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अल्पकालिक राजनीतिक लाभ मुफ्त रेवड़ी लोकतंत्र के लिये घातक

25/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देश के राज्यों पर कुल 104 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है। देश पर भी 200.50 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। कुछ विशेषज्ञ इसे 225 लाख करोड़ के करीब मानते हैं। इसके बावजूद रेवडिय़ां बांटी जा रही हैं। प्रधानमंत्री कई मौकों पर कह चुके हैं कि आम आदमी फ्रीबीज नहीं मांगता। रेवडिय़ां देश के विकास के लिए खतरनाक हैं। ये अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकती हैं। इन कथनों के बावजूद प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले एनडीए ने बिहार में महिलाओं को 10,000 रुपए प्रति की रेवडिय़ां बांटी और खूब वोट हासिल किए। बिहार पर 3.61 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ही यह रणनीति बनाई गई कि रेवडिय़ां बांटो खटाखट, तो वोट मिलेंगे फटाफट। विडंबना और सवाल है कि इस मुफ्तखोरी को न तो चुनाव आयोग ने रोका और न ही अब सर्वोच्च अदालत ने इस पर टिप्पणी की। देश की बदसूरत और डरावनी तस्वीर यह है कि 15-49 वर्ष आयु-वर्ग की करीब 57 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है। यदि इसी अवस्था में मां की कोख में भ्रूण आकार ग्रहण करता है, तो उस बच्चे का मस्तिष्क विकसित नहीं होगा। पांच साल की उम्र तक के करीब 35 फीसदी बच्चे बेहद कुपोषित हैं। भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यह है कि चुनाव आते ही जनसेवा का स्वरूप बदलकर जनलुभावन राजनीति में परिवर्तित हो जाता है। राजनीतिक दलों ने मुफ्त की योजनाओं को चुनावी सफलता का शॉर्टकट बना लिया है। मतदाताओं को तात्कालिक आर्थिक लाभ देकर वोट हासिल करने की प्रवृत्ति लगातार मजबूत हो रही है। आगामी तीन-चार माह में विधानसभा चुनाव होने है, इसी संदर्भ में जब असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हुईं, तब इस संस्कृति का प्रभाव और स्पष्ट दिखाई देने लगा। इसी पृष्ठभूमि में देश की शीर्ष अदालत, सर्वोच्च न्यायालय, ने मुफ्त की योजनाओं के अनियंत्रित विस्तार पर गंभीर टिप्पणी की। यह टिप्पणी केवल कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को लेकर एक चेतावनी है। लोकतंत्र का मूल उद्देश्य जनकल्याण है। राज्य का दायित्व है कि वह गरीब, वंचित और कमजोर वर्गों को सहारा दे। सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं, न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी-ये सब कल्याणकारी राज्य की पहचान हैं। लेकिन जब जनहित और चुनावी लाभ के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है, तब समस्या जन्म लेती है। लक्षित समर्थन और अतिरेक उदारता में अंतर है। एक ओर ऐसी योजनाएं हैं जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती हैं, दूसरी ओर ऐसी घोषणाएं हैं जो केवल मतदाता को तात्कालिक राहत देकर उसे निर्भरता की आदत सिखाती हैं। जब राजस्व घाटे से जूझ रहे राज्य मुफ्त बिजली, मुफ्त यात्रा या नकद वितरण की घोषणाएं करते हैं, तो प्रश्न उठता है कि यह संसाधन कहां से आएंगे और इसकी कीमत कौन चुकाएगा? राजकोषीय अनुशासन किसी भी राज्य की आर्थिक सेहत का आधार है। यदि राज्य अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए खजाने को खाली करता है, तो दीर्घकालिक विकास प्रभावित होता है। जो धन बुनियादी ढांचे के निर्माण, अस्पतालों के सुदृढ़ीकरण, विद्यालयों की गुणवत्ता सुधार और रोजगार सृजन में लगना चाहिए, वह वोटों की फसल काटने में खर्च हो जाता है। यह प्रवृत्ति केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि नैतिक दृष्टि से भी चिंताजनक है। लोकतंत्र में मतदाता की स्वतंत्रता सर्वाेपरि मानी जाती है। यदि मतदाता को परोक्ष रूप से आर्थिक प्रलोभन देकर प्रभावित किया जाता है, तो यह स्वतंत्र निर्णय की भावना को कमजोर करता है। न्यायालय ने तार्किक प्रश्न उठाया कि राज्य रोजगार सृजन और कौशल विकास पर अधिक ध्यान क्यों नहीं देते? वास्तव में रोजगार ही स्थायी सशक्तीकरण का माध्यम है। जब व्यक्ति अपने श्रम और कौशल से आय अर्जित करता है, तब उसमें आत्मसम्मान और आत्मविश्वास दोनों विकसित होते हैं। इसके विपरीत, निरंतर मुफ्त सुविधाएं व्यक्ति को निर्भर बनाती हैं। धीरे-धीरे परिश्रम की संस्कृति कमजोर पड़ती है और समाज में अकर्मण्यता की मानसिकता पनपने लगती है। यह स्थिति लोकतंत्र की सुदृढ़ता के लिए खतरनाक है, क्योंकि लोकतंत्र केवल वोट डालने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सक्रिय और जिम्मेदार नागरिकता का नाम है। चुनाव पूर्व घोषित योजनाओं की निष्पक्षता भी प्रश्नों के घेरे में है। जब आचार संहिता लागू रहने के दौरान बड़े पैमाने पर आर्थिक वितरण होता है, तो विपक्षी दल इसे असमान प्रतिस्पर्धा मानते हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष निगरानी की जिम्मेदारी भारत का निर्वाचन आयोग पर आती है। निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी दल मतदाताओं को अप्रत्यक्ष रिश्वत देकर चुनावी लाभ न ले। आचार संहिता का उल्लंघन केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा का हनन है। यदि इस पर कठोर कार्रवाई नहीं होती, तो भविष्य में यह प्रवृत्ति और गहरी जड़ें जमा सकती है। निस्संदेह, इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती है कि राज्यों का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वे विशेष रूप से कमजोर वर्ग के लोगों की खास तौर से देखभाल करें। हालांकि, जब राजस्व घाटे वाले राज्य मुफ्त की योजनाओं पर बड़ी रकम खर्च करते हैं, तो सरकारी खजाने पर दबाव और अधिक बढ़ जाता है। विडंबना यह है कि जिस धनराशि का इस्तेमाल बुनियादी ढांचे में सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं को सक्षम बनाने और शिक्षा की सुविधा को समृद्ध करने के लिये किया जाना चाहिए, वो राशि अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिये खर्च कर दी जाती है। जरूरत इस बात की है कि कौशल विकास के जरिये लोगों को इस तरह सक्षम बनाया जाए जिससे उन्हें दीर्घकालिक व स्थायी लाभ मिल सकें।यह भी समझना होगा कि मुफ्त योजनाओं का हर स्वरूप गलत नहीं है। आपातकालीन परिस्थितियों में राहत देना, महामारी या प्राकृतिक आपदा के समय सहायता पहुंचाना, सामाजिक न्याय के तहत वंचित वर्गों को अवसर देना-ये सब राज्य की जिम्मेदारी है। परंतु चुनावी मौसम में अचानक घोषणाओं की बाढ़ आ जाना और दीर्घकालिक वित्तीय परिणामों की अनदेखी करना लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत नहीं है। यह राजनीतिक दलों के वैचारिक दिवालियेपन को दर्शाता है, जहां दूरदृष्टि की जगह तात्कालिक लाभ को प्राथमिकता दी जाती है। लोकतंत्र की मजबूती केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की सजगता से भी आती है। यदि मतदाता केवल तात्कालिक लाभ देखकर मतदान करता है, तो वह अनजाने में ऐसी संस्कृति को प्रोत्साहित करता है जो अंततः उसी के भविष्य को प्रभावित करती है। परिपक्व मतदाता वही है जो घोषणाओं के पीछे की मंशा और आर्थिक व्यवहार्यता को समझे। वह यह पूछे कि पांच साल बाद राज्य की आर्थिक स्थिति क्या होगी, विकास की दिशा क्या होगी और रोजगार के अवसर कितने बढ़ेंगे। लोकतंत्र में वोट केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है।आज भारत स्वयं को वैश्विक मंच पर एक सशक्त लोकतंत्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। हम विश्वगुरु बनने का संकल्प लेते हैं, लेकिन यदि हमारी राजनीति लोकलुभावनवाद के जाल में उलझी रहेगी, तो यह संकल्प खोखला सिद्ध होगा। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव तभी सार्थक है जब हमारी नीतियां दूरदर्शी, संतुलित और टिकाऊ हों। मुफ्त की संस्कृति से बाहर निकलकर उत्पादकता, नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देना ही वास्तविक प्रगति का मार्ग है। यह समय आत्ममंथन का है। राजनीतिक दलों को समझना होगा कि जनता को सशक्त बनाना केवल धन बांटने से संभव नहीं है। शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य और रोजगार-ये चार स्तंभ किसी भी राष्ट्र की मजबूती तय करते हैं। यदि इन पर निवेश बढ़ेगा, तो नागरिक आत्मनिर्भर बनेंगे और राज्य पर बोझ कम होगा। वहीं, नागरिकों को भी यह ठानना होगा कि वे तात्कालिक प्रलोभनों के बजाय दीर्घकालिक विकास को प्राथमिकता देंगे। लोकतंत्र की सुदृढ़ता तभी सुनिश्चित होगी जब शासन और जनता दोनों अपने-अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करें।निस्संदेह, चुनावी निष्पक्षता के लिये यह आवश्यक हो गया है कि चुनाव से पहले घोषित की गई या लागू की गई लोकलुभावनी नीतियों व योजनाओं की गहन पड़ताल की जाए। विपक्षी दलों द्वारा बिहार सरकार पर आरोप लगाया गया था कि पिछले साल अक्तूबर में आचार संहिता लागू रहने के दौरान मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिला लाभार्थियों को 15,600 करोड़ रुपये दिए गए थे। जो कि स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध कदम था। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि भारत के निर्वाचन आयोग की ओर से राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को अपरोक्ष रूप से रिश्वत देने के प्रयासों पर पैनी नजर रखी जाए। साथ ही इस दिशा में चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के रूप में कार्रवाई भी करनी चाहिए। निर्विवाद रूप से चुनाव प्रक्रिया में कोई भी पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाना हमारे जीवंत लोकतंत्र के लिये हानिकारक है। मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की प्रवृत्ति लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। यह कार्य करने की मानसिकता को बाधित करती है और समाज में सरकार-निर्भरता एवं अकर्मण्यता की संस्कृति को जन्म देती है। यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो आर्थिक असंतुलन और राजनीतिक अविश्वास दोनों बढ़ेंगे। इसलिए आवश्यक है कि नीतियों की पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और चुनावी निष्पक्षता को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जाए। यही लोकतंत्र की वास्तविक रक्षा है, यही राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है। इसी तरह, लगभग सभी कल्याणकारी योजनाएं, जिन्होंने लाखों लोगों और उनकी आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित किया है, चाहे वह मुफ्त या रियायती राशन, आवास, पेयजल, रोजगार, शिक्षा, बीमा आदि हो, वास्तव में उनके बारे में भी चुनावी वादे किए गए थे। केंद्र और राज्य स्तर पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने विभिन्न चुनावों से इस बाबत चुनाव घोषणापत्र पहले जारी किए थे। कल्याणकारी योजनाओं को मुफ्त के रूप में टैग करने से अंततः उन लाखों लोगों की आजीविका समाप्त हो सकती है जो ज़िंदा रहने का संघर्ष कर रहे हैं। देश का स्वास्थ्य पर बजट आज भी जीडीपी का 2 फीसदी है, जबकि कमोबेश 5.2 फीसदी होना चाहिए। एक भ्रष्ट और निकम्मेपन की तस्वीर भी देखिए कि जल-जीवन मिशन पर 67,000 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया था, लेकिन मार्च, 2026 तक 17,000 करोड़ रुपए ही खर्च होगा। प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में 120 करोड़ रुपए का घोटाला बेनकाब हुआ है। कुछ और राज्यों में भी ऐसी विसंगतियां सामने आई हैं। ऐसे देश में ‘रेवडिय़ां’ तो आजीविका समान हैं। जिस तमिलनाडु से याचिका शीर्ष अदालत में दी गई थी, उस राज्य पर 10.42 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। बंगाल पर 7.90 लाख करोड़ और केरल पर 5.04 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। इन राज्यों में इसी साल अप्रैल के बाद चुनाव होने हैं। सवाल यह भी किया जाना चाहिए कि जिन 81 करोड़ से अधिक लोगों को सरकारें ‘मुफ्त राशन’ बांट रही हैं, क्या वे रेवडिय़ां नहीं हैं? क्या वे लोग गरीबी रेखा के तले हैं?यही असली चुनौती है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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