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कठिनाइयों में भी प्रकृति प्रेम कमजोर नहीं पड़ा

02/03/21
in उत्तराखंड, बागेश्वर
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चिपको आंदोलन से प्रभावित बागेश्वर के जगदीश ने 40 साल में 25 हजार से अधिक पौधे रोपे, 01 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात के 74 वें संस्करण में जल संरक्षण के क्षेत्र में 40 साल से कार्य कर हरे गरुड़ तहसील के सिरकोट गांव के जगदीश कुनियाल का जिक्र कर उन्हें राष्ट्रीय फलक पर प्रसिद्ध कर दिया। 18 साल की छोटी सी उम्र से बंजर जमीन को आबाद करने वाले कुनियाल प्रधानमंत्री की प्रशंसा से गदगद हैं। वह इसे अपने जीवन का अमूल्य क्षण बताते हैं।

मात्र 13 साल की उम्र में कुनियाल के पिता का निधन हो गया था। सबसे बड़ा बेटा होने के कारण छोटी सी उम्र में उनके ऊपर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने अपने से छोटे नौ भाई.बहनों की परवरिश के साथ ही बंजर जमीन को आबाद करने की दोहरी चुनौती को बखूबी निभाया। उन्होंने 250 नाली बंजर पैतृक जमीन में कई प्रजाति के पौधे रोपे । बंजर जमीन को उपजाऊ बनाना आसान नहीं था। दिन.रात की कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी। उनके बसाए जंगल को कई बार नष्ट करने की भी कोशिश की गई। वह पौधे रोपते और कुछ अराजक तत्व उन्हें नष्ट कर देते। जंगली जानवरों का खतरा अलग था। इन कठिनाइयों ने भी उनके प्रकृति प्रेम को कमजोर नहीं पड़ने दिया। वह अनवरत अपने कार्य में लगे रहे और उनकी मेहनत का ही नतीजा है, आज वह एक हरे.भरे जंगल के जनक हैं।

अब तक वह 25 हजार से अधिक पौधे रोप चुके हैं। यह सिलसिला अनवरत चल रहा है। शोरशराबे और दिखावे से दूर वह प्रकृति को बचाने के लिए समर्पित हैं। किशोरावस्था से शुरू हुआ उनका प्रकृति प्रेम अब भी जारी है। उन्होंने बंजर जमीन को अपने कठिन तप से उपजाऊ बनाया। इसके बाद पौधे रोपने शुरू किए। जंगल को बार.बार नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती रही। इसको देखते उन्होंने 20 साल पहले निजी खर्च पर दो स्थानीय युवाओं को जंगल की सुरक्षा के लिए रोजगार पर रखा। युवाओं को रोजगार देने के बाद उनकी आय के संसाधन जुटाने के लिए चाय की खेती भी करनी शुरू की। चाय का उत्पादन शुरू होने के बाद से दोनों कर्मचारियों को भी अच्छी आय हो रही है। गरुड़ तहसील के सिरकोट, परकोटी, कंधार और कालीगढ़ गांव के लिए पेयजल का एकमात्र जरिया सीम गधेरा सूखने की कगार पर पहुंच गया था। इससे सिंचाई और पीने के पानी की समस्या पैदा होने लगी थी। ऐसे समय में जगदीश कुनियाल ने गधेरे को रिचार्ज करने के लिए भगीरथ प्रयास किए। उन्होंने गधेरे और जलस्रोत के आसपास चौड़ी पत्तीदार पौधे रोपे। जलस्रोत से निकलने वाली धारा के प्रवाह मार्ग में कई छोटे.छोटे रिचार्ज पिट भी बनाए। धीरे.धीरे पौधे बड़े होते गए और जलस्रोत सदानीरा बन गया। वर्तमान में इस जलस्रोत से क्षेत्र के 400 ग्रामीणों को शुद्ध पेजयल मिल रहा है। गांव की 500 नाली से अधिक खेती को भी सिंचाई के लिए पानी मिल रहा है।

कुनियाल का कहना है कि प्रयास करने से हर मुश्किल आसान हो जाती है। उन्होंने अपने वन में गर्म स्थानों में पाया जाने वाला शीशम उगाया है तो उच्च हिमालयी क्षेत्रों का अंगू पौधा भी लगा रखा है। वह कहते हैं कि बिना किसी मदद के उन्होंने इन पौधों को अपने यहां रोपा और गर्मी और शीत वाली जगह पैदा होने वाले दोनों पौधे अब पेड़ बन चुके हैं। पौधरोपण की प्रेरणा चिपको आंदोलन के बारे में पढ़कर मिली। प्रदेश में चाय की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक बड़ा जरिया बन सकती है। सरकार प्रदेश में चाय की खेती का विस्तार कर रही है। इसके लिए जमीन का चयन कर लिया गया है। जल्द ही चाय के पौधों का रोपण किया जाएगा। इस खेती के लिए जमीन देने वाले किसानों को प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को रोजगार भी दिया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्तराखंड की चाय को जैविक ब्रांड के रूप में पहचान दिलाई जाएगी। इसके लिए ब्रांडिंग व मार्केटिंग पर विशेष रणनीति बनाई जाएगी। गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित इस अहिंसक आंदोलन की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इसका नेतृत्व महिलाओं ने ही आंदोलन के केंद्रीय ताने.बाने को बुना। ऐसा इसलिए भी वृक्षों की कटाई के कारण जंगल में लकड़ी की कमी और पीने के पानी का अभाव से यही समूह सीधे तौर पर प्रभावित होता है। पारिस्थितिकी मनुष्य और प्रकृति के संबंधों का शास्त्र है। मनुष्य और प्रकृति का संबंध मां.बेटे जैसा है, लेकिन जब हम आर्थिक लाभ के लिए जंगल का दोहन करते हैं, तो थोड़े समय के लिए जरूर लाभ दिखता है, पर हमेशा के लिए विनाश होता है। आज भी पृथ्वी प्राकृतिक संसाधनों पर ही टिकी हुई है। जल, जंगल, जमीन मनुष्य के लिए जीवन के आधार हैं, इसकी तुलना पूंजी के साथ करना बेमानी है। हमें अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सतत अर्थतंत्र वाले पेड़ों को बचाने की जरूरत है।

विकास के नाम पर हो रहे नए प्रयोग से आम इंसान बेहद परेशान है। पश्चिम इस समस्या को भुगत रहा है। अब वह इस मानव विरोधी विकास को हम सब पर थोप रहा है या हम उनकी राह पर चल पड़े हैं, इस बात को हमें भलीभांति जान लेना चाहिए। वर्तमान दौर में भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के नाम पर जो विकास की आंधी चली है, यह मनुष्य को खतरनाक मोड़ पर ले जा रही है। आज का विकास प्रकृति के शोषण पर टिका है। जिसमें गरीब, आदिवासी को प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किए जाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। भोगवादी सभ्यता ने हम सभी को बाजार में खड़ा कर दिया है। कहीं वर्षों से सुनते आ रहे हैं कि अगला विश्वयुद्ध यदि हुआ तो उसका कारण जल.संकट होगा।

संसार में उपलब्ध जल का 97 प्रतिशत जल खारा है, शुद्ध जल की मात्रा सिर्फ़ तीन प्रतिशत है। उसमें से दो प्रतिशत उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों पर बर्फ़ के रूप में जमा हुआ है। शेष एक प्रतिशत जल में से आधा भू.जल है और आधा वर्षा के रूप में धरती पर प्राप्त होता है, जिसे सहेजकर रखने की परम्परा अब तक भारत में विकसित नहीं हो पाई है। कम.वृक्षारोपण और रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अपनाने की अनिवार्यता होनी चाहिए। मीरा बेन ने 1949 में लिखा. दुख की बात है कि आज के शिक्षित और संपन्न वर्ग अपने अस्तित्व का मूलाधार धरती माता और उससे पोषित जीवों से अनजान हैं। मौका मिलते ही मनुष्य प्रकृति की सुनियोजित से.कम नवनिर्मित भवनों में दुनिया को लूटने, समाप्त करने में और अव्यवस्थित करने में लग जाता है। अपने विज्ञान और मशीनों के प्रयोग से कुछ समय के लिए उसे भले ही बहुत लाभ मिलता हो, परन्तु उसका अन्तिम परिणाम विध्वंस ही होगा। अगर शारीरिक और नैतिक रूप से स्वस्थ जाति बनकर हमें जीना है तो प्रकृति के संतुलन को समझ कर हमें उनके कानून का पालन करना चाहिए। जल जंगल और जमीन के संरक्षण के लिए निम्न बिन्दुओं पर ध्यान देना समचीन होगा । भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ अधिसंख्यक आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है और बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, वहाँ सरकार का यह दायित्व है कि औद्योगीकरण से लेकर आवास.समस्या हल करने तक जितनी भी नीतियाँ बनायी जायें उनमें पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाये। दुर्भाग्यवश आज भी भारत की नीतियाँ विश्व बैंक और हार्वर्ड द्वारा ही निर्धारित की जाती हैं, जिनकी सोच भारतीय आवश्यकताओं से कतई मेल नहीं खाती। सरकार को स्वयं ही अपने देश की आवश्यकता को ध्यान में रखकर अपनी क्षमता के अनुरूप उन्नति, विकास एवं पर्यावरण, संरक्षण हेतु नीतियों का निर्धारण करना चाहिए और इसमें विभिन्न संस्थाओं के साथ.साथ जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

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