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बढ़ता प्रदूषण बना जलीय जीवों के लिए खतरा

18/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

साल 2027 में धर्मनगरी हरिद्वार में अर्ध कुंभ का आयोजन होना है. इस आयोजन को लेकर उत्तराखंड सरकार ने बड़ी तैयारियां शुरू कर दी हैं. सरकार 2027 अर्ध कुंभ को कुंभ की तर्ज पर ही आयोजित करना चाहती है. इसकी वजह ये भी है क्योंकि साल 2021 का हरिद्वार कुंभ कोरोना महामारी की भेंट चढ़ गया था. ऐसे में सरकार उस कसर को आगामी अर्ध कुंभ में पूरी करना चाहती है.उधर, गंगा सभा के पूर्व अध्यक्ष और हरिद्वार के गणमान्य नागरिकों में शामिल भी सरकार के इस मत से सहमत नहीं है. राम कुमार मिश्रा का सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिरकार अर्ध कुंभ को कुंभ बनाने का क्या मतलब है. इससे होगा क्या? दूसरी बात यह है कि आज हम अर्ध कुंभ को कुंभ बना रहे हैं. कुंभ को महाकुंभ बना रहे हैं. आने वाले 100-200 सालों में जो वास्तविक है, वो केवल किस्सों और कहानियों में रह जाएगा. इसलिए जो जैसा है उसको वैसा रहने दें तो बेहतर है.बता दें कि कुंभ सिर्फ भारत का ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मेला है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश की कुछ बूंदें धरती पर गिरी थीं. जहां-जहां पर अमृत की बूंदें गिरी थीं, वहीं पर महाकुंभ 2025 का आयोजन किया जाता है. इस तरह यह मेला बहुत महत्‍वपूर्ण है.एक अर्धकुंभ को दिव्य और भव्य कुंभ के रूप में आयोजित किए जाने के लिए तमाम तैयारियां की जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के हालिया परीक्षण में जो रिपोर्ट सामने आई है वह चिंताजनक है। रिपोर्ट में सामने आया है कि गंग नहर में लगातार गिर रहे गंदे नालों के कारण जल में ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से घट रही है। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के हालिया परीक्षण में जो रिपोर्ट सामने आई है वह चिंताजनक है। रिपोर्ट में सामने आया है कि गंग नहर में लगातार गिर रहे गंदे नालों के कारण जल में ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से घट रहीहै।जांच में पाया गया कि नहर के पानी में ऑक्सीजन का स्तर लगभग तीन मिलीग्राम प्रति लीटर से भी कम रह गया है जबकि जलीय जीवों के संरक्षण के लिए यह कम से कम पांच मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए। इस गंभीर स्थिति के चलते नहर में रहने वाले जलीय जीवों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। नीलधारा से नहर में पानी आने के बाद से ही प्रदूषित हो रहा है। इसमें मौजूदा समय में स्पष्ट देखा जा रहा है कि नए घाटों के निर्माण के दौरान नहर का जो किनारा काटकर फाउंडेशन बनाया जा रहा है वहीं पर मोटे-मोटे पाइप से गंदगी गंगा में गिराई जा रही है। यही नहीं स्वयं उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग की कॉलोनी नगर निगम क्षेत्र में ही आवासों से गंदगी गिराने के लिए पाइप गंगा में डाले गए हैं। यह दृश्य उस समय भी देखा गया जब गंग नहर की वार्षिक बंदी होती है। गंगा की धारा बंद किए जाने के बाद भी गंदगी बहती देखी जाती है। यह हाल तो शहर का है यहां से आगे बढ़ने पर ज्वालापुर के कस्साबान से निकलने वाले नाले भी गंगा में गिर रहे हैं। गंगा को प्रदूषण से बचाने वाले विभाग एसटीपी से गंदगी साफ करने का केवल दावा कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र में बहादराबाद से रुड़की तक 10 से अधिक गंदे नाले सीधे गंग नहर में गिर रहे हैं जिससे जल लगातार प्रदूषित हो रहा है। सिंचाई विशेषज्ञों के अनुसार, हरिद्वार में सिडकुल की स्थापना के बाद से नहर का प्रदूषण लगातार बढ़ा है। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि बहादराबाद क्षेत्र के आसपास स्थित कुछ नालों से सिडकुल की फैक्टरियों का दूषित पानी भी नहर में छोड़ा जा रहा है। इसके कारण नहर के पानी में ऑक्सीजन का स्तर लगातार घट रहा है। नहर में प्रदूषण का मुख्य कारण शहर की गंदगी सीधे गंगा में गिरने और बहादराबाद से रुड़की तक 10 से अधिक गंदे नालों का सीधा गंगा में जाना है। इन नालों से निकलने वाला दूषित जल नहर के पानी को जहरीला बना रहा है। सिंचाई विशेषज्ञों ने हरिद्वार में सिडकुल की स्थापना के बाद से प्रदूषण में वृद्धि दर्ज की है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, सिडकुल की फैक्टरियों का दूषित पानी भी कुछ नालों के माध्यम से नहर में छोड़ा जा रहा है जिससे जलीय पर्यावरण गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। सिंचाई विभाग ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस संबंध में पहले ही पत्र लिखा था लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। नगर निगम, नगर पालिका और अन्य स्थानीय निकाय भी इस समस्या के समाधान के लिए प्रभावी कदम नहीं उठा रहे हैं। वहीं, सिंचाई विभाग के एसडीओ ने कहा कि गंगा के प्रदूषित होने से मछलियों, मेंढकों और अन्य जलीय जीवों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय निकाय इस गंभीर समस्या के प्रति उदासीन बने हुए हैं। जिम्मेदार विभाग और अधिकारियों की उदासीनता चिंताजनक है। इस विषय में उच्च स्तर पर वार्ता की जाएगी। अगर जल्द ठोस योजना नहीं बनीं तो गंगा की शुद्धता की स्थिति और गंभीर होगी। 2027 अर्धकुंभ को लेकर श्री महंत रवींद्र पुरी ने कहा कि आज का समय सनातन युग का है. सनातन से जुड़े लोगों के लिए कुंभ एक आस्था का केंद्र है. ऐसे में वह जब हरिद्वार आएं तो प्रशासन को चाहिए कि उन्हें जो सुविधा चाहिए, वह उपलब्ध होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि हरिद्वार में सड़कों के साथ ही कुंभ मेला क्षेत्र को बढ़ाना भी आवश्यक होगा. साथ ही कुछ नए घाटों का भी निर्माण करना होगा. उन्होंने कहा कि प्रयागराज और हरिद्वार में काफी अंतर है. प्रयागराज महाकुंभ को लेकर उन्होंने अपने एक्सपीरियंस साझा करते हुए कहा कि वहां पर घाटों की कमी थी. लेकिन हमारे हरिद्वार में घाटों की कमी नहीं है. ऐसे में हम और अधिक संख्या में हरिद्वार में श्रद्धालुओं को बुला सकते हैं और उन्हें कुंभ में स्नान करा सकते हैं. जिम्मेदार विभाग और अधिकारियों की उदासीनता चिंताजनक है। इस विषय में उच्च स्तर पर वार्ता की जाएगी। अगर जल्द ठोस योजना नहीं बनीं तो गंगा की शुद्धता की स्थिति और गंभीर होगी।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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