अब पहाड़ की कई विधानसभा सीटों पर मैदान से अधिक मतदाता, इस परिसीमन को कैसे जस्टिफाई करेंगे पहाड़ विरोधी?
क्यों नहीं उठनी चाहिए 2002 के परिसीमन को फिर से लागू करने की मांग?
शंकर सिंह भाटिया
देहरादून। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद हुए परिसीमन के अनुसार पहली बार 2002 में उत्तराखंड विधानसभा के पहले चुनाव हुए थे। इस दौरान उत्तराखंड में परिसीमन हुआ। सन् 2006 में पूरे देश में परिसीमन हुआ केवल चार साल के अंदर उत्तराखंड में फिर से परिसीमन कर दिया गया। इस दौरान देश के पांच राज्यों ने परिसीमन आयोग को एक चिट्ठी लिखकर उनके राज्य में परिसीमन को गैरजरूरी बताया। उन राज्यों में नए सिरे से परिसीमन नहीं हुआ, पूर्ववत बना रहा। चूंकि उत्तराखंड में उत्तराखंड विरोधी नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, इसलिए चार साल के अंदर ही नए सिरे से परिसीमन होने दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि 88 प्रतिशत भूभाग वाले पहाड़ से छह सीटें कम कर दी गई और सिर्फ 12 प्रतिशत भूभाग वाले मैदान में छह सीटें बढ़ा दी गईं। इस तरह विधानसभा सीटों का सत्ता संतुलन मैदान के पक्ष में कर दिया गया। यह सब जानबूझकर किया गया, इसमें भाजपा-कांग्रेस समेत उत्तराखंड खासकर पहाड़ विरोधी ताकतें मजबूती से अंदरखाने काम करती रही। हर बार की तरह पहाड़ समर्थक बहुत अधिक कमजोर पड़ गए। उसके बाद पहाड़ के नेताओं का मैदान की तरफ पलायन का दौर शुरू हो गया।
सन् 2002 का परिसीमन जेम्स माइकिल लिंगदोह की अध्यक्षता में हुआ। पूर्वोत्तर निवासी लिंगदोह पहाड़ की समस्याओं से अच्छी तरह से वाकिफ थे, इसलिए उन्होंने निष्पक्ष होकर परिसीमन कार्य किया। 2006 का परिमन मनोहर सिंह गिल की अध्यक्षता में हुआ। कां्रग्रेसी विचारों वाले मनोहर सिंह गिल ने परिसीमन से पहले ही बयानबाजी शुरू कर दी। उन्होंने साफ कर दिया कि पहाड़ से सीटें कम होंगी, परिसीमन का फोकस जनसंख्या ही रहेगा। हालांकि जब परिसीमन का पूर्ण हुआ तो उन्होंने दावा किया कि परिसीमन में पहाड़ को दस प्रतिशत वेरिएशन दिया गया। इसलिए पहाड़ से सिर्फ छह सीटें कम हुई, अन्यथा बारह सीटें कम होती। वेरिएशन का मतलब यह बताया गया कि यदि मैदान में एक लाख दस हजार वोटरों में एक विधानसभा सीट बनेगी तो इसके मुकाबले पहाड़ में एक लाख वोटरों में एक सीट तय हो जाएगी। गौरतलब है कि निर्वाचन आयोग में गिल का कार्यकाल पूर्ण होने के बाद कांग्रेस की केंद्र सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया गया। इसी से समझा जा सकता है कि गिल जब उत्तराखंड में परिसीमन का जाल बिछा रहे थे, उनके दिमाग में एक निष्पक्ष परिसीमन आयोग का अध्यक्ष नहीं बल्कि एक कांग्रेसी काम कर रहा था।
एसआईआर के बाद अब उत्तराखंड की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हो चुकी है। इस सूची के अनुसार देहरादून की राजपुर रोड सीट के मुकाबले बदरीनाथ और केदारनाथ सीट में अधिक मतदाता हैं। मतलब यह हुआ कि मैदान की कई सीटों में पहाड़ की सीटों के मुकाबले कम मतदाता हैं। इस स्थिति में 2006 के परिसीमन में पहाड़ को दिया गया वेरिएशन उलट गया है। क्यों नहीं उत्तराखंड में 2002 के परिसीमन को फिर से लागू कर दिया जाए? जिससे पहाड़ के साथ हुए अन्याय को न्याय में बदला जा सके।
बहुत साफ है कि सत्ता के दो प्रमुख दावेदार राष्ट्रीय दल भाजपा तथा कांग्रेस के लिए यह मुद्दा नहीं हो सकता है। उनसे यह अपेक्षा की भी नहीं जा सकती है कि वे पहाड़ को न्याय दिलाने की इस लड़ाई में आगे भी आएंगे। वे ताकतें जिन्हें लगता है कि यह राज्य जो पहाड़ के नाम पर ही बना, लेकिन इन 26 सालों में पहाड़ को न्याय देने की बात छोड़ दीजिए दिल्ली से संचालित होने वाले दलों ने लगातार पहाड़ से सिर्फ अन्याय किया। पहाड़ की लड़ाई लड़ने वाले क्षेत्रीय दलों को चाहिए कि न्याय दिलाने की इस लड़ाई के लिए कमर कस लें। अब यह लड़ाई सिर्फ उन ताकतों की बन गई है जो तब परिसीमन के खिलाफ तब लड़े थे, जिन्हें अब भी लगता है कि यह लड़ाई का अच्छा मौका है। 2027 के चुनाव में अब बहुत कम समय बचा रह गया है। इसे ऐसी ताकतें चुनावी मुद्दा भी बना सकती हैं, निश्चित रूप से उन्हें चुनाव में इसका फायदा भी मिलेगा। बस जरूरत है, लड़ाई को मजबूती से लड़ा जाए। पूरी रणनीति बनाकर लड़ा जाए।














