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शारदा नदी किनारे बना कूड़ा मखौल डंपिंग जोन

30/11/25
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
पूरे देश में स्वच्छता मिशन को लेकर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं. वहीं बात उत्तराखंड की की जाए तो शहरों में कूड़ा प्रबंधन को लेकर शहरी विकास विभाग द्वारा अनेकों योजनाओं को धरातल पर उतारा गया है. इस सबके बावजूद सीएम की विधानसभा सीट चंपावत की टनकपुर नगर पालिका परिषद द्वारा स्वच्छ भारत मिशन का मखौल उड़ाया जा रहा है. नगर पालिका द्वारा नगर पालिका क्षेत्र के शारदा घाट इलाके में बहने वाली पवित्र शारदा नदी के किनारे कूड़ा डंपिंग जॉन बनाया गया है. यहां पर पूरे नगर का कूड़ा नगर पालिका प्रशासन द्वारा फिंकवाया जा रहा है. कूड़े के ऊंचे ऊंचे ढेर उनमें लगी आग, दुर्गंध एवं पूरे इलाके में कूड़े से उठता धुआं लगातार प्रदूषण को बढ़ा रहा है.सीएम की विधानसभा क्षेत्र चंपावत के टनकपुर नगर पालिका पर क्षेत्र के लोगों ने उनकी मांगों को अनसुना करने का आरोप लगाया है. लोगों का कहना है कि स्वच्छ भारत मिशन, स्वच्छ भारत अभियान और करोड़ों की शारदा कॉरिडोर योजना से टनकपुर समेत चंपावत को स्वच्छ सुंदर और आदर्श चंपावत बनाने की परिकल्पना पालिका प्रशासन के ध्यान से दूर होता जा रहा है. आरोप लगाया है कि नगर पालिका प्रशासन ही इन योजनाओं का शारदा किनारे कूड़ा डंपिंग जोन बनाकर खुले आम मखौल उड़ा रहा है. कूड़े के पहाड़ रूपी ढेरों से उठने वाला जहरीला धुआं, दुर्गंध समेत महामारी फैलाने वाली गंदगी नगर के लोगों के लिए अभिशाप बन चुकी है.चंपावत जिले के टनकपुर नगर पालिका द्वारा पवित्र शारदा नदी किनारे पालिका प्रशासन द्वारा बनाए गए कूड़ा डंपिंग जोन की खबर को टीवी ने कुछ दिन पूर्व प्रमुखता से उठाया था. खबर के बाद पालिका प्रशासन ने कूड़े के ढेर में लगी आग को फायर कर्मियों की मदद से बुझाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री तो कर ली, लेकिन नगर वासियों समेत मां पूर्णागिरी धाम में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था पर चोट करते कूड़े के ढेर को कहीं अन्यत्र नगर से दूर स्थापित करने की योजना पर अभी भी पालिका प्रशासन की चुप्पी बड़े सवाल खड़े कर रही है. इस विकराल होती समस्या पर नगर के स्थानीय लोगों ने अपना दर्द साझा किया है. राज्य आंदोलनकारी का कहना है कि कूड़े के ढेर पर बने पूर्णागिरी यात्रियों के वाहनों का पार्किंग स्थल से पालिका प्रशासन लाखों की कमाई कर रहा है. लेकिन उसके बाद भी यात्रियों को कूड़े के ढेर से उठने वाले जहरीला धुआं और दुर्गंध का सामना करना पड़ रहा है. स्थानीय का कहना है कि डंपिंग जोन से लगे उपजिला चिकित्सकीय और आबादी एरिया के लोग इस कूड़े के ढेर से लंबे समय से परेशान हैं. शारदा किनारे नगर पालिका के कूड़े के डंपिंग जोन से लोग खासे परेशान हैं. उन्होंने नगर पालिका, जिला प्रशासन और राज्य सरकार से कूड़े के डंपिंग जोन को शारदा किनारे से हटाकर नगर से दूर निर्जन स्थान पर स्थापित करने की मांग की. साथ ही कहा कि धार्मिक नगरी में आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था का सम्मान होना चाहिए. वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि धार्मिक नगरी टनकपुर के ऊपर दाग की तरह शारदा नदी किनारे पालिका द्वारा बनाया गया कूड़ा डंपिंग जोन, नगर के लोगों को मुंह चिड़ा रहा है. लेकिन नगर पालिका लगातार इस ओर ध्यान देने के लिए संजीदा नहीं दिख रहा है. स्थानीय पर्यावरण संगठन और स्थानीय लोगों द्वारा शारदा किनारे से कूड़े के डंपिंग जोन को पिछले काफी समय से हटाने की मांग कर रहे हैं. लेकिन पालिका प्रशासन मांगों को लगातार नजर अंदाज कर रहा है. वहीं इस विषय पर नगर पालिका अध्यक्ष टनकपुर कैमरे के सामने कुछ भी कहने से बचते नजर आए. उन्होंने जिम्मेदारी से पीछे छुड़ाते हुए कहा कि नगर पालिका ईओ ही मामले पर जानकारी देंगे. शारदा कॉरिडोर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है. लेकिन यहां सीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट का टनकपुर नगर पालिका मखौल उड़ा रही है. नगर पालिका प्रशासन द्वारा लम्बे समय से शारदा नदी के किनारे ही कूड़ा डंपिंग जोन बनाकर शहर भर का कूड़ा डाला जा रहा है. कूड़े के ढेर से उठती दुर्गंध एवं इसको जलाने से हो रहा धुंआ पूरे शारदा घाट इलाके को प्रदूषित कर रहा है. पूर्णागिरि आने वाले श्रद्धालुओं के वाहनों के पार्किंग स्थल पर खड़ा होना मुश्किल हो जाता है. इस सबके बावजूद ना एनजीटी और ना प्रशासन इस ओर संजीदा दिख रहे हैं.  शारदा कॉरिडोर के रूप में करोड़ों की विकास योजनाओं के माध्यम से शारदा घाट सौंदर्यीकरण सहित धार्मिक नगरी टनकपुर को संवारने की कवायद की जा रही है. दूसरी तरफ नगर पालिका प्रशासन पूरे नगर के कूड़े को शारदा नदी के किनारे डालकर सीएम धामी की शारदा कॉरिडोर की महत्वाकांक्षी योजना को पलीता लगाती दिख रही है. टनकपुर में पवित्र शारदा नदी के किनारे नगर पालिका द्वारा बनाया गया कूड़ा डंपिंग स्थल को ना तो नगर पालिका प्रशासन द्वारा कवर किया गया है, ना ही उक्त स्थान पर कूड़ा निस्तारण की फिलहाल कोई व्यवस्था रखी गई है. उसके उलट कूड़े के ढेर में आग लगी हुई है, जिससे लगातार उठता जहरीला धुआं स्थानीय लोगों के साथ-साथ हजारों की संख्या में आने वाले तीर्थ यात्रियों को भी परेशान कर रहा है. कूड़े के ढेर में गो वंशीय पशुओं का जमावड़ा लगा है. ये पशु कूड़े के ढेर से पन्नियों व अन्य प्रदूषित चीजों को खाकर अपनी जान को खतरे में डाल रहे हैं. प्रभारी अधिशासी अधिकारी ने माना कि शारदा नदी के किनारे से कूड़ा स्थल हटाने की नगर पालिका की फिलहाल कोई योजना नहीं है. बड़ा सवाल अब यह उठता है कि स्थानीय विधायक एवं प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी के चंपावत जिले को आखिर इन हालातों में किस तरह स्वच्छ सुंदर एवं आदर्श मॉडल जिला बनाया जा सकेगा.प्रभारी अधिशासी अधिकारी ने माना कि शारदा नदी के किनारे से कूड़ा स्थल हटाने की नगर पालिका की फिलहाल कोई योजना नहीं है. बड़ा सवाल अब यह उठता है कि स्थानीय विधायक एवं प्रदेश के मुखिया के चंपावत जिले को आखिर इन हालातों में किस तरह स्वच्छ सुंदर एवं आदर्श मॉडल जिला बनाया जा सकेगा. शारदा कॉरिडोर क्षेत्र में भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र का अध्ययन कर उनके सुरक्षात्मक उपायों पर भी कार्य किया जाए. इस परियोजना के तहत धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए शारदा नदी के किनारे रिवरफ्रंट विकसित किया जाएगा. रिवरफ्रंट के अंतर्गत नदी के किनारे घाटों का सौंदर्यीकरण कर पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं को अनेक सुविधाएं प्रदान की जाएंगी. दरअसल चंपावत जिले में धार्मिक, साहसिक पर्यटन, प्राकृतिक सौंदर्य के कारण आध्यात्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं. मां पूर्णागिरि शक्तिपीठ, स्वामी विवेकानंद के आश्रम, तीर्थ स्थल रीठा साहिब, गुरु गोरखनाथ मंदिर का जिम कॉर्बेट की कर्म स्थली के साथ ऐतिहासिक महत्व भी है. पूर्णागिरि मेले में बड़ी संख्या में लोग दर्शन के लिए आते हैं. इसी के कारण शारदा कॉरिडोर परियोजना का निर्माण कार्य किया जा रहा है.
बागेश्वर जिला मुख्यालय से महज 23 किलोमीटर दूर बसे चौनी गांव में आज खामोशी इतनी गहरी है कि अपने कदमों की आवाज भी अजनबी लगती है। कभी खुशहाल बाखली थी। सुबह-शाम चूल्हों से धुआं उठता था। बच्चों की हंसी गूंजती थी। खेतों में हल चलाए जाते थे। आज यह गांव पूरी तरह वीरान है। उत्तराखंड राज्य स्थापना के 25वें साल में यहां रहने वाला अंतिम परिवार भी दरवाजे पर ताला लगाकर चला गया है।चमड़थल ग्राम पंचायत का यह गांव कभी 25 परिवारों से आबाद हुआ करता था। वर्ष 2015 तक यह संख्या 15 पर आ गई। वर्ष 2025 में गांव की आखिरी रहवासी महिला भी मजबूरी में गांव छोड़ गई।बागेश्वर जिले का चौनी गांव, जो कभी 25 परिवारों की हंसी-खुशी से गूंजता था, अब पूरी तरह वीरान हो चुका है. वर्ष 2025 में यहां के अंतिम रहवासी परिवार ने भी मजबूरी में गांव छोड़ दिया, जिसके बाद यह पूरा गांव जनशून्य हो गया. जिला मुख्यालय से मात्र 23 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में आज सन्नाटा इतना गहरा है कि अपने कदमों की आवाज भी अजनबी सी लगती है. कभी बाखली में उठता चूल्हों का धुआं, बच्चों की खिलखिलाहट और खेतों में गूंजती हल की आवाजें अब केवल याद बनकर रह गई हैं.चमड़थल ग्राम पंचायत का यह गांव साल 2015 तक 15 परिवारों के सहारे टिका हुआ था, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाएं न मिलने के कारण लोग एक-एक कर पलायन करते गए. अंततः 2025 में आखिरी रहवासी महिला भी गांव छोड़ने को मजबूर हो गई. न्यूज एजेंसी की टीम ने जब गांव का जायजा लिया, तो आंगन में उगी झाड़ियां और बंद पड़े घर बताते हैं कि कैसे पलायन ने इस गांव को धीरे-धीरे निगल लिया. करीब 550 नाली उपजाऊ भूमि आज भी किसी के लौटने और हल चलाने का इंतजार कर रही है, लेकिन खेत सुनसान पड़े हैं. पुराने नक्काशीदार मकान हों या नए लिंटर वाले घर सभी पर ताले लटके हैं. कुछ घर खंडहर बन चुके हैं, तो बाकी खंडहर होने की कगार पर गांव के वरिष्ठ नागरिक और सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य कहते हैं कि सुविधाओं के अभाव के लिए गांव से लेकर प्रदेश और देश की सभी सरकारें जिम्मेदार हैं. “मैं इसी गांव में रहते हुए क्षेत्र का पहला स्नातक बना था, लेकिन सुविधाओं के अभाव में मुझे भी गांव छोड़ना पड़ा. संघर्ष आज भी जारी है,” वे बताते हैं. इसी तरह गणेश चंद्र कहते हैं कि वर्षों तक गांव में सुविधाएं न मिलने के कारण लोग दिल्ली, लखनऊ और अन्य शहरों में बसते चले गए. “हमारा परिवार पिछले साल तक गांव में था, लेकिन अब हमने भी सड़क के नजदीक नया मकान बना लिया है.” ग्रामीण का कहना है कि अगर सरकार रोजगारपरक योजनाएं, कीवी, माल्टा, अदरक, हल्दी की खेती या मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देती, तो हालात बदल सकते थे. बागेश्वर के सीडीओ का कहना है कि राज्य सरकार पलायन रोकथाम योजनाओं पर काम कर रही है और कुछ गांवों में रिवर्स पलायन भी देखने को मिला है. “चौनी गांव के खाली होने के कारणों की जांच के लिए अधिकारियों की बैठक बुलाई जाएगी और गांव को फिर से बसाने का प्रयास किया जाएगा,” वे आश्वस्त करते हैं. चौनी गांव भले ही इंसानी जिंदगी से खाली हो चुका हो, लेकिन ग्रामीणों की मान्यता है कि यहां आज भी देवता बसते हैं. हर साल गर्मियों में पलायन कर चुके परिवार पूजा-अर्चना के लिए अपने पैतृक घरों में लौटते हैं. आठ-दस दिनों के लिए गांव में फिर चहल-पहल लौट आती है. झाड़ियां काटी जाती हैं, रास्ते साफ होते हैं और पुराने चूल्हों में फिर धुआं उठता है. लेकिन पूजा के बाद गांव फिर उसी खामोशी में डूब जाता है, जहां बंद घरों के ताले बारिश और धूप में धीरे-धीरे जंग खाते रहते हैं. चौनी आज सिर्फ एक गांव नहीं यह एक चेतावनी है कि अगर पहाड़ों में बुनियादी सुविधाएं और रोजगार नहीं पहुंचे, तो ऐसे वीरान होते गांवों की संख्या बढ़ती जाएगी. सरकार कितने ही पलायन आयोग बना ले। लेकिन मूलभूत समस्याओं व बुनियादी जरूरतों से जूझते गांव लगातार खाली होते जा रहे है। कभी अपने साथ आस-पास के गांवों को आबाद करने वाला गांव अब वीरान हो गया है। यहां अब दूर-दूर तक गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है। गांव के स्कूल में शिक्षक नहीं, अस्पताल में डॉक्टर नहीं, टेलीफोन-मोबाइल में सिग्नल नहीं, नल में पानी नहीं, बिजली सप्लाई अनियमित आदि वजहों से पहाड़ के गांव के लोग कस्बों या देहरादून, हल्द्वानी, टनकपुर-खटीमा में पलायन कर रहे हैं। पलायन स्वभाविक प्रक्रिया है। पलायन के बाद भी उत्तराखंड में अभी करीब एक करोड़ की आबादी है। ग्रामीण आबादी अब पलायन न करे, उसके लिए सरकार को गंभीर प्रयास करने होंगे। गांव में पैथालॉजी, जंगली जानवरों और लैंटाना घास पर नियंत्रण, वन विभाग व कृषि विभाग परस्पर सहयोग करे तो पलायन न केवल थमेगा, बल्कि श्राद्ध, बरसी या लोक देवता को पूजने हर साल गांव आने वाले प्रवासी भी फिर से गांव में बसने की सोच सकते हैं। खेती में तकनीकी का उपयोग, जैविक खेती को प्रोत्साहन, जंगलों पर अधिकार बढ़ाने, ग्रामीण सड़कों पर सार्वजनिक परिवहन से भी पलायन में कमी आएगी। पलायन आयोग की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में पलायन का प्रभाव गहराई से महसूस किया जा सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, 307310 लोग राज्य से पलायन कर चुके हैं, जिनमें से 28531 लोग स्थायी रूप से राज्य छोड़ चुके हैं. इस आंकड़े से स्पष्ट है कि पहाड़ों में आज भी रहने का संकट गहराता जा रहा है.गांवों की रौनक लौटाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार के क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता है. सरकार का उद्देश्य है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे का विकास कर वहां रहने योग्य वातावरण बनाया जाए. इसके लिए विशेष योजनाएं बनाई गई हैं, जिनमें सरकारी नौकरियों के अवसरों को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाना, पर्यटन के लिए बेहतर सुविधाएं मुहैया कराना, और स्थानीय उत्पादों के विपणन को बढ़ावा देना शामिल है.विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य सरकार गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाए और शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करे, तो पलायन को रोका जा सकता है. इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर सामुदायिक विकास कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करना भी एक कारगर उपाय साबित हो सकता है.पलायन की चुनौती उत्तराखंड के विकास में एक बड़ी बाधा बनी हुई है. राज्य स्थापना के 25 वर्षों बाद भी पलायन का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत जरूरतों की कमी से लोग अपने गांवों को छोड़ रहे हैं. हालांकि, सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर है और कई योजनाओं पर काम कर रही है. यदि इन योजनाओं का सही तरीके से कार्यान्वयन किया जाए और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार तथा आधारभूत ढांचे का विकास किया जाए, तो उत्तराखंड के गांवों की रौनक लौट सकती है और पहाड़ों में बसावट को फिर से बढ़ावा मिल सकता है.लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। *लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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