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दर्द निवारक दवा निमेसुलाइड के खिलाफ केंद्र सरकार का बड़ा फैसला

31/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
एक डॉक्टर सिर्फ बीमारी देखता है. वो डायग्नोसिस करता है, दवा लिखता है और आगे बढ़ जाता है. उसके लिए मरीज एक “केस” होता है, एक नंबर, एक फाइल होता है. उसकी आवाज में ठंडक होती है. नजरें घड़ी पर टिकी रहती हैं और शब्दों में जल्दबाजी होती है. वो सही हो सकता है, कुशल हो सकता है, लेकिन उसका इलाज सिर्फ शरीर तक ही पहुंचता है. दिल तक नहीं. मरीज उसके पास से उठता है तो शरीर में दवा तो होती है, लेकिन दिल में एक खालीपन, एक ठेस होती है.निमोस्लाइड दवा को 1985 में इटली में प्रस्तुत किया गया था और यह नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग श्रेणी की दवा है. दुनिया भर के कई देशों में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया,यूके, जापान और न्यूजीलैंड में इसे मंजूरी नहीं मिली. वहीं लंबे समय तक इसके प्रयोग से लीवर टॉक्सिसिटी, ब्लीडिंग, किडनी डैमेज और त्वचा पर रैश जैसी समस्याएं हो सकती हैं.केंद्र सरकार ने निमोस्लाइड दवा (पेन किलर) को लेकर बड़ा कदम उठाया है. इसको लेकर सरकार ने 100 एमजीसे अधिक खुराक वाली निमोस्लाइड की ओरल दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर तत्काल प्रभाव से बैन लगा दिया है.29 दिसंबर को स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस बैन की अधिसूचना जारी की. यह फैसला ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 26ए के तहत लिया गया है. सरकार का कहना है कि ये दवा स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरी हो सकती है. इसके कई सुरक्षित विकल्प मार्केट में मौजूद हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से नोटिफिकेशन जारी करते हुए बताया गया है कि 100 एमजी से अधिक वाली निमोस्लाइड दवा मनुष्यों के लिए खतरा पैदा कर सकती है. यह एक नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग है, इसका लीवर पर खराब प्रभाव हो सकता है. इसके अलावा इस दवा के अन्य प्रतिकूल प्रभावों की वजह से दुनिया भर में जांच की जा रही है. वहीं सरकार ने ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड की सलाह के बाद निमोस्लाइड दवा पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है. इसके साथ ही इस दवा पर अब पूरे देश में तुरंत प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया गया है. स्वास्थ्य मंत्रालय मनुष्य पर पेन किलर दवा के खतरे के मद्देनजर लिया है. जिससे लोगों की हेल्थ को किसी तरह का जोखिम नहीं हो. गौरतलब है कि पेनकिलर की डोज लेने की वजह से लिवर और किडनी पर प्रभाव पड़ता है. वहीं डॉक्टर भी पेनकिलर दवा के कम इस्तेमाल पर जोर देते हैं. सरकार ने पशुओं में उपयोग होने वाली सभी निमोस्लाइड दवाओं पर पहले ही बैन लगा दिया था. इसकी वजह पर्यावरण था, क्योंकि अध्ययन में पाया गया कि गिद्धों को यह दवा देने पर 24 घंटे में मौत हो जाती थी. भारत ने 2011 में बच्चों में निमोस्लाइड के प्रयोग पर रोक लगा दी गई थी, लेकिन बड़े मरीजों को इसे खिलाया जा रहा था. हालांकि मार्च 2023 में भारतीय फार्माकोपिया कमीशन ने इसको लेकर चेतावनी दी थी कि यह दवा फिक्स्ड ड्रग एरप्शन (बार-बार एक ही जगह रैश) भी पैदा कर सकती है. लंबे समय तक बिना डॉक्टरी परामर्श के ऐसी दवाओं का सेवन अंगों के फेल होने का कारण बन सकता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि बाजार में नाइमेसुलाइड के कई सुरक्षित विकल्प पहले से मौजूद हैं, इसलिए जोखिम भरी दवाओं के उपयोग को बंद करना ही जनहित में है। कई अध्ययनों में पाया गया कि 100 mg से ज्यादा डोज लेने से लीवर डैमेज का जोखिम बढ़ जाता है, जो कभी-कभी घातक हो सकता है। ICMR ने इसे पर्यावरणीय क्षति से भी जोड़ा है। इसके अलावा ऐसी दवाओं का इस्तेमाल इंसानों की सेहत के लिए अच्छा नहीं है, जबकि सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं। पैरासिटामॉल या इबुप्रोफेन जैसी दवाएं वैकल्पिक रूप से इस्तेमाल की जा सकती हैं। बता दें, भारत में इस दवा पर बच्चों के लिए पहले से ही बैन लग चुका है और अब वयस्कों के हाई डोज पर ध्यान दिया जा रहा है। यह ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 26A के तहत किया गया है।  विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े फार्मा हाउसेज पर सीमित प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि निमेसुलाइड NSAID मार्केट का छोटा हिस्सा है। हालांकि, छोटी कंपनियां जिनकी आय इस दवा पर निर्भर है, उन्हें नुकसान हो सकता है। सरकार का कहना है कि यह निर्णय लोगों की सेहत की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया है। अच्छा डॉक्टर समझता है कि अस्पताल सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि पीड़ित मानवता का आश्रय स्थल है. जहां हर आंसू को पोंछा जाना चाहिए, हर डर को गले लगाया जाना चाहिए. वहां हर शब्द एक घाव भर सकता है या नया घाव दे सकता है. आज का शिक्षित और जागरूक समाज यही मांग कर रहा है कि हमारे अस्पतालों में सिर्फ मशीनें और दवाइयां नहीं, बल्कि संवेदनशील दिल और सम्मानजनक शब्द भी हो, क्योंकि अन्ततः इलाज सिर्फ शरीर का नहीं, मन का भी है, जिसकी सच्ची दवा इंसानियत और करुणा है.” लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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