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विश्व बंधुत्व के विचार और संदेश की मिसाल थे स्वामी विवेकानंद

04/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारतीय नवजागरण के अग्रदूत और माँ भारती के सच्चे सपूत राष्ट्रभक्त संत स्वामी विवेकानंद ने पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति के गौरव एवं भारतीय दर्शन की गहराइयों से रु-ब-रु करते हुए मानव के कल्याण, जनसेवा और नैतिक विकास के जो संदेश दुनियां को दिए है, वो कालजयी है I स्वामी विवेकानंद ने नैतिक आचरण, व्यक्तित्व विकास, सामाजिक सुधार, देश भक्ति, धर्म-अध्यात्म से लेकर युवा शक्ति और मातृ शक्ति की भक्ति, जीवन दर्शन, जिंदगी के असली मकसद और सफलता के फलसफे को अपने जीवन संदेश में बारम्बार उजागर किया है I स्वामी विवेकानंद का जीवन भारतवर्ष ही नहीं बल्कि किसी भी देश, काल, जाति, धर्म, ऊंच-नीच, अपने-पराये जैसे तमामतर विभेदो के परे वैचारिक क्रांति का एक ऐसा प्रकाश-पुंज है, जिसमे सदियों को आलोकित करते रहने की दिव्यता रची-बसी है I उनके विचारों के चंद अंशों को भी आत्मसात कर लिया जाये तो किसी भी कालखंड में कहीं भी मानवीय सरोकारों के विकास व संरक्षण के साथ ही नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति की क्रांति का सूत्रपात किया जा सकता है I चाहे बात राष्ट्र-भक्ति की हो या अंतराष्ट्रीय एकता का अलख जगाने की, लक्ष्य चाहे स्वयं में सोइ शक्तियों को जागृत करने का हो या फिर अध्यात्म का मार्ग पर कदम रखते हुए दिव्यता के दर्शन का, स्वामी विवेकानंद के विचारों की सुरभि से सब कुछ प्राप्त करना संभव है I निराशा में डूबे और परेशानियो में उलझे लोगो में आत्मशक्ति जगाने के लिए स्वामी विवेकानंद के विचारों को एक ऐसा टॉनिक बताया गया है, जो अद्भुत तरीके से तन-मन पर अपना असर डालकर, हमें भीतर तक झंकृत कर देते है I स्वामी विवेकानंद ने चालीस वर्षो से भी कम के अपने जीवनकाल (जन्म: १२ जनवरी १८६३, निर्वाण: ४ जुलाई १९०२) में धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिक, व सामाजिक मूल्यों तथा मातृभूमि की सच्ची सेवा को अपना ध्येय बनाकर दुनियां में ऐसी नज़ीर पेश की कि वे शक्ति के प्रतीक और मसीहा बनकर अमर-अजर हो गए I युवाओं को अपने सन्देश में स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि ‘स्वयं’ पे विश्वास रखो I सभी में अलौकिक शक्तियां निहित है I जिससे एक दिन तुम भारतवर्ष का भाग्य लिखोगे I इसके बाद हम अपने विचारों को लेकर दुनियां के देशों में पहुंचेंगे I इस प्रकार हम विश्व के देशों की उन ताकतों के विचार कोष का हिस्सा होंगे, जो अपने देशों को प्रगति के पथ पर ले जाना चाहती है’ I उन्होंने युवाओं को अपने जीवन को समाज, देश और मानवीयता की सेवा में समर्पित करने के लिए सदैव प्रेरित किया I स्वामी जी कहते थे ‘हे युवा मन, उठो-जागो, समय बहुत कम है, तेज तर्रार बनो, डर को दिमाग से निकाल फेंको I जैसे ही तुम भय का त्याग कर दोगे, जीवन का लक्ष्य आसान हो जायेगा, इसलिए उठो, यह देश तुमसे त्याग और बलिदान मांग रहा है I’ उन्होंने कहा कि ‘किसने देखा है कि पैसे ने आदमी को बनाया है, सदा व्यक्ति ही अपनी कर्मठता से धन-संपत्ति का सृजन करता है I मानव के ऊर्जा से ही सारे संसार का अस्तित्व है I हमारे पास विश्वास और जोश कि असीम पूंजी है I विश्व तुम्हारी ओर आशा भरी निगाहों से देख रहा हैं I अपनी रगों में बह रहे जोश को जागृत कर युवाओं आगे बढ़ो, कभी भी अपने मन में यह विचार मत लाओ कि मैं निर्धन हु या मेरा कोई मित्र नहीं हैं I अपनी जीवन में दैवीय शक्ति के प्रतिमूर्ति के रूप में देश-विदेश के लाखो युवाओं के मन में नवचेतना का अलख जगाने वाले विवेकानंद ने अपने विचार श्रृंखलाओं से युवाओं को राष्ट्र निर्माण के पथ पर लगाया I यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी हैं I धर्म, आध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति. जब इन सबका एक साथ जिक्र आता है तो सबसे पहला नाम आता है स्वामी विवेकानंद का. भारतीय इतिहास की सबसे महान हस्तियों में उनका शुमार है. अपने अल्प जीवनकाल में ही उन्होंने भारतीय संस्कृति और आध्यात्म की छाप और पहचान दुनिया के सामने पेश की थी, जिससे खास तौर पर पश्चिमी देश काफी प्रभावित हुए थे. आज ही के दिन 1902 में पश्चिम बंगाल के बेलूर मठ में उनका निधन हो गया था. महज 39 साल का जीवन जीने वाले स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस (12 जनवरी) को तो देश में युवा दिवस के रूप में मनाया ही जाता है, लेकिन उनके समाधि दिवस के दिन भी उन्हें उतनी ही श्रद्धा से याद किया जाता है. उन्होंने विश्व बंधुत्व से लेकर धार्मिक कट्टरता के खिलाफ संदेश का प्रसार किया.1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में दिया उनका भाषण आज भी किसी भारतीय के द्वारा दिए गए सबसे प्रभावी भाषणों में माना जाता है.अपने संबोधन में स्वामी विवेकानंद ने सांप्रदायिकता, धार्मिक कट्टरता और हिंसा का जिस तरह से उल्लेख किया था वह आज सवा सौ साल के बाद भी उतने ही भयावह रूप में उपस्थित हैं. उन्होंने कहा था कि अगर यह बुराइयां न होतीं तो दुनिया आज से कहीं बेहतर जगह होती.स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम पर रामकृष्ण मिशन की शुरुआत की थी, जो आज भी देश में सक्रिय है और आध्यात्मिक प्रचार प्रसार के साथ ही सामाजिक कार्यों में लगा रहता है. स्वामी विवेकानंद की शिक्षाओं ने देश के नागरिकों को उस वक्त भी जगाने का काम किया और आज भी वो उतनी ही सार्थक और व्यावहारिक हैं. खास तौर पर युवाओं के लिए उनकी शिक्षा का पालन बेहद उपयोगी रहा है.उन्होंने कहा था कि ‘अगर किसी दिन आपके सामने कोई समस्या न आए, तो मान लेना कि आप गलत रास्ते पर चल रहे हैं’. इसी तरह उन्होंने एक वक्त में एक ही कार्य पर ध्यान केंद्रित करने की सीख भी दी थी और कहा था कि उस काम को करते वक्त सब कुछ भूलकर पूरी आत्मा उसमें ही लगा देनी चाहिए.उनकी सबसे प्रेरक विचारों में से एक था- ‘उठो, जागो और जब तक अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर लो, तब तक रुकना नहीं है.’ विवेकानंद ने दुसरो के कल्याण और उत्थान के लिए जीवन को खपा देने की नसीहत दी, इसे ही असली खुशियों के ख़ज़ाने कि चाभी बताते हुए कहा कि दुसरो के लिए किया गया थोड़ा सा कार्य ही व्यक्ति की भीतरी शक्तियों को इस हद तक जागृत कर देता हैं, उसे ऐसे महसूस होता हैं जैसे मन में सोया कोई शेर जग गया हो I उन्होंने कहा कि गरीब, वंचित और उपेक्षित वर्ग के लोगो के लिए तब तक कार्य करते रहे, जब तक कि तुम्हे यह न लगे कि अब दिल कि धड़कने बंद होने वाली हैं, मस्तिष्क की शक्ति जब जवाब दे रही हैं और कही तुम पागल न हो जाओ I ऐसा करने के बाद अपना तन-मन परमशक्ति के चरणों में अर्पित कर दो I फिर जीवन में अद्वितीय शक्ति और ऊर्जा की धाराएं प्रवाहित होगी I जैसे-जैसे हम स्वामी विवेकानंद के जीवन संदेश और उनकी शिक्षाओं के करीब आते हैं, उनको आत्मसात करते हुए खुद को मानवता के कल्याण के लिए समर्पित करने की राह पर बढ़ने लगते हैं, हमें इस बात का बखूबी एहसास होने लगता हैं कि उनके द्वारा बोये गए सद्विचारों कि बीज कालांतर में कल्पवृक्ष बन कर हज़ारो लाखो लोगो के जीवन की दिशा और ध्येय को बदल रहे हैं I यह सिलसिला अनवरत जारी हैं, देखा जाये तो यह अनंतकाल तक जारी रहने वाली महागाथा हैं I विवेकानंद के विचारों की भांति हमारे पास मौजूद उस पारस की मानिंद हैं, जिससे होकर गुजरने मात्रा से जीवन स्वर्णिम पलों के ख़ज़ाने की सौगात में बदल सकता हैं I स्वामी विवेकानंद ने धर्म के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया, तथा हिंदू धर्म और वेदांत को अपने धर्म के रूप में पुनर्जीवित किया। उनका मानना ​​था कि हिंदू धर्म में सर्वोच्च सत्य, जो उनके लिए धर्म का “अद्वैत वेदांत दर्शन” था, केवल मनोवैज्ञानिक रूप से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने अनुभव किया कि धर्म के विभिन्न दर्शन, जैसे द्वैतवाद, योग्य अद्वैतवाद, और अद्वैतवाद, व्यक्ति के स्वभाव और क्षमता के आधार पर अलग-अलग दृष्टिकोण से भी एक ही सत्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रत्येक धर्म अपने तरीके से उच्चतम सत्य को व्यक्त करता है और उनके बीच कोई विरोधाभास नहीं है।स्वामीजी के अनुसार, “प्रत्येक आत्मा के भीतर परमात्मा की अनुभूति ही सच्चा धर्म है।” उनका मानना ​​था कि जब किसी को अपनी दिव्यता का एहसास हो जाता है, तो उसे कोई भय नहीं होता है यहां तक ​​कि स्वयं मृत्यु का भी नहीं । उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्म को केवल कल्पना का विषय नहीं होना चाहिए बल्कि इसे व्यावहारिक दुनिया और जीवन पर लागू किया जाना चाहिए। स्वामी विवेकानंद का सार्वभौमिक धर्म अंतर्धार्मिक संबंधों के प्रति अधिक उपयुक्त दृष्टिकोण है, क्योंकि इसमें सभी धर्मों के प्रति सम्मान और धार्मिक विविधता की स्वीकृति शामिल है। यह दृष्टिकोण धार्मिक बहुलवाद को स्वाभाविक मानता है और एक संतुलित और शांतिपूर्ण समाज के लिए आवश्यक आदर्श प्रदान करता है। सार्वभौमिक धर्म के लिए किसी को अपने विश्वास को बदलने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने स्वयं के प्रति सच्चे रहते हुए अन्य धर्मों के सर्वोत्तम तत्वों को स्वीकार करने और आत्मसात करने की आवश्यकता है।इस.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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