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उत्तराखंड के जमीनी मुद्दे चुनावी परिदृश्य से गायब, जिम्मेदार कौन?

06/04/19
in उत्तराखंड, देहरादून
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शंकर सिंह भाटिया
देश में सत्रहवीं लोक सभा के लिए आम चुनाव हो रहे हैं। उत्तराखंड में मुख्य चुनावी मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच है। इन दो पार्टियों के स्टार प्रचारक यहां आकर चुनावी फिजा को अपने पक्ष में हवा देने में लगे हुए हैं। चुनावी फिजा को अपने पक्ष में करने के लिए इन नेताओं ने कई मुद्दों को अपनी जन सभाओं तथा रोड शो में रखा है। लेकिन इन्होंने एक भी स्थानीय मुद्दे को उठाने की कोशिश तक नहीं की है। इन नेताओं को पता है कि उत्तराखंड एक राष्ट्रवादी भावना से ओतप्रोत क्षेत्र है, लोग अपने कष्टों को दरकिनार कर राष्ट्र की चिंता पहले करते हैं और राष्ट्रीय मुद्दों पर ही वोट भी करते हैं। इसलिए इस जर्जरहाल राज्य के वजूद से जुड़े स्थानीय मुद्दे भी चुनावी परिदृश्य से गायब हैं, कोई उन पर बात करने को तैयार नहीं है। उत्तराखंड में क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत का मौजूद न होना इन मुद्दों के पृष्ठभूमि में चले जाने की मुख्य वजह लगता है।
अब तक भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी उत्तराखंड में चुनावी सभाएं कर चुके हैं। इन चुनावी सभाओं के मुख्य फोकस देहरादून तथा रुद्रपुर हैं। उत्तरकाशी में अमित शाह की एक सभा हुई है। पहाड़ों में अधिकतम श्रीनगर तथा अल्मोड़ा में इन नेताओं की कुछ सभाएं प्रस्तावित हैं। नरेंद्र मोदी की देहरादून में हुई विजय संकल्प रैली में उनके भाषण का लब्बोलुआब राष्ट्रवाद पर केंद्रित था। उन्होंने सवाल उठाया कि कांग्रेस का हाथ किसके साथ है? उन्होंने कांग्रेस के घोषणा पत्र को ढकोसला पत्र बताते हुए उसके बहाने इफस्पा को हटाने और राष्ट्रद्रोह को आपराधिक श्रेणी से अलग करने के प्रयासों पर हमला किया। सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन देने की 40 साल पुरानी मांग को दरकिनार करने का आरोप कांग्रेस पर लगाया और अपने कार्यकाल के एक साल के अंदर इसे लागू करने का दावा किया। सामान्य वर्ग को दस प्रतिशत आरक्षण, गंगा की सफाई करने को अपनी उपलब्धि बताया। उन्होंने कांग्रेस तथा भ्रष्टाचार को एक दूसरे का पर्याय बताया। यदि स्थानीय मुद्दों की बात करें तो उन्होंने सिर्फ पलायन और पर्यटन को छुआ, इसमें भी पलायन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया और पर्यटन के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए अपनी पीठ खुद थपथपाई। दो साल पहले जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान इसी मैदान में उन्होंने पहाड़ के पानी और जवानी को पहाड़ के काम लाने के लिए डबल इंजिन की सरकार बनाने का आग्रह प्रदेश की जनता से किया था तो प्रदेश की जनता ने 70 में से 57 विधानसभा सीटें भाजपा को सौंप दी थी।
इस डबल इंजिन का उत्तराखंड को क्या लाभ मिला? इस पर प्रधानमंत्री मौन थे, लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इतना जरूर कहा कि केंद्र सरकार ने आल वेदर रोड समेत एक लाख पांच हजार करोड़ रुपये उत्तराखंड को दिए हैं। लेकिन इतनी बड़ी धनराशि पाकर भी पहाड़ों की हालत बदहाल क्यों हैं? पलायन पर एक आयोग बनाने के अलावा जमीन पर क्या काम हुआ है? पहाड़ में एक भी केंद्रीय संस्थान न खोलने के लिए प्रतिबद्ध डबल इंजिन की सरकार श्रीनगर के एक मात्र एनआईटी को जयपुर किन परिस्थितियों में ले गई है? पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाओं का इस कदर बुरा हाल क्यों है कि पहाड़ के सभी अस्पताल केवल रेफर सेंटर बन गए हैं? गर्भवती महिलाएं इस कदर मजबूर हैं कि उन्हें सड़कों पर बच्चों को जन्म देना पड़ रहा है और जच्चा बच्चा को जान गंवानी पड़ रही है? पहले से ही वन अधिनियम 1980 की मार झेल रहे पहाड़ पर इस अधिनियम को लगातार और कड़ा कर लोगों के हक हकूक को छीनने के प्रयास किए जा रहे हैं, यह चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाया? वनों की अधिकता की वजह से उत्तराखंड को जो आर्थिक नुकसान उठाने पड़ रहे हैं, उसके एवज में ग्रीन बोनस देने की मांग पिछले ढाई दशक से उठ रही है, यूएनओ भी उत्तराखंड की इस मांग को जायज ठहरा चुका है, लेकिन इस आम चुनाव के मौके पर यह भी चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाया? गैरसैंण राजधानी पर उत्तराखंड की जनता को क्यों छला जा रहा है? पहाड़ के विकास की बात करने वाली सरकारें तीन हजार से अधिक स्कूलों में ताले लगवा रही हैं, आईटीआई, पालिटेक्निकल संस्थानों को एक-एक कर बंद किया जा रहा है। इसके बाद भी ये विनाशकारी विकास उत्तराखंड में चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाया है?
भाजपा और कांग्रेस की एक आध चुनावी सभाओं को छोड़ दिया जाए तो उनका अधिकांश फोकस मैदानी क्षेत्रों में है। इसलिए पहाड़ के मुद्दे दरकिनार किये जा रहे हैं। राज्य गठन के बाद सन् 2002 में हुए विधानसभा तथा लोक सभा सीटों के परिसीमन के बाद 2006 में नया परिसीमन कर पहाड़ की छह सीटें कम कर मैदान में इतनी ही सीटें बढ़ा दी गई थी, ऐसा कर जिस तरह इस राज्य का सत्ता संतुलन मैदान के पक्ष में किया गया, यह भाजपा तथा कांग्रेस की मिलीभगत थी। इसलिए इन परिस्थितियों में पहाड़ उनके लिए कोई मायने नहीं रखता है। वहां के हालात, वहां की मांगों को छूने की भी उन्हें आवश्यकता ही नहीं है। भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह उत्तरकाशी के रामलीला मैदान में उत्तराखंड के विकास की बुलंदियां छूने का दावा करते हैं, उनसे जमीनी सवाल पूछने वाला कोई नहीं होता, विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी विपक्ष में होने के बावजूद उत्तराखंड के इन जमीनी समस्याओं को छूने की जहमत नहीं उठाते। क्योंकि उन्हें पता है कि यह कितनी ही बड़ी सच्चाई क्यों नहीं है, ये मुद्दे उन्हें वोट नहीं दिला सकते।
इन हालात में किसी तीसरी और क्षेत्रीय ताकत का मौजूद न होना इन दोनों दलों के लिए मनमुताबिक स्थितियां पैदा करता है। यदि कोई क्षेत्रीय ताकत मौजूद होती वह स्थानीय मुद्दों को फोकस में लाकर चुनाव लड़ती, तभी इतने गंभीर मुद्दे चुनावी मुद्दे बन पाते। जब ये चुनावी मुद्दे ही नहीं हैं, इन चुनावों के बाद बनने वाली सरकारें उन्हें आसानी से दरकिनार कर देगी। जो हमेशा होता रहा है।
राज्य गठन के 18 साल बाद भी पहाड़ की दुर्दशा के लिए किसी को जवाबदेह नहीं माना जा रहा है? बल्कि जो इसके लिए जिम्मेदार हैं, वही सत्ता सुख का मजा ले रहे हैं? अपनी जिम्मेदारियों को हवा में उड़ा रहा है और झूठे दावे करते हुए झिझक भी नहीं रहा है। राष्ट्रवाद के प्रवाह में बहने वाली जनता को किस तरह लहरों में बहाया जाता है, नेता बहुत अच्छी तरह जानते हैं। यही वजह है कि गली मोहल्लों की चुनावी बहसों में भी सिर्फ राष्ट्रवाद ही छाया हुआ है, स्थानीय मुद्दे वहां भी गायब हैं। स्थानीय मुद्दों को जनता ही नहीं उठाएगी तो नेता क्यों अपना हाथ जलाएंगे? उत्तराखंड इसी तरह बर्बाद होता रहेगा और राष्ट्रवाद में बहने वाली जनता नेताओं के भावुक भाषणों को शिकार बनती रहेगी? यही सच्चाई उत्तराखंड का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

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