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उत्तराखंड में 50% घटी मोटे अनाज की खेती, विलुप्ति की कगार पर 13 प्रजातियां

09/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड देश विदेश में अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है. यहां अनेक प्रकार की जड़ी बूटी से लेकर अनेक प्रकार के अनाजों का उत्पादन किया जाता है. इस उत्पादन की सबसे बड़ी खूबी ये होती है कि ये सभी चीजें प्राकृतिक और ऑर्गेनिक रूप से उगाई जाती हैं. बदलते वक्त के साथ अब उत्तराखंड के ऑर्गेनिक उत्पादन पर मानों किसी की नजर सी लग गई है 2000 में जहां उत्तराखंड में मोटे अनाज की 23 फसलों की खेती होती थी, वह 25 साल बाद कम होकर मात्र 10 फसलें ही रह गई हैं जिनकी खेती वर्तमान समय में की जा रही है. यह उत्तराखंड की खेती के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है. चीणा, कोणी, फाफर, जौ आदि ऐसी फसल है, जो विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है.भले ही देश (मोटे अनाज) के प्रति लोगों को जागरूक कर रहा हो, लेकिन मोटे अनाज की पैदावार में कमी देखने को मिल रही है. उत्तराखंड में सदियों से मोटे अनाज की पारंपरिक खेती होती आ रही है. यहां इन्हें बारह नाजा (12 अनाज) के नाम से भी जाना जाता है. वर्तमान में उत्तराखंड से मोटे अनाज की खेती करने से किसान बच रहे हैं. किसान पारंपरिक खेती छोड़ अब अन्य रोजगार के साधनों की ओर जा रहे हैं. जिसका सीधा असर मोटे अनाज (मडुवा, चोलाई, दाल, कोणी, झंगोरा आदि) की खेती पर पड़ रहा है. किसान भी अब मोटे अनाजों की खेती से दूरी बना रहे हैं. इसे लेकर किसानों के भी अपने तर्क है. विभाग द्वारा चमोली व चंपावत जिले के 3000 किसानों का सर्वेक्षण किया, जिसमें यह पाया गया कि 2011 में जो 2.02 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल मोटे अनाजों के लिए था, वह घटकर 2023 में 1.20 लाख हेक्टेयर मात्र ही रह गया है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो 2030 तक मंडुवा, झंगोरा व चौलाई का क्षेत्रफल 73 हजार हेक्टेयर ही रह जायेगा. वह कहते हैं कि पर्वतीय क्षेत्र के किसान पारंपरिक तरीके से जैविक खेती करते हैं, बहुत कम किसानों को मालूम है कि जैविक अनाजों के दाम महंगे होते है, लेकिन बिचौलिये इनसे ओने-पौने दामों पर खरीद लेते हैं. ग्रामीण बताती है कि उनके यहां मंडुवा, कोदा, झंगोरा उगाया जाता है, लेकिन जंगली जानवरों के डर से अब उन्होंने खेती कम कर दी है. कहती हैं कि बंदर, जंगली सुअर पूरी फसल को बर्बाद कर देते हैं. कहती हैं कि मेहनत के अनुसार लाभ न मिलने के कारण गांव में भी कोई खेती नहीं करना चाहता है. केवल अपने उपयोग के लिए ही फसलें उगाई जाती है. प्रोफेसर सती का कहना है कि वर्तमान में जंगली जानवरों के कारण खेती पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. साथ ही किसानों को उनके अनाज का अच्छा दाम न मिल पाना, मौसम परिवर्तन के चलते फसलों का खराब होना भी किसानों के खेती से मुंह मोड़ने के कारण हैं. कहा कि इस विषय पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है. हालांकि मिलेट वर्ष घोषित करने के बाद से मोटे अनाजों के प्रति पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ है. ऐसे में अगर मिलेट पॉलिसी बने, तो किसानों को भी फायदा मिल सकता है. स्टेट मिशन मिलेट के अंतर्गत मंडुवा, झंगोरा व रामदाना जैसे मोटे अनाज का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए घाटियों एवं अन्य क्षेत्रों में ऐसी बेकार पड़ी कृषि योग्य भूमि तलाशी जा रही है, जिसमें इनकी खेती हो सकती है। इसके पीछे सरकार की मंशा क्षेत्रफल बढ़ाकर उत्पादन में बढ़ोतरी करना है, ताकि श्रीअन्न की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके।उत्तराखंड में पहाड़ से लेकर मैदान तक अलग-अलग भू-आकृतियां हैं। स्थान की ऊंचाई के साथ जलवायु और वनस्पतियां बदलती रहती हैं।पहाड़ में बजरी व हल्की बनावट वाली मिट्टी होती है, जो लंबे समय तक पानी नहीं रखती। इसे मंडुवा, झंगोरा, रामदाना जैसे स्माल मिलेट के लिए उपयुक्त माना जाता है। ये फसलें अपने लचीलेपन के लिए जानी जाती हैं। यानी ये विविध परिस्थितिक स्थिति में तालमेल बैठाने में सहायक होती हैं। यही कारण है कि राज्य के 10 पर्वतीय जिलों में इनकी खेती होती आई है।  ये फसलें पूरी तरह जैविक होने के कारण इनकी मांग भी अधिक है। बावजूद इसके, मोटे अनाज का क्षेत्रफल घट रहा है। कुल मिलाकर, बदलते मौसम और जल संकट के दौर में सही फसल का चयन ही किसानों के लिए एक सफलता की कुंजी है. अगर किसान बाजरा, ज्वार, अरहर, चना, सरसों के साथ-साथ भिंडी, लौकी और मिर्च जैसी सब्जियों की खेती अपनाएं, तो वे कम पानी में भी अच्छी पैदावार लेकर सालों-साल मुनाफा कमा सकते हैं. वही थोड़ी योजना और समझदारी से खेती को नुकसान से बचाकर फायदा का सौदा बनाया जा सकता है. ग्रामीण बताती है कि उनके यहां मंडुवा, कोदा, झंगोरा उगाया जाता है, लेकिन जंगली जानवरों के डर से अब उन्होंने खेती कम कर दी है. कहती हैं कि बंदर, जंगली सुअर पूरी फसल को बर्बाद कर देते हैं. कहती हैं कि मेहनत के अनुसार लाभ न मिलने के कारण गांव में भी कोई खेती नहीं करना चाहता है. केवल अपने उपयोग के लिए ही फसलें उगाई जाती है. प्रोफेसर सती का कहना है कि वर्तमान में जंगली जानवरों के कारण खेती पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. साथ ही किसानों को उनके अनाज का अच्छा दाम न मिल पाना, मौसम परिवर्तन के चलते फसलों का खराब होना भी किसानों के खेती से मुंह मोड़ने के कारण हैं. कहा कि इस विषय पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है. हालांकि मिलेट वर्ष घोषित करने के बाद से मोटे अनाजों के प्रति पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ है. ऐसे में अगर मिलेट पॉलिसी बने, तो किसानों को भी फायदा मिल सकता है.। सरकार मोटे अनाजों को वैश्विक ब्रांड बनाने की कोशिश में लगी है। देशभर में मिलेट्स महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है, लेकिन इन सबके बीच उत्तराखंड से एक चिंता बढ़ाने वाली खबर आई है। उत्तराखंड में मोटे अनाज की खेती 50 प्रतिशत घटी है। यहां मोटे अनाज की 13 प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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