डॉ हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में हरेला केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था, जीवन के प्रति संवेदना और पर्यावरण के साथ सह-अस्तित्व का जीवंत दर्शन है। सदियों से यह पर्व हमें यह संदेश देता आया है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध उपभोग का नहीं, बल्कि संरक्षण और सहजीवन का है। खेतों में उगाए गए हरे अंकुर, घर-आँगन में बोया गया हरेला और धरती के प्रति कृतज्ञता की भावना इस पर्व की आत्मा हैं।
आज भी हरेला के अवसर पर पूरे उत्तराखंड में लाखों पौधे लगाए जाते हैं। सरकारी विभाग, जनप्रतिनिधि, सामाजिक संस्थाएँ, विद्यालय, महाविद्यालय और आम नागरिक इस अभियान में भाग लेते हैं। यह निश्चित ही एक स्वागतयोग्य प्रयास है। किंतु इस अवसर पर कुछ ऐसे प्रश्न भी हैं, जिनसे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।
क्या पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल एक दिन पौधे लगाना है? क्या वर्ष के शेष 364 दिनों तक प्रकृति हमारी प्राथमिकताओं से बाहर हो जाती है? क्या वृक्षारोपण अब एक सामाजिक दायित्व से अधिक एक औपचारिक कार्यक्रम बनकर नहीं रह गया है?
आज हरेला के दिन कैमरों के सामने हजारों पौधे लगाए जाते हैं। अगले दिन वे पौधे किस स्थिति में हैं, कितने जीवित बचे, कितनों को पानी मिला, कितनों की रक्षा हुई—यह प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है। यदि लगाए गए पौधों का जीवन कुछ दिनों का ही हो, तो वृक्षारोपण केवल आँकड़ों का उत्सव बनकर रह जाता है, पर्यावरण संरक्षण का नहीं।
इससे भी बड़ा प्रश्न विकास की उस अवधारणा पर है, जिसे हम प्रगति का पर्याय मान बैठे हैं। एक ओर हम वृक्षारोपण के अभियान चलाते हैं, दूसरी ओर विकास, विस्तार और निर्माण के नाम पर वर्षों पुराने, विशाल और जीवनदायी वृक्षों को काटने में संकोच नहीं करते। सैकड़ों वर्ष पुराने वृक्ष कुछ घंटों में धराशायी कर दिए जाते हैं, जबकि एक नए पौधे को उसी स्तर तक पहुँचने में दशकों का समय लगता है। क्या इस विरोधाभास पर समाज को विचार नहीं करना चाहिए?
विकास आवश्यक है, लेकिन वह विकास जो प्रकृति को नष्ट करके प्राप्त हो, अंततः मानव सभ्यता को ही संकट में डाल देता है। यदि सड़कें चौड़ी हों लेकिन हवा विषैली हो जाए, यदि भवन ऊँचे हों लेकिन वर्षा का संतुलन बिगड़ जाए, यदि शहर आधुनिक हों लेकिन नदियाँ सूख जाएँ, तो ऐसी प्रगति कितनी सार्थक है?
आज पर्यावरण भी कई बार राजनीति, प्रचार और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का माध्यम बनता दिखाई देता है। वृक्ष लगाने की तस्वीरें, अभियान के बड़े-बड़े पोस्टर, सोशल मीडिया पर संदेश, सम्मान समारोह, पुरस्कार और चर्चाएँ—इन सबके बीच कहीं वह पौधा पीछे छूट जाता है जिसके नाम पर यह सब किया जाता है।
यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। यह पूरे समाज से जुड़ा प्रश्न है। क्या हम कभी स्वयं से पूछते हैं कि हमने अपने जीवन में कितने वृक्ष लगाए और उनमें से कितनों को वृक्ष बनने तक बचाया? पौधा लगाना आसान है, उसे वर्षों तक जीवित रखना कठिन है। प्रकृति को दिखावे की नहीं, निरंतर सेवा की आवश्यकता होती है।
इतिहास साक्षी है कि जिन लोगों ने प्रकृति की सबसे अधिक सेवा की, उन्होंने कभी प्रसिद्धि की इच्छा नहीं की। उन्होंने पेड़ों को इसलिए नहीं बचाया कि उन्हें सम्मान मिलेगा, बल्कि इसलिए बचाया क्योंकि वे जानते थे कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं, जीवन हैं; केवल छाया नहीं, भविष्य हैं; केवल ऑक्सीजन नहीं, आने वाली पीढ़ियों की साँस हैं।
आज आवश्यकता इस बात की भी है कि आम नागरिक भावनाओं के साथ-साथ तथ्यों को भी समझे। कहीं ऐसा तो नहीं कि पर्यावरण के नाम पर उसे केवल भीड़ का हिस्सा बनाया जा रहा हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके उत्साह का उपयोग किसी की व्यक्तिगत या राजनीतिक छवि निर्माण के लिए हो रहा हो? समाज को यह समझना होगा कि किसी भी अभियान का मूल्य उसके उद्देश्य, उसकी निरंतरता और उसके परिणामों से तय होता है, केवल उसकी भव्यता से नहीं।
यदि नेतृत्व करने वाले लोग स्वयं निस्वार्थ भाव से पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण प्रस्तुत करें, यदि वे जितने पौधे लगाएँ उतने ही पौधों के संरक्षण का संकल्प भी लें, यदि विकास योजनाओं में प्रत्येक कटने वाले वृक्ष के स्थान पर अनेक वृक्षों को सुरक्षित रूप से विकसित करने की जवाबदेही सुनिश्चित हो, यदि विद्यालयों में बच्चों को केवल पौधे लगाने का नहीं बल्कि उन्हें जीवित रखने का संस्कार दिया जाए, तभी हरेला का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।
हरेला हमें यह नहीं सिखाता कि एक दिन पौधे लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दें। वह हमें यह सिखाता है कि हर दिन धरती के प्रति कृतज्ञ रहें। प्रकृति को माँ कहने का अर्थ केवल उसे प्रणाम करना नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व की रक्षा करना भी है।
आज आवश्यकता किसी एक दिन के उत्सव की नहीं, बल्कि पूरे वर्ष चलने वाली पर्यावरण संस्कृति की है। आवश्यकता केवल पौधों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि वृक्षों का जीवन बचाने की है। आवश्यकता केवल भाषणों की नहीं, बल्कि मौन सेवा की है। आवश्यकता केवल अभियान चलाने की नहीं, बल्कि अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करने की है।
जब वृक्षारोपण से अधिक वृक्ष संरक्षण पर बल दिया जाएगा, जब प्रचार से अधिक प्रकृति का महत्व होगा, जब स्वार्थ से अधिक सेवा का भाव होगा, जब पुरस्कार से अधिक उत्तरदायित्व का मूल्य होगा—तभी हरेला अपने वास्तविक अर्थों में हरियाली का महापर्व बनेगा।
आइए, इस हरेला पर केवल पौधे लगाने का संकल्प न लें, बल्कि यह भी संकल्प लें कि हम किसी भी पेड़ को अनावश्यक रूप से कटने नहीं देंगे, लगाए गए प्रत्येक पौधे को वृक्ष बनने तक उसका संरक्षक बनेंगे, और पर्यावरण संरक्षण को किसी एक दिवस का कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपने जीवन का स्थायी संस्कार बनाएँगे।
क्योंकि धरती को हमारी औपचारिक उपस्थिति नहीं, हमारे निस्वार्थ कर्मों की आवश्यकता है। हरेला तभी सार्थक होगा, जब हर दिन हरियाली का होगा।
लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











