव-विविधता तथा स्थानीय समाज पर इनके प्रभाव जैसे विषय इस सार्वजनिक संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसी क्रम में आयोजित यह व्याख्यान एक सार्थक पहल के रूप में रहा।











