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राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा बन रहा पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन

16/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड अपनी नैसर्गिक सौंदर्यता के लिए के लिए जाना जाता है। जिसमें एक ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और दूसरी ओर कल-कल बहती नदियां इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। यह राज्य हमेशा से आपदाओं की चपेट में रहा है और कई सुंदर आंदोलनों का भी।जल, जंगल, ज़मीन के लिए लड़ने वाली महिलाओं ने चिपको आंदोलन दिया, तो वहीं कई आंदोलनकारियों की वजह से उत्तराखंड को एक राज्य का दर्जा भी प्राप्त हुआ। सन 2000 में आज ही के दिन उत्तराखंड को राज्य का दर्जा मिला था।पहाड़ों के बारे में एक कहावत मशहूर है कि पहाड़ का पानी और जवानी कभी वहां के काम नहीं आती, आलम ये है कि मूलभूत सुविधाओं के अभाव में आज गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं, समुचित व्यवस्था का अभाव में आने वाली मुश्किलों ने हमेशा से यहां के लोगों को अपनी जड़ों को छोडऩे के लिए मजबूर किया है, नेता और अधिकारी राजधानी में बैठकर पलायन रोकने के खोखले दावे कर रहे हैं।भारत गांवों में बसता, हर तीन में से दो लोग गांव में रहते हैं, मगर शहर को जाती भीड़ ने सब बदल रही है. गांव खाली और खेत बंजर हो गये. गांव के गली मोहल्ले विरान हो गये हैं. गांव में हर तरफ अलग तरह की चुप्पी छाई है. ये चुप्पी चुपके से पहाड़ी गांवों की असलियत बयां करती हैं. उत्तराखंड गठन के दो दशक बाद लगातार पलायन के कारण पहाड़ी गांव खाली हो रहे हैं. सरकारों की लाख कोशिशें, करोड़ों के बजट के बाद भी पलायन पर रोक नहीं लग पा रही है. जिससे पहाड़ों में भूतहा गांवों की संख्या बढ़ती जा रही है. बागेश्वर का भयेड़ी भी ऐसा ही एक गांव है. भयेड़ी गांव बागेश्वर जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर दूर स्थित है. इसके बाद भी ये गांव पलायन का दंश झेल रहा है. 110 घरों की आबादी वाला यह गांव अब धीरे-धीरे खाली हो रहा है. आज के समय में भयेड़ी गांव में केवल 52 परिवार ही शेष बचे हैं. गांव में जगह-जगह बंद पड़े मकानों पर लगे जंग लगे ताले और उग आई झाड़ियां इस बात का प्रमाण हैं कि लोग बेहतर भविष्य की तलाश में गांव छोड़ चुके हैं. यहां कच्चा पक्का घर अब बस बीते दिनों की बातों में है. अब गांवों में झाड़ झंकार, जंगली बेलें उग आई हैं. रास्तों पर जमी घास इसके निर्जन होने का प्रमाण है. कभी ग्रामीणों की आवाजाही से तारी रहने वाला भयेड़ी गांव धीरे धीरे खाली हो रहा है. स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार पिछले चार-पांच दशकों में गांव से पलायन की गति तेज हुई है. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण युवा पीढ़ी शहरों की ओर रुख कर रही है. ग्रामीणों ने कहा जो लोग पहले काम की तलाश में बाहर गए थे, उनमें से कई अब वहीं स्थायी रूप से बस गए हैं. उनके गांव लौटने की उम्मीद कम ही है. ग्रामीण ने बताया 1980 के दशक की शुरुआत में गांव में बिजली और पानी जैसी सुविधाएं तो पहुंच गई थीं, लेकिन उसके बाद विकास की रफ्तार धीमी पड़ गई. उनके मुताबिक, अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार के अवसर न मिलने से लोगों ने शहरों का रुख किया. अब कई परिवार वहीं स्थायी रूप से बस गए हैं. यदि गांव में पढ़ाई और रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध हों तो पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता है. उनका मानना है कि सरकार को पहाड़ी इलाकों में युवाओं के लिए रोजगार और सुविधाओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए. गांव की ही दुर्गा देवी ने बताया पहले गांव के लोग खेती-किसानी से ही अपना जीवन यापन करते थे. खेतों में धान, गेहूं, मंडुवा, झंगोरा, मसूर और गहत जैसी फसलें उगाई जाती थीं. अब खेती पर जंगली जानवरों का खतरा बढ़ गया है. जंगली जानवर मेहनत की खेती को चौपट कर देते हैं. जिसके कारण लोगों का रुझान इस ओर कम हुआ है. काम करने वाले लोगों की कमी के कारण खेती करना मुश्किल होता जा रहा है. ग्राम प्रधान ने बताया अगर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाएं गांवों तक पहुंचें तो पलायन की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है. वरना आने वाले वर्षों में कई पहाड़ी गांवों की तरह भयेड़ी भी पूरी तरह खाली हो सकता है. उन्होंने कहा यदि समय रहते ही गांव का विकास नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं जब पूरा गांव खाली हो जाएगा. खाली होते पहाड़ों का सबसे बड़ा कारण पलायन है. पहाड़ों से पलायन कई वजहों से हो रहा है. इसमें रोजगार, शिक्षा , स्वास्थ्य सेवाएं, जंगली जानवरों का आतंक महत्वपूर्ण कारण है. इन सब परेशानियों के कारण पहाड़ खाली होते जा रहे हैं.  पहाड़ों में पलायन को रोकेने के लिए ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है. इसके लिए गांव में खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पशुपालन को आगे बढ़ाना चाहिए. इससे पहले गांवों में सुख सुविधाएं पहुंचाने की जरुरत हैं. जिससे गांव से लोगों को बाहर जाने से रोका जाए. अच्छे स्कूल, अस्पताल, सड़क जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए. 25 सालों में सरकारें आई और गई पर उनकी पलायन की रोकथाम को लेकर बातें आज भी केवल हवा हवाई साबित हो रही है। बात अगर अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ की करें तो पहाड़ पर पहाड़ सी जिंदगी जीने वाले लोगों की किन किन समस्याओं से गुजरना पड़ता है वो तो केवल पहाड़ पर रहने वाले लोगे ही बता सकते है।  इस कहावत की सच्चाई पर सवाल भी ज़रूरी नही है क्योंकि ये कहावत उत्तराखंड के पहाड़ों की हालातों की हकीकत है।अब समय आ गया है जब नेताओं को ,सरकारों को और युवा वर्ग को मिलकर एक सफल प्रयास करना ही होगा । वरना वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड के पहाड़ों में सिर्फ जंगल ,जानवर और बंजर पड़े मकान ही नज़र आएंगे और पहाड़ी अपने ही पहाड़ में अल्पसंख्यक कहलाएंगे। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों से मैदान की ओर पलायन की समस्या अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से चली आ रही है। अलग राज्य बनाने की मांग के साथ उत्तराखंड के खाली हो रहे गावों को भी मजबूत आधार के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा। सभी राजनीतिक दल खाली हो रहे पहाड़ी गांवों को आबाद एवं खुशहाल बनाने की कुंजी अलग पर्वतीय राज्य (उत्तराखंड) में देखते-दिखाते रहे। इसे सामाजिक विडंबना कहें या राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव कि जिसे प्रमुख आधार मान कर पर राज्य आंदोलन चलाया गया, राज्य बनने के 25 वर्ष बाद भी पलायन प्रदेश की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है। राज्य बनने के 17 साल बाद पलायन आयोग का गठन होना ही राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता की घोर उपेक्षा का प्रमाण है। इतना ही नहीं, आयोग की संस्तुतियों पर हुई प्रगति का कोई आकलन न होना भी तंत्र की लापरवाही को ही इंगित करता है। जबकि आयोग के अध्यक्ष मुख्यमंत्री स्वयं होते हैं।केंद्र सरकार की चिंता तथा किए जा रहे प्रामाणिक कार्य प्रदेश की सरकारों पर सवालिया निशान भी रखते हैं। नि:संदेह प्रदेश सरकार पर्वतीय क्षेत्रों के लिए आर्थिक रूप से उतना नहीं कर सकती जितना कि केंद्र, लेकिन जन जागरूकता, उचित वातावरण, स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार एवं नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराना तो प्रदेश सरकार का ही दायित्व बनता है। इन बिंदुओं पर अगर अब तक आई सरकारों का आकलन किया जाए तो तस्वीर निराशाजनक ही दिखती है। हर काम के लिए केंद्र की ओर ताकना भी तो अपनी नाकामी ही मानी जाएगी। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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