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प्रखर राज्य आंदोलनकारी स्व. निर्मल पंडित

16/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
निर्मल पंडित छोटी उम्र मैं ही जन-आंदोलनो की बुलंद आवाज बन कर उभरे थे। 1991-92मे पहली बार पिथौरागढ़ महाविद्यालय मे छत्रसंध महासचिव चुने गए। छात्रहितों के प्रति उनके समर्पण का ही परिणाम था की वह 3 बार इस पद पर चुनाव जीते। इसके बाद वह पिथौरागढ़ महाविद्यालय के छात्रसंध के अध्यक्ष भी बने।उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के समय पिथौरागढ़ के एक छात्रनेता ने जिलाधिकारी ऑफिस के बाहर आत्मदाह कर लिया। करीब-करीब दस-पन्द्रह दिन तक इस छात्रनेता के बारे में अलग-अलग बातें की जाती थी।कोई कहता किसी ने मिट्टी तेल के जार में पेट्रौल मिला दिया, कोई कहता पुलिस वालों ने कम्बल नहीं डालने दिया, कोई कहता उसके किसी दोस्त ने गद्दारी कर दी, कोई कहता पुलिस ने गद्दारी कर दी।लोगों के बीच ये चर्चायें कम हुई थी कि महीने भर बाद अचानक खबर आई, दिल्ली में छात्रनेता की मौत हो गयी. इस घटना के कई सालों तक इस छात्रनेता का नाम पिथौरागढ़ कॉलेज इलेस्कशन में लिया जाता रहा. नाम है निर्मल पंडित। बुरी खबर यह थी कि एक युवा जिसने राज्य के लोगों के लिये अपनी जान दे दी उसके परिवार को वृद्धावस्था पेंशन के लिये भटकना पड़ा। कुछ साल पहले खबर आई थी कि निर्मल पंडित को राज्य सरकार ने अब तक राज्य आन्दोलनकारी का दर्जा नहीं दिया।हम लम्बे समय तक निर्मल पंडित की बातें सुनते आये।जब कभी प्रदर्शन होता तो लोग कहते अभी निर्मल दा होता तो ऐसा कर देता। नब्बे के दशक में बड़े हुये पिथौरागढ़ के लोगों के लिये निर्मल पंडित एक नाम नहीं एक हीरो था। एक हीरो जिसको हमने कभी करीब से नहीं देखा।निर्मल पंडित वो नाम है जिसके नेतृत्व में कलेक्टर की एम्बेसडर राज्य आन्दोलनकारियों में अपने कब्जे में ली थी। इस एम्बेसडर कार में जिलाधिकारी के बोर्ड की जगह लिखा होता मुख्यमंत्री। एक समय निर्मल की लोकप्रियता इतनी बढ गयी कि सरकार ने उसे जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के आदेश दे दिए। वर्ष 1994 में राज्य की मुलायम सिंह सरकार ने ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा की। आरक्षण को लेकर लोगों में रोष पनप उठा। 27 जुलाई 1994 को छात्रनेता निर्मल जोशी पंडित ने पिथौरागढ़ महाविद्यालय में प्रवेश पत्र फाड़कर ओबीसी आरक्षण की मुखालफत की। ओबीसी आरक्षण के विरोध में पूरे राज्य में छात्रशक्ति और अन्य लोग लामबंद हो गए। आरक्षण की आग पूरे पर्वतीय क्षेत्र में फैली तो लोगों ने उत्तर प्रदेश में नहीं रहने का मन बना लिया और पृथक पर्वतीय राज्य की दशकों से उठ रही मांग को लेकर लोगों ने कमर कस ली।1998 में जब सरकार ने शराब के नये टेंडर निकाले तो निर्मल पंडित ने इसका विरोध किया. उसने विरोध में आत्मदाह करने की घोषणा की. तय तारीख के दिन अपने जिले के जिलाधिकारी कार्यालय के सामने उसने आत्मदाह किया. जब तक कि महकमें के कानों में जूं रेंगती निर्मल पंडित का 65 प्रतिशत शरीर जल चुका था.उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के समय निर्मल पंडित के बहुत से साथी आज बारी-बारी से सत्ता की गोद में बैठे हैं. जिस ठसक से वो कहते हैं कि उन्होंने भी निर्मल पंडित के साथ लड़ाई लड़ी है, आप अंदाजा लगा सकते हैं कि निर्मल पंडित का नाम राज्य आन्दोलन में कितना बड़ा है. राज्य आंदोलनकारी गोपू महर का कहना है कि राज्य बनने के सभी सरकारों ने पंडित की उपेक्षा की है. आलम ये है कि उनकी बूढ़ी मां तमाम अभावों को झेलते हुए अपना जीवन यापन कर रही हैं. साथ ही महर ने कहा कि एक तरफ सरकार गैरसैंण में विधानसभा का सत्र चलाकर करोड़ों रुपया बहा रही है. वहीं दूसरी ओर जिस पंडित के संघर्ष से राज्य बना है, उसे उचित सम्मान नहीं दे रही है निर्मल पंडित ने पिथौरागढ़ में शराब के ठेकों के खिलाफ चलाए गए आंदोलन के दौरान मार्च 1998 में अपने शरीर पर आग लगा दी थी। 16 मई 1998 को दिल्ली के एक अस्पताल में उसका निधन हो गया। उससे पहले उसने छात्रसंघ अध्यक्ष की हैसियत से 1994 में राज्य आंदोलन को गति देने का बड़ा प्रयास किया। बेटे की मौत की बाद गहरे विषाद में डूबे निर्मल के पिता ईश्वरी प्रसाद जोशी का भी 2006 में निधन हो गया। तीन बहनों में परिवार में निर्मल अकेले भाई थे। मां प्रेमा जोशी अब 74 वर्ष की हो गई हैं। वह अपनी बेटी गीता पंत के साथ हल्द्वानी के गिरजाविहार कमलुवागांजा में रहती हैं। श्रीमती प्रेमा ने बताया कि बेटे ने राज्य के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी लेकिन राज्य गठन के बाद सत्ता का सुख भोगने वालों को कभी उसकी याद नहीं आई। मात्र वृद्धावस्था पेंशन के नाम पर कुछ रुपये उनको मिलते हैं। राज्य आंदोलनकारी राज्य के वर्तमान हालात से खासे व्यथित हैं। वह कहते हैं कि जिस अवधारणा के साथ उत्तराखंड के लोगों ने अपना घरबार छोड़कर राज्य आंदोलन की लड़ाई लड़ी, कुर्बानियां दी, वह सब आज व्यर्थ गंवाने जैसा प्रतीत होता है। राज्य बनने के बाद प्रदेश में बारी-बारी से सत्ता संचालन कर रहे राजनीतिक दल पहाड़ के पानी और जवानी का उपयोग तक नहीं कर पाए। राज्य गठन के मुद्दे हाशिये पर हैं। जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट तहसील के अन्तर्गत 1970 में पोखरी गांव में जन्में स्व० पण्डित वर्ष 1991 में पहली बार पिथौरागढ महाविद्यालय में छात्रसंघ के महासचिव चुने गये थे कर्म निष्ठा के बल पर वे लगातार तीन बार इस पद पर रहे बाद में पिथौरागढ़ छात्र संघ अध्यक्ष भी रहेअपने जीवन काल में निस्वार्थ भाव से जन सेवा में सलग्न रहे प्रमुख राज्य आन्दोलनकारी की उपेक्षा सोचनीय
है शराब माफिया, खनन माफियाओं को जिन्होनें हिलाकर रक्खा वह निर्मल पण्ड़ित ही थे माँ महाकाली के ऑचल गंगोलीहाट के, पोखरी गांव में श्री ईश्वरी प्रसाद जोशी व श्रीमती प्रेमा जोशी के घर 1970 में जन्मे निर्मल की भावनाएं राज्य के प्रति बड़ी ही निर्मल थी शराब मुक्त राज्य का सपना देखने वाले निर्मल का सपना हालांकि सपना ही बनकर रह गया लेकिन उनकी विराट सोच आज भी लोगों के हृदय में आदरणीय रूप से अंकित है वर्ष 1993 में नशामुक्ति अभियान के तहत उन्होने एक सेमिनार का आयोजन भी किया थानिर्मल पंडित को अपने गांव पोखरी के अलावा अपने नैनिहाल चिटगल से भी विशेष लगाव था समय-समय पर वहां आकर वे युवाओं के साथ संवाद कायम करते थे यहां उन्हें पप्पू दा के नाम से ख्याति प्राप्त थी और राज्य के भीतर इनका इतना जबरदस्त प्रभाव था कि प्रशासन के बड़े – बड़े अधिकारी इनके सामने आने को कतराया करते थे राज्य आन्दोलन के समय समानान्तर सरकार का गठन किया गया था, जिसका नेतृत्व स्व० निर्मल पण्डित अर्थात् पप्पू दा के हाथों मे ही था वे जिला पंचायत सदस्य भी रहे थे शराब माफियायों और अवैध खनन माफियाओं के खिलाफ उन्होने जो मुहिम चलायी थी वह आज भी लोगों के जेहन में तरोताजा है 27 मार्च 1998 को नशा मुक्त उत्तराखण्ड के लिए शराब के ठेकों के खिलाफ अपने पूर्व घोषित आन्दोलन के अनुसार उन्होने आत्मदाह किया जिसमें वे बुरी तरह झुलस गये थे पिथौरागढ में कुछ दिनों के इलाज के पश्चात् उन्हें दिल्ली ले जाया गया जहाँ आज ही के दिन 16 मई 1998 को जिन्दगी मौत के बीच झूलते हुए अंततोगत्वा वे दिव्य लोक को प्रस्थान कर गए आज के ही दिन यानि 16 मई 1998 में सफदरजंग अस्पताल दिल्ली में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। तीन बार छात्रसंघ महासचिव व एक बार एलएसएसएम पीजी कॉलेज पिथौरागढ़ के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे पंडित छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। गंगोलीहाट की चिटगल सीट से पंडित जिला पंचायत सदस्य भी रहे। राज्य आंदोलन के दौरान वह 57 दिनों तक फतेहगढ़ जेल में भी रहे। 1996 में पुलिस भर्ती निरस्त कराने में भी पंडित की अहम भूमिका रही। पिथौरागढ़ में जब भी जनांदोलनों की बात होगी, पंडित को हमेशा याद किया जाएगा राज्य आंदोलनकारी का कहना है कि राज्य बनने के सभी सरकारों ने पंडित की उपेक्षा की है. आलम ये है कि उनकी बूढ़ी मां तमाम अभावों को झेलते हुए अपना जीवन यापन कर रही हैं. साथ ही महर ने कहा कि एक तरफ सरकार गैरसैंण में विधानसभा का सत्र चलाकर करोड़ों रुपया बहा रही है. वहीं दूसरी ओर जिस पंडित के संघर्ष से राज्य बना है, उसे उचित सम्मान नहीं दे रही है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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