डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में मानसून का मौसम शुरू होते ही आपदा प्रबंधन तंत्र की जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ जाती हैं. मौसम विभाग की चेतावनियों से लेकर नदी-नालों के जलस्तर और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की निगरानी तक, पूरा प्रशासनिक तंत्र अलर्ट मोड में आ जाता है. इसकी वजह भी साफ है. राज्य का भौगोलिक स्वरूप ऐसा है जहां कुछ मिनटों की भारी बारिश भी बड़ी आपदा का रूप ले सकती है.मानसून सीजन शुरू होने से पहले उत्तराखंड में भूस्खलन को लेकर खतरे की घंटी बज चुकी है. लोक निर्माण विभाग द्वारा तैयार “क्रॉनिक लैंडस्लाइड जोन-2026 रिपोर्ट में राज्यभर के 120 ऐसे संवेदनशील स्थानों की पहचान की गई है, जहां हर वर्ष बारिश के दौरान सड़कें बंद होने और यातायात बाधित होने की घटनाएं सामने आती हैं. रिपोर्ट में कई राष्ट्रीय राजमार्ग, चारधाम यात्रा मार्ग और ग्रामीण सड़कें भी शामिल हैं. हाल ही में लोक निर्माण विभाग ने संवेदनशील और क्रॉनिक लैंडस्लाइड जोन को लेकर लेटेस्ट सर्वे करवाया गया जिसमें राष्ट्रीय राजमार्गों पर 57 क्रॉनिक लैंडस्लाइड जोन चिन्हित किए गए हैं. राज्य मार्गों, जिला मार्गों और ग्रामीण सड़कों पर ऐसे 120 जोन मौजूद हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार अल्मोड़ा, बागेश्वर, नैनीताल, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी और देहरादून जिलों में क्रॉनिक लैंडस्लाइड जोन चिह्नित किए गए हैं. इन स्थानों पर लगातार भूस्खलन होने के कारण सड़क संपर्क प्रभावित होता है और लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है. नैनीताल जिले में सबसे अधिक संवेदनशील स्थानों में नैनीताल-कालाढूंगी मोटर मार्ग, नैनीताल-भवाली मार्ग और नैनीताल बाईपास शामिल हैं. वहीं रामनगर-बेतालघाट और गर्जिया-बेतालघाट मार्गों पर भी कई सक्रिय भूस्खलन क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं. चारधाम यात्रा से जुड़े मार्ग भी इस खतरे से अछूते नहीं हैं. रुद्रप्रयाग जिले में गुप्तकाशी-कालीमठ-कोटमा-जाल चौमासी मोटर मार्ग पर कई स्थानों को क्रॉनिक लैंडस्लाइड जोन घोषित किया गया है. विभागीय अधिकारियों के अनुसार इन स्थलों के स्थायी उपचार के लिए तकनीकी एजेंसियों के साथ DPR तैयार की जा रही है, जिसकी अनुमानित लागत 11.84 करोड़ रुपये बताई गई है. इसी तरह से चमोली जिले में रुद्रप्रयाग-पोखरी मोटर मार्ग, पोखरी-हरिशंकर मार्ग और नंदप्रयाग-घाट-सुतोल-कनोल मोटर मार्ग के कई हिस्सों को भी संवेदनशील माना गया है. कुछ स्थानों पर उपचार कार्य चल रहा है, जबकि कई जगह विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है. उत्तरकाशी में सिलक्यारा-बंगांव-छपरा-सरोत मोटर मार्ग, उत्तरकाशी बाईपास और हर्षिल-मुखवा मार्ग भी लैंडस्लाइड जोन की सूची में शामिल हैं. वहीं देहरादून जिले में मसूरी रोड, सहस्त्रधारा-चामासारी मार्ग, कालसी-चकराता मार्ग और चकराता क्षेत्र की कई सड़कें भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील पाई गई हैं. मानसून सीजन में सड़क संपर्क बनाए रखने के लिए आपदा प्रबंधन और लोक निर्माण विभाग ने प्रदेश भर में मशीनों और मानव संसाधनों की तैनाती कर दी है. विभाग के आंकड़ों के मुताबिक भूस्खलन और सड़क बंद होने की स्थिति से निपटने के लिए 685 मशीनें और 4023 कर्मी मैदान में रहेंगे. मानसून के दौरान सड़कें जल्द खोलने के लिए विभाग ने बड़े पैमाने पर मशीनों और मानव संसाधनों की तैनाती की है. जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो पौड़ी जिले में सबसे अधिक 203 श्रमिक तैनात किए गए हैं. उत्तरकाशी में 167, देहरादून में 120, चमोली में 113 और रुद्रप्रयाग में 91 कर्मी तैनात हैं. अल्मोड़ा में 85, बागेश्वर में 58 और हरिद्वार में 40 श्रमिक तैनात किए गए हैं. मशीनों की उपलब्धता के लिहाज से टिहरी जिला सबसे आगे दिखाई देता है. यहां 69 जेसीबी समेत कुल 72 मशीनें उपलब्ध हैं. पौड़ी में 60 जेसीबी और 61 मशीनें, जबकि देहरादून में 37 जेसीबी और कुल 40 मशीनें तैनात की गई हैं. उत्तरकाशी में भी 30 मशीनें और 167 कर्मी मानसून ड्यूटी पर रहेंगे. हिमालयी क्षेत्रों में सड़क संपर्क बनाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ PWD तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार BRO, NHAI और NHIDCL ने भी अपने स्तर पर संसाधनों की तैनाती की है. इन एजेंसियों के पास अतिरिक्त मशीनें और श्रमिक उपलब्ध हैं, जिन्हें जरूरत पड़ने पर त्वरित कार्रवाई के लिए लगाया जाएगा. आंकड़ों के अनुसार लोक निर्माण विभाग के पास स्वयं 565 मशीनें और 1428 श्रमिक हैं. जबकि BRO, NHAI और NHIDCL के संसाधनों को जोड़ने पर यह संख्या बढ़कर 685 मशीनें और 4023 श्रमिकों तक पहुंच जाती है. इससे स्पष्ट है कि मानसून के दौरान सड़क संपर्क बहाल रखने के लिए विभाग ने बहु-एजेंसी रणनीति अपनाई हैरिपोर्ट के अनुसार राज्य में 13 ट्रॉली ब्रिज, 54 बैली ब्रिज और 4 फोल्डिंग ब्रिज भी उपलब्ध हैं, ताकि आपदा की स्थिति में वैकल्पिक संपर्क स्थापित किया जा सके. वहीं 9 रोबोट भी तैनात किए गए हैं, जिनका उपयोग विशेष परिस्थितियों में किया जाएगा. आपदा के समय राहत और बचाव कार्यों को तेज करने के लिए राज्य में कुल 479 हेलीपैड का विवरण भी तैयार किया गया है. इनमें 99 स्थायी और 380 अस्थायी हेलीपैड शामिल हैं. जरूरत पड़ने पर आपदा प्रभावित क्षेत्रों के पास अस्थायी हेलीपैड विकसित करने की व्यवस्था भी रखी गई है. विभाग ने सड़क बंद और खुलने की जानकारी को रियल टाइम में उपलब्ध कराने के लिए “रोड क्लोजर रिपोर्टिंग ऑनलाइन सिस्टम” भी विकसित किया है. इसके माध्यम से राज्य आपदा नियंत्रण कक्ष और संबंधित एजेंसियों को लगातार अपडेट भेजे जाएंगे. कुल मिलाकर मानसून 2026 से पहले उत्तराखंड का लोक निर्माण विभाग सड़क संपर्क बनाए रखने और आपदा की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया देने के लिए व्यापक तैयारी का दावा कर रहा है. हालांकि असली परीक्षा बारिश शुरू होने के बाद होगी, जब पहाड़ों में भूस्खलन और सड़क अवरोध की घटनाएं बढ़ जाती हैं. उत्तराखंड जैसे आपदा संवेदनशील राज्य में यह मामला केवल एक तकनीकी सेवा के निलंबन का नहीं है. यह सीधे उस व्यवस्था से जुड़ा है, जिसके माध्यम से भविष्य में लाखों लोगों तक आपदा से पहले चेतावनी पहुंचाई जानी थी. ऐसे समय में जब राज्य में मानसून सक्रिय होने वाला है और चारधाम यात्रा भी जारी है, इस सेवा पर लगी रोक ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.क्या यह केवल कुछ दिनों की तकनीकी समीक्षा है या फिर प्रणाली में कोई बड़ा बदलाव होने जा रहा है? क्या मानसून के दौरान उत्तराखंड को इस तकनीक का लाभ मिल पाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या भविष्य में आपदा चेतावनी व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाकर दोबारा लागू किया जाएगा? इन सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना जरूर है कि उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां कई बार कुछ मिनटों की चेतावनी भी दर्जनों जिंदगियां बचा सकती है, वहां सेल ब्रॉडकास्ट सिस्टम पर लगी यह रोक चर्चा का बड़ा विषय बन गई है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











