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मानव के लिए कुदरत का चमत्कार है मोरिंगा ओलिफेरा

26/07/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
इसका वनस्पति नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। फिलीपीन्स, मैक्सिको, श्रीलंका, मलेशिया आदि देशों में भी सहजन का उपयोग बहुत अधिक किया जाता है। दक्षिण भारत में व्यंजनों में इसका उपयोग खूब किया जाता है। मुनगा या सहजन आदि नामों से जाना जाने वाला सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है। इसके अलग.अलग हिस्सों में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं सहजन औषधीय गुणों से भरपूर है। इसकी फली के अचार और चटनी कई बीमारियों से मुक्ति दिलाने में सहायक हैं। यह जिस जमीन पर यह लगाया जाता है, उसके लिए भी लाभप्रद है। दक्षिण भारत में साल भर फली देने वाले पेड़ होते है। इसे सांबर में डाला जाता है। उत्तर भारत में यह साल में एक बार ही फली देता है।
सर्दियां जाने के बाद फूलों की सब्जी बना कर खाई जाती है फिर फलियों की सब्जी बनाई जाती है। इसके बाद इसके पेड़ों की छटाई कर दी जाती है।सहजन वृक्ष किसी भी भूमि पर पनप सकता है और कम देख.रेख की मांग करता है। इसके फूल, फली और टहनियों को अनेक उपयोग में लिया जा सकता है। भोजन के रूप में अत्यंत पौष्टिक है और इसमें औषधीय गुण हैं। इसमें पानी को शुद्ध करने के गुण भी मौजूद हैं सहजन के बीज से तेल निकाला जाता है और छाल पत्तीए गोंदए जड़ आदि से दवाएं तैयार की जाती हैं। सहजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन ए, सी और बी कॉम्पलैक्स प्रचुर मात्रा में है। सहजन में दूध की तुलना में ४ गुना कैल्शियम और दुगना प्रोटीन पाया जाता है। सहजन की फली वात व उदरशूल में पत्ती नेत्ररोगए मोच एशियाटिका एगठिया में उपयोगी है।
सहजन की जड़ दमा, जलोधर, पथरी, प्लीहा रोग के लिए उपयोगी है। छाल का उपयोग शियाटिका, गठियाए, यकृत आदि रोगों के लिए श्रेयष्कर है। सहजन के विभिन्न अंगों के रस को मधुर, वातघ्न, रुचिकारक, वेदनाशक, पाचक आदि गुणों के रूप में जाना जाता है। सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात व कफ रोग शांत हो जाते है, इसकी पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया, शियाटिका, पक्षाघात, वायु विकार में शीघ्र लाभ पहुंचता है, शियाटिका के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखता है।
सहजन की पत्ती की लुगदी बनाकर सरसों तेल डालकर आंच पर पकाएं तथा मोच के स्थान पर लगाने से शीघ्र ही लाभ मिलने लगता है। सहजन को अस्सी प्रकार के दर्द व बहत्तर प्रकार के वायु विकारों का शमन करने वाला बताया गया है। सहजन की सब्जी खाने से पुराने गठिया ए जोड़ों के दर्दए वायु संचय ए वात रोगों में लाभ होता है। सहजन के ताज़े पत्तों का रस कान में डालने से दर्द ठीक हो जाता है। सहजन की सब्जी खाने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाती है। सहजन की जड़ की छाल का काढा सेंधा नमक और हिंग डालकर पीने से पित्ताशय की पथरी में लाभ होता है। सहजन के पत्तों का रस बच्चों के पेट के कीड़े निकालता है इसे जादू का पेड़ भी कहा जाता है। त्वचा रोग के इलाज में इसका विशेष स्थान है। सहजन के बीज धूप से होने वाले दुष्प्रभावों से रक्षा करते हैं। अक्सर इन्हें पीसकर डे केअर क्रीम में इस्तेमाल किया जाता है। बीजों का दरदरा पेस्ट चेहरे की मृत त्वचा को हटाने के लिए स्क्रब के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है।
फेस मास्क बनाने के लिए सहजन के बीजों के अलावा कुछ और मसाले भी मिलाना पड़ते हैं। सहजन के बीजों का तेल सूखी त्वचा के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह एक ताकतवर मॉश्चराइजर है। इसके पेस्ट से खुरदुरी और एलर्जिक त्वचा का बेहतर इलाज किया जा सकता है। सहजन के पेड़ की छाल गोखरूए कील और बिवाइयों के इलाज की अक्सीर दवा मानी जाती है। सहजन के बीजों का तेल शिशुओं की मालिश के लिए प्रयोग किया जाता है। त्वचा साफ करने के लिए सहजन के बीजों का सत्व कॉस्मेटिक उद्योगों में बेहद लोकप्रिय है। सत्व के जरिए त्वचा की गहराई में छिपे विषैले तत्व बाहर निकाले जा सकते हैं। सहजन के बीजों का पेस्ट त्वचा के रंग और टोन को साफ रखने में मदद करता है।मृत त्वचा के पुनर्जीवन के लिए इससे बेहतर कोई रसायन नहीं है। धूम्रपान के धुएँ और भारी धातुओं के विषैले प्रभावों को दूर करने में सहजन के बीजों के सत्व का प्रयोग सफल साबित हुआ है। सहजन के पौष्टिक गुणों की तुलना विटामिन सी. संतरे से सात गुना.विटामिन ए. गाजर से चार गुना।कैलशियम. दूध से चार गुना। पोटेशियम. केले से तीन गुना। प्रोटीन. दही की तुलना में तीन गुना। सहजन के बीज से पानी को काफी हद तक शुद्ध करके पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
चिकित्सकों का मानना है कि सहजन उपयोगी है। इसमें न सिर्फ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के गुण है बल्कि इसकी पत्तियों के इस्तेमाल से दूसरे रोगों को भी रोका जा सकता है। जैसे डायबटीजए अर्थराइटिस जैसी बीमारियों को रोका जा सकता है। जबकि उत्तर भारत में यह साल में एक बार ही फली देता है। सहजन में पोषक तत्वों जैसे. प्रोटीनए ऑयरनए बीटा कैरोटीनए अमीनो एसिड, कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम, विटीमिन ए, सी और बी काम्प्लेक्स अधिकता होने के कारण इसे कुपोषण को रोकने एवं इसके इलाज में प्रयोग किया जाता है।
सहजन पेड को कटिंग या बीज द्वारा बड़ी आसानी से घर के आस.पास पार्क में बड़े गमलों में लगाया जा सकता है। उत्तराखण्ड में वन विभाग इन पौधों की प्रजाति विकसित करने के लिए इन्हें पर्वतीय क्षेत्र के वन क्षेत्रों में विकसित कराएगा। उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में पहुंच से दूर सहजन वृक्ष की प्रजाति को विकसित करने के लिए यहां वन अनुसंधान केंद्र ने कदम आगे बढ़ाए हैं। किसानों, उत्पादकों और व्यापारियों निर्यातकों को बेहतरीन अवसर मुहिम में जुट चुकी है सरकार को सिर्फ बुनियादी सुविधाओं को देकर लोगों को परिचित कराने की जरूरत है। इससे जहां सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी होती तो वहीं स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी मिलतेअगर सब ठीक.ठाक रहा तो इस योजना के तहत उत्तराखंड की पहचान मिलने की प्रबल संभावना है।

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