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प्रो. डीडी पंत नाम सम्मान व पद प्रतिष्ठा की दौड़ से हमेशा ही दूर रहे

25/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
कुमाऊँ के गणाई गंगोली क्षेत्र के द्योराड़ी पंत गांव में एक बच्चे का जन्म हुआ. वैद्य पिता के घर जन्में इस बच्चे को नाम मिला देवी दत्त. लोकोक्ति है कि पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं. नन्हें देवी दत्त जब कक्षा चार में थे तो गणित के एक सवाल में ऐसे उलझे कि स्कूल की छुट्टी कब हुई ये तक भूल गए. वो खाली कक्षा में तब तक बैठे रहे जब तक उन्होंने वो सवाल हल नहीं कर लिया.महान शिक्षाविद् प्रो. डीडी पंत नाम, सम्मान व पद प्रतिष्ठा की दौड़ से हमेशा ही दूर रहे। उन्होंने पहाड़ और शिक्षा के प्रति जीवन को समर्पित कर दिया। उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय का नाम राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय जगत में रोशन किया। शिक्षा जगत में उनका योगदान अभूतपूर्व, अकल्पनीय और अविस्मरणीयरहेगा।पिथौरागढ़ जनपद के देवराड़ी ग्राम में एक वैद्य अंबादत्त पन्त के घर में 14 अगस्त 1918 को जन्मे प्रो. पंत की आरंभिक पढ़ाई गांव में ही हुई। उनका नाम देवी दत्त पन्त रखा गया। इसके बाद उन्होंने हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की शिक्षा अल्मोड़ा से हासिल की। इंटर का रिज़ल्ट आने से पूर्व ही उनका विवाह हो गया। वैवाहिक जीवन में बंधने के बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान के स्पेक्ट्रास्कोपी विषय में विशेषज्ञता के साथ ही एमएससी की डिग्री हासिल की। मेधावी छात्र के रुप में पहचान बनाने वाले प्रो. पंत ने भाभा एटोमिक सेंटर के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. आर के अंसुडी के निर्देशन में डाक्टर ऑफ साईस की उपाधि प्रदान की। इसके बाद प्रो. डी. डी. पंत ने देश के पहले नोबल पुरस्कार विजेता सीबी रमन के शिष्य बन उनके साथ दो वर्ष कार्य किया। वर्ष 1951-52 में वह नैनीताल आ गये। यहां पर डीएसबी में भौतिकी के विभागाध्यक्ष रहे। इसके बाद वर्ष 1971 में उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशक रहे। उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय के निर्माण को अपना भरपूर योगदान दिया। और सन् 1973 में कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति बने। उन्होंने कुमाऊं विश्वविद्यालय का नाम राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में शिक्षा जगत में अभूतपूर्व योगदान देते हुये 20 पीएचडी दी और 150 शोध पत्र प्रस्तुत किये। उन्हें प्रतिष्ठित शांति स्वरुप भटनागर पुरस्कार से भी नवाजा गया। इसके अलावा प्रो. पंत रमन सेन्टेनरी स्वर्ण पदक, फैलो ऑफ इंडियन एकेडमी ऑफ साईस, फुल ब्राइट स्कॉलर समेत कई पुरस्कारों और सम्मानों से भी नवाजे गये थे। अमेरिका की सिग्मा साई सोसाइटी का सदस्य होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त था। प्रो. पंत विद्यार्थी जीवन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मिले थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में समर्पित होने की इच्छा जाहिर की की लेकिन गांधी जी ने उन्हें अपने क्षेत्र में ही रहकर कार्य करने की प्रेरणा दी थी।सीवी रमन के साथ डीडी पंत ऐसे रमे कि फिर उनके ही सानिध्य में उन्होंने कई शोध किए. उनके कुछ शोध कार्य तो इतने चर्चित हुए कि इसके इर्द-गिर्द किंवदंतियाँ और अफ़वाहें तक पनपने लगी. कई लोग यह कहते थे कि उन्होंने फ़िज़िक्स में एक नई खोज की है जिसे ‘पंत रे’ या ‘पंत रेज़’ नाम दिया गया है इसके बाद साल 1979 में जब मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना हुई तब प्रो. डी. डी. पन्त जी को उसका प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। पन्त जी के विचारों में पहाड़ के लिए विशेष समर्पण भाव नजर आता है। अपने जीवनकाल में उनके द्वारा हर मंच से दिए गए भाषणों में पहाड़ के प्रति उनका लगाव और प्रेम सहज रूप में झलकता है।उत्तराखंड राज्य निर्माण और पहाड़ की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पहाड़ी संस्कृति के प्रति प्रोफेसर डी डी पन्त जी का जो समर्पण, प्रेम और जो सोच थी उसी का मुकाम है जो उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना की और उत्तराखंड के रूप में एक अलग पहाड़ी राज्य का को सपना उन्होंने देखा था उसे साकार भी किया। सर्वप्रथम यह बात जिसे कॉपी कर आज देश के प्रधानमंत्री भी चुनावों में पहाड़ियों का दिल जीतने की कोशिश करते नजर आते हैं वह लाइन “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी ही पहाड़ के काम नहीं आ रही है” प्रो पन्त ने ही अपने भाषणों में बोल कर पहाड़ी युवाओं को जगाने का काम किया था और उन्हें उनके हक हकुकों के लिए लड़ना, पहाड़ की प्राकृतिक संपदा जल, जंगल और जमीन के लिए संगठित होकर लड़ना और आंदोलित होकरअपनेहकमांगनासिखायाथा।प्रो. पन्त का व्यक्तित्व सरल, साधारण, शिक्षा और पहाड़ के लिए ही हमेशा समर्पित रहा। आज जब पहाड़ में एक और यूनिवर्सिटी अल्मोड़ा यूनिवर्सिटी बन रही है और एक ओर आज अल्मोड़ा विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति का स्वागत बडे़ जोर शोर से हुआ वहीं दूसरी ओर कुमाऊं विश्वविद्यालय के लोग ही कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति, महान भौतिकशास्त्री, पहाड़ के लिए एक अलग सोच रखने वाले प्रो. डी. डी. पन्त जी को ही भूल गए। प्रो. डी डी पन्त एक ऐसा नाम है जिससे हर एक युवा को प्रेरणा लेनी चाहिए और पहाड़ और अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा होना चाहिए। आज जब राजनीति के चंगुल में फस के उत्तराखंड राज्य का सर्वनाश हो रहा है ऐसे में युवाओं को प्रो. पन्त जी को याद कर प्रण लेना चाहिए कि उन्होंने पहाड़ियों को उत्तराखंड राज्य के रूप में एक अलग पहचान दिलाई है और आज उनके सपनों के उत्तराखंड का आखिर क्या हाल इन राजनैतिक पार्टियों ने और स्वार्थी नेताओं ने कर दिया है इसके लिए एक नई क्रांति की जो जरूरत है उसे युवा पीढ़ी को अपने कंधो में उठा कर चलना चाहिए और यह संकल्प लेना चाहिए कि एक लड़ाई उत्तराखंड बनाने की हमारे पूर्वजों द्वारा लड़ी गई और आज फिर से एक जरूरत है और इस बार हमने उत्तराखंड को बचाने की लड़ाई लड़नी होगी। और यह लड़ाई भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ होगी, उत्तराखंड को लूटने वाली राजनैतिक पार्टियों के खिलाफ होगी, भ्रष्ट प्रशासन के खिलाफ होगी, पहाड़ के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लड़नी होगी, पहाड़ में अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और रोजगार के मुद्दे पर होगी। प्रो. पन्त जैसे व्यक्तितव कि आज फिर से उत्तराखंड और पहाड़ को जरूरत है और वो हम ही किसी पहाड़ी युवाओं को आगे आ कर पूरी करनी होगी। लेकिन उनकी पहली मोहब्बत विज्ञान ही था जिसके लिए वे सब कुछ छोड़ देते थे अगर हमारी अकादमिक व्यवस्था ने उन्हें रिसर्च का अच्छा माहौल दिया होता.

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