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उत्तराखंड में नहीं है आपदा प्रबंधन का सुदृढ़ ढांचा, आपदाएं बरपाती हैं कहर

21/08/21
in उत्तराखंड, नैनीताल
Reading Time: 1min read
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ी राज्यों में कमजोर पहाड़ों से होने वाला भूस्खलन बड़ी दुश्वारी और चुनौती का सबब बना हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि भूस्खलन से निजात पाने के तमाम दावे हवा.हवाई साबित हो रहे हैं। देश, दुनिया में बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक भूस्खलन से जहां हर साल हजारों इंसानों को अपनी जिंदगी बचानी पड़ती है। वहीं अरबों की संपत्ति का नुकसान होता है। उत्तराखंड में सरकार और शासन इसके प्रति गंभीर नजर नहीं आते। वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी जैसे वैज्ञानिक संस्थानों को भी भूस्खलन के कारणों के विस्तृत अध्ययन करने व रोकने को लेकर ठोस उपायों की सिफारिश देने के लिए नहीं लगाया गया है।

हिमालयी राज्यों में भूस्खलन को लेकर समय.समय पर अध्ययन किए जा रहे हैं। हाल ही में वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के नैनीताल और मसूरी जैसे इलाकों में भूस्खलन को लेकर विस्तृत अध्ययन किया है और जिसकी रिपोर्ट भी सरकार शासन को सौंपी गई। लेकिन ऐसी प्राकृतिक आपदाओं को लेकर अभी कुछ किया जाना बाकी है आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील उत्तराखंड में आपदा प्रभावितों के विस्थापन एवं पुनर्वास के लिए नीति के मानकों में बदलाव की तैयारी है। इसके तहत दैवीय आपदा में घर क्षतिग्रस्त होने पर अनुदान राशि बढ़ाने, एक ही घर में रह रहे एक से ज्यादा परिवारों में सभी को क्षतिपूर्ति देने समेत अन्य कई प्रविधान प्रस्तावित किए गए हैं।

सूत्रों के अनुसार विस्थापन एवं पुनर्वास नीति में बदलाव के मद्देनजर वित्त विभाग की राय ली जा रही है। फिर राजस्व और विधि विभाग से राय लेने के बाद प्रस्ताव कैबिनेट में लाया जाएगा। समूचा उत्तराखंड अतिवृष्टि, भूस्खलन, भूकंप, बाढ़ जैसी आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील है। हर साल ही प्राकृतिक आपदाएं जनमानस के लिए परेशानी का सबब बनी हुई हैं। उत्तराखंड आपदा की दृष्टि से बेहद ही संवेदनशील है। यहां बाढ़, भूकंप, आंधी, तूफान, आग लगने, बादल फटने, भूस्खलन, सूख जैसे प्राकृतिक आपदाएं हर वर्ष अपना तांडव मचाती आ रही हैं। इन आपदाओं के समय आमजन और सिस्टम चुपचाप विनाश को देखने के लिए विवश होता है।

आपदा को लेकर न तो जन जागरूक बन पाया और न तंत्र जवाबदेह। आपदा में जनहानि के न्यूनीकरण, खोज बचाव, राहत बचाव के लिए आपदा प्रबंधन विभाग तो उत्तराखंड में गठित है, लेकिन इसका सुदृढ़ ढांचा अभी तक नहीं बन पाया है। आपदा प्रबंधन मंत्री ने आपदा के दौरान विभागीय जबावदेही सुनिश्चित करने के लिए विभागीय ढांचे में स्थायी कार्मिकों की नियुक्ति, संविदा व आउट सोर्स तीन श्रेणी के कार्मिकों की व्यवस्था की बात कही है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि ऐसे कार्मिकों की भर्ती की जाएए जो अपने.अपने क्षेत्र में दक्ष हों।जरूरत पड़ी तो इसके लिए विभागीय नियमावली में संशोधन किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने दौरान आपदा प्रबंधन के ढांचे को सुदृढ़ करने की बात कही है। इससे आपदा प्रबंधन विभाग में वर्षों से संविदा पर काम कर रहे कर्मियों को सुरक्षित भविष्य की उम्मीद है।

ज्योलीकोट.भवाली के बीच बीरभट्टी के पास बलियानाले पर बने वैली ब्रिज पर पहाड़ को खड़ा काटा जा रहा है। इस कारण ही यहां लगातार भूस्खलन की घटनाएं हो रही हैं। यहां शाम पांच बजकर 20 मिनट पर ऐसी ही घटना हुई है। गनीमत रही कि कोई वाहन भूस्खलन की चपेट में नहीं आया। घटना के बाद बीरभट्टी से भवाली के बीच वाहनों का आवागमन पूरी तरह से बंद हो गया है। नैनीताल जिले में ज्योलीकोट.भवाली हाईवे पर स्थित वीरभट्टी पुल एक बार फिर खतरे की जद में आ गया है। गुरुवार देर रात से हो रही भारी बारिश के कारण शुक्रवार शाम करीब पांच बजे पुल के आखिरी छोर पर पहाड़ी का बड़ा हिस्सा भरभरा कर गिर जाने के कारण आवागमन रोक दिया गया है। भूस्खलन के समय लोग पुल से आ जा रहे थेए लेकिन किसी हादसे की सूचना नहीं। पुल के इस पार खड़े लोगों ने आवाज लगाकर राहगीरों को इशारा करके रोक दिया। इससे सड़क बंद हो गई।

गुरुवार से ही राजधानी दून समेत कई इलाकों में बारिश जारी है। वहींए चमोली जिले में जोशीमठ.मलारी हाईवे तमक के पास लगातार भूस्खलन से बंद है। यहां छह दिन से 400 यात्री फंसे हुए हैं। गुरुवार को इन यात्रियों को निकालने के लिए देहरादून से हेलीकाप्टर रवाना किया गयाए लेकिन मौसम बिगड़ने के चलते हेलीकाप्टर को आधे रास्ते से लौटना पड़ा। उधरए भूस्खलन जोन के मुहाने पर दरारें आने से सड़क की मरम्मत भी नहीं हो पा रही है। हालांकिए एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के जवान लोगों को सुरक्षित पैदल निकालने के लिए रास्ता बनाने में जुटे हुएहैं।मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक कुमाऊं में मौसम का मिजाज एक बार फिर बदल गया है। देर रात से मंडल के सभी जिलों में झमाझम बारिश जारी है।

बागेश्‍वर में भारी बारिश के कारण सरयू का जलस्‍तर बढ़ गया है। नैनीतालए हल्‍द्वानीए चंपावत में भी तेज बारिश हो रही है। बारिश के कारण पर्वतीय जिलों में आवागमन खतरनाक हो गया है। लैंडस्‍लाइड का खतरा बढ़ गया है।चमोली के नीति बॉर्डर हाईवे पर हाल ही में जबरदस्त भूस्खलन हो गया और भारी बोल्डरों के कारण हाइवे बंद हो रखा है। बता दें कि भूस्खलन इतना जबरदस्त था कि हाईवे को खोलने में कुछ दिनों का समय लग सकता है। वहीं सड़क बंद होने के कारण वाहनों की लंबी.लंबी कतारें हाईवे पर देखी जा सकती हैं। नीति बॉर्डर की सरहद पर बसे दर्जनों गांव की आवाजाही बंद हो चुकी है। वहीं नीति घाटी में सेना की आवाजाही भी होती है और भूस्खलन के कारण आईटीबीपी और सेना की छावनियों में सामग्रियों का पहुंचाया जाना भी पूरी तरह ठप हो चुका है। हादसा जोशीमठ नगर से 39 किमी आगे तमक मरखुडा का बताया जा रहा है। वहां मूसलाधार बरसात के कारण जबरदस्त भूस्खलन हो गया और पहाडी से एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आ गिरा जिस कारण वहां पर सड़क पूरी तरह से बंद हो गई है।

अधिकारियों का कहना है कि भूस्खलन इतना जबरदस्त था कि सड़क को खोलने में कुछ दिनों का समय लग सकता है। ऐसे में नीति घाटी में मौजूद गांवों के लोगों का संपर्क मुख्य सड़क से पूरी तरह कट चुका है। तमक मरखुडा में पहाडी टूटने से जुमाए तमकए कागाए गरपकए द्रोणागिरीए जेलमए कैलाशपुरए मलारीए कोषाए नीतिए बाम्पाए मैहरगांवए गमशालीए आदि गांवों की आवाजाही पूरी तरह से ठप हो गई हैण् नीति घाटी सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है और यहां भूस्खलन के कारण आर्मी का बार्डर एरिया भी मुख्य धारा से कट गया है। नीति घाटी के तमक मरखुडा में पिछले 10 दिनों से मूसलाधार बरसात के कारण बार्डर हाईवे में पहाडी से भारी बोल्डर एवं मलबा आने का सिलसिला जारी है। इस वजह से यहां पर तकरीबन हर रोज सडक बाधित हो रही है। 13 अगस्त के दोपहर को भी यहां पर भारी भूस्खलन हुआ था और सड़क पूरी तरह बंद हो गई थी जिस कारण यातायात भी ठप पड़ चुका था। अभी तक यहां पर वह सडक सुचारू नही हो सकी है कि आज सुबह एक बार फिर से भूस्खलन ने बीआरओ की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
बीआरओ की मशीनें पिछले दो दिनोें से सड़क में आये बोल्डर एंव मलबे को हटा ही रही थी कि आज मरखुडा में पहाडी का बड़ा भाग टूटकर सडक में आ गय। सड़क सुचारू करने में बीआरओ को कुछ दिनों का समय लग सकता है। तब तक बार्डर एरिया एवं दर्जन भर गांवों की आवाजाही फिलहाल ठप रहेगी। राज्य मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक के मुताबिक कल 21 अगस्त को उत्तरकाशीए देहरादूनए नैनीतालए बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिले में तेज बौछार के साथ भारी बारिश हो सकती है। इस दिन भी ओरेंज अलर्ट है। इसके बाद तीन दिन का यलो अलर्ट है। 22 अगस्त को पौड़ीए नैनीतालए पिथौरागढ़ जिले में कहीं कहीं तेज बौछार के साथ भारी बारिश की संभावना है। 23 को देहरादून, टिहरी, पौड़ी, हरिद्वार, नैनीताल, चंपावत, पिथौरागढ़ बागेश्वर जिले में कहीं कहीं भारी बारिश की संभावना है। 24 अगस्त को भी राज्य कुमाऊं क्षेत्र में कहीं कहीं भारी बारिश का अनुमान है। उधर, भूस्खलन जोन के मुहाने पर दरारें आने से सड़क की मरम्मत भी नहीं हो पा रही है। हालांकि, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ के जवान लोगों को सुरक्षित पैदल निकालने के लिए रास्ता बनाने में जुटे हुए हैं।

मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक कुमाऊं में मौसम का मिजाज एक बार फिर बदल गया है। देर रात से मंडल के सभी जिलों में झमाझम बारिश जारी है। बागेश्‍वर में भारी बारिश के कारण सरयू का जलस्‍तर बढ़ गया है। नैनीतालए हल्‍द्वानीए चंपावत में भी तेज बारिश हो रही है। बारिश के कारण पर्वतीय जिलों में आवागमन खतरनाक हो गया है। लैंडस्‍लाइड का खतरा बढ़ गया है। पहाड़ियों से बरसात में पत्थरों के गिरने से दुघर्टनाओं का भय बना रहता है। साथ ही मलबा आने से यात्रियों को परेशान रहना पड़ता है। हालांकि की लोनिवि की जेसीबी पत्थरों और मलबे को हटाकर यातायात सुचारु कराती हैं। लेकिन बरसात में सफर करना जोखिम भरा रहता है। मानसून सीजन शुरू होते ही पहाड़ों का सफर न केवल मुश्किल भरा होता है बल्कि कई बार तो जानलेवा भी साबित होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि बरसात में सड़कों से सटी पहाड़ियां से भूस्खलन के साथ पत्थर गिरते हैं। हर साल ऐसी कई घटनाएं होती हैं लेकिन न तो विभाग और न ही सरकार इससे कोई सबक लेती है।

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