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श्रीदेव सुमन ने उत्तराखंड में आजादी की राह दिखाई

25/05/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
श्री देव सुमन जी का जन्म टिहरी गढ़वाल जिले की बमुण्ड पट्टी के ग्राम जौल में 25 मई,1916 को हुआ था. इनके पिता का नाम श्री हरिराम बड़ोनी और माता जी का नाम श्रीमती तारा देवी था. इनके पिता श्री हरिराम बडोनी जी अपने इलाके के लोकप्रिय वैद्य थे. 1919 में जब क्षेत्र में हैजे का प्रकोप हुआ तो उन्होंने अपनी परवाह किये बिना रोगियों की अथाह सेवा की, जिसके फल स्वरुप वे 36 वर्ष की अल्पायु में स्वयं भी हैजे के शिकार हो गये. लेकिन दृढ़निश्चयी साध्वी माता ने धैर्य के साथ बच्चों का उचित पालन-पोषण किया और श्री देव सुमन जी की शिक्षा-दीक्षा का उचित प्रबन्ध भी किया.इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गांव और चम्बाखाल में हुई और 1931 में टिहरी से हिन्दी मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की.अपने विद्यार्थी जीवन के प्रारम्भिक काल से ही श्रीदेव सुमन गांधी जी के देशभक्तिपूर्ण विचारों से बहुत प्रभावित थे.सन् 1930 में जब वह किसी काम से देहरादून गये थे तो सत्याग्रही जत्थों को देखकर वे उनमें शामिल हो गये, इनको 14-15 दिन की जेल भी हुई. सन 1931 में ये देहरादून गये और वहां नेशनल हिन्दू स्कूल में अध्यापकी करने लगे और उसके बाद दिल्ली आ गये. पंजाब विश्वविद्यालय से इन्होंने ’रत्न’,’भूषण’ और ’प्रभाकर’ परीक्षायें उत्तीर्ण की फिर हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ’विशारद’ और ’साहित्य रत्न’ की परीक्षायें भी उत्तीर्ण कीं.दिल्ली में उन्होंने कुछ मित्रों के सहयोग से देवनागरी महाविद्यालय की स्थापना की. और 1937 में “सुमन सौरभ” नाम से अपनी कवितायें भी प्रकाशित कराईं. श्री देव सुमन जी को पत्रकारिता में विशेष रुचि थी और उन्होंने भाई परमानन्द के अखबार ’हिन्दू’ में कार्य किया, फिर ’धर्म राज्य’ पत्र में कार्य किया. वे वर्धा भी गये और राष्ट्रभाषा प्रचार कार्यालय में काम करने लगे. इसी दौरान श्री देव सुमन काका कालेलकर, श्री बा. वि. पराड़कर, लक्ष्मीधर बाजपेई आदि के सम्पर्क में आये. वहां से इलाहाबाद आकर ’राष्ट्र मत’ नामक समाचार पत्र में सहकारी सम्पादक के रूप में काम करने लगे. जनता की क्रियात्मक सेवा करने के उद्देश्य से 1937 में इन्होंने दिल्ली में “गढ़देश-सेवा-संघ” की स्थापना की जो बाद में ’हिमालय सेवा संघ’ के नाम से विख्यात हुआ.1938 में जब वह गढ़वाल भ्रमण पर गये और जिला राजनैतिक सम्मेलन, श्रीनगर में सम्मिलित हुये तो इसी अवसर पर वे पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन में आ गये और उन्होंने जवाहर लाल नेहरु  को गढ़वाल राज्य की दुर्दशा से परिचित करया और यहीं उन्होंने गढ़वाल राज्य की एकता का नारा भी बुलन्द किया.ढ़ाई महीने देहरादून जेल में रखने के बाद इन्हें आगरा सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया, जहां ये 15 महीने नजरबन्द रखे गये. इस बीच टिहरी रियासत की जनता लगातार लामबंद होती रही और अंग्रेज हुकुमत के इशारे पर  रियासत उनका उत्पीड़न करती रही. टिहरी रियासत के जुल्मों के संबंध में इस दौरान जवाहर लाल नेहरु ने कहा था- “टिहरी राज्य के कैद खाने दुनिया भर में मशहूर रहेंगे, लेकिन इससे दुनिया में रियासत की कोई इज्जत नहीं बढ़ सकती.”23 जनवरी,1939 को देहरादून में टिहरी राज्य प्रजा मण्डल  की  स्थापना हुई, जिसमें देव सुमन संयोजक मन्त्री चुने गये. इसी माह में जब जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद  का लुधियाना अधिवेशन हुआ तो उन्होंने टिहरी और अन्य हिमालयी रियासतों की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया. ’हिमालय सेवा संघ’ के द्वारा उन्होंने हिमालय प्रांतीय देशी राज्य प्रजा परिषद का गठन किया और उसके द्वारा पर्वतीय राज्यों में जागृति और चेतना लाने का काम किया. इस बीच लैंसडाउन से प्रकाशित ’कर्मभूमि’ पत्रिका के सम्पादन मंडल में शामिल होकर उन्होंने कई क्रातिकारी विचारपूर्ण लेख लिखे.अगस्त 1942 में जब गाँधी जी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन प्रारम्भ हुआ तो टिहरी आते समय इन्हें 29 अगस्त,1942  को देवप्रयाग में ही गिरफ्तार कर लिया गया और 10 दिन मुनि की रेती जेल में रखने के बाद 6 सितम्बर को देहरादून जेल भेज दिया गया. ढ़ाई महीने देहरादून जेल में रखने के बाद इन्हें आगरा सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया, जहां ये 15 महीने नजरबन्द रखे गये. इस बीच टिहरी रियासत की जनता लगातार लामबंद होती रही और अंग्रेज हुकुमत के इशारे पर  रियासत उनका उत्पीड़न करती रही. टिहरी रियासत के जुल्मों के संबंध में इस दौरान जवाहर लाल नेहरु ने कहा था- “टिहरी राज्य के कैद खाने दुनिया भर में मशहूर रहेंगे, लेकिन इससे दुनिया में रियासत की कोई इज्जत नहीं बढ़ सकती.” 19 नवम्बर,1942 को देव सुमन आगरा जेल से रिहा हुए और फिर  टिहरी की जनता के अधिकारों को लेकर अपनी आवाज बुलन्द करने लगे.इनके क्रांतिकारी शब्द थे- “मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूंगा लेकिन टिहरी के नागरिक अधिकारों को कुचलने नहीं दूंगा.”इस बीच इन्होंने दरबार और प्रजामण्डल के बीच सम्मानजनक समझौता कराने का संधि प्रस्ताव भी भेजा, लेकिन दरबारियों ने उसे खारिज कर दिया. 27 दिसम्बर, 1942  को इन्हें चम्बाखाल में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और 30 दिसम्बर को टिहरी जेल भिजवा दिया गया जहां पर उन्हें काफी प्रताड़ना दी गई. वहां उन्हें इस तरह का खाना दिया जाता था जो खाने लायक नहीं होता था जिससे तंग आकर उन्होंने अनशन शुरू कर दिया. उन्होंने 84 दिन तक लगातार अनशन किया जिसके बाद 25 जुलाई 1944 को इस क्रातिकारी अमर शहीद का शव ही बाहर आ सका.अपनी जन्मभूमि के प्रति ऐसी अपार श्रद्धा तथा बलिदान की भावना रखने वाले उत्तराखंड के इस महान् स्वतंत्रता सेनानी,अमर शहीद श्री देव सुमन जी का जीवन दर्शन और उनके क्रांतिकारी विचार वर्त्तमान संदर्भ में भी आज बहुत प्रासंगिक हो गए हैं.उत्तराखंड के इस महान् क्रांतिकारी के देशभक्तिपूर्ण जीवन मूल्यों को कभी नहीं भुलाया जा सकता.कहने को तो आज हमारा देश अंग्रेजों की राजनैतिक गुलामी से आजाद हो चुका है किंतु अवसरवादी सत्तालोलुप राजनेताओं की वजह से यहां की अधिकांश जनता और खासकर उत्तराखंड की जनता आजादी मिलने के बाद भी अपनी आजीविका, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि मौलिक अधिकारों से वंचित होने के कारण आज या तो बदहाली का जीवन बिता रही है अथवा पलायन के लिए विवश है. मानवाधिकारों के संकट से जूझ रहे उत्तराखंडवासियों के लिए अमर शहीद स्वंत्रता सेनानी श्री देव सुमन जी का जीवन दर्शन आज पहले से भी ज्यादा अनुकरणीय हो गया है. श्री देवसुमन जी का एक देशभक्तिपूर्ण कविता संग्रह ‘सुमन सौरभ’ नाम से सन् 1937 में प्रकाशित हुआ था. बहुत कम लोगों को इस कविता संग्रह के बारे में जानकारी है. कैसे रहे होंगे देश हित को समर्पित इस क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त के विचार!  उसी कविता संग्रह में ‘जननी जन्मभूमि’ शीर्षक से लिखी एक कविता है-
“जिस जननी के शुचि रजकण से,
तन मन है यह जीवन है !
जिसके निस्सीम अनुग्रह से,
मिलता उर को नित भोजन है !
शुभ स्नेहमयी जिस गोदी में,
विश्राम हमें मिलता नित है !
जिस राष्ट्र ध्वजा के तले अहा,
बन मोदमयी खिलता चित है !
वह प्रेम की मूर्ति मनोरम हां,
सुख शांति से हीन अहो अब है !
मुख मंजुल कान्तिविहीन बना,
उसको सुख हाय मिला कब है !!”
श्री  देव सुमन रचित “सुमन  सौरभ” नाम से प्रकाशित उनकी कविता “जननी जन्म भूमि” से उद्धृत उपर्युक्त काव्यपंक्तियों द्वारा टिहरी जनक्रांति के नायक, संघर्ष व बलिदान की प्रतिमूर्ति, अमर शहीद श्रीदेव सुमन जी उन्हें शत शत नमन!! लेकिन उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गयी। अपने जीते जी न सही, अपनी शहादत के बाद वे अपना मकसद पूरा कर गये। उनकी शहादत का जनता पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उनके बलिदान का अघ्र्य पाकर टिहरी राज्य में आंदोलन और तेज हो गया। जनता ने राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। इसके फलस्वरूप टिहरी रियासत को प्रजामंडल को वैधानिक करार देने को मजबूर होना पड़ा।मई 1947 में प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन हुआ। 1948 में जनता ने देवप्रयाग, कीर्तिनगर और टिहरी पर अधिकार कर लिया और प्रजामंडल का मंत्रिपरिषद गठित हुआ।  इसके बाद 1 अगस्त 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य का भारतीय गणराज्य में विलय हो गया। पुराने टिहरी शहर की जेल और काल कोठरी तो अब बांध बन जाने से डूब गयी है, पर नई टिहरी की जेल में उन्हें बांधने वाली हथकड़ी व बेड़ियां अब भी मौजूद हैं।सुमन ने 17 जून 1937  को ‘‘सुमन सौरभ’’ नामक 32 पेजों का यह संग्रह प्रकाशित किया। वे हिन्दू, धर्मराज, राष्ट्रमत, कर्मभूमि जैसे हिन्दी व अंग्रेजी के पत्रों के सम्पादन से जुड़े रहे। वे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के भी सक्रिय कार्यकर्ता थे। उन्होंने गढ़ देश सेवा संघ, हिमालय सेवा संघ, हिमालय प्रांतीय देशी राज्य प्रजा परिषद, हिमालय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद आदि संस्थाओं के स्थापना की। श्री देव सुमन के शहीद होने की खबर के फैलते ही टिहरी राजशाही के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर गई। आंदोलन बहुत ही तेज हो गया। जनता के आक्रोश के बाद 1 अगस्त 1949 को टेहरी रियासत का आजाद हिंदुस्तान में विलय हो गया। श्री देव सुमन के बलिदान दिवस 25 जुलाई को ऐतिहासिक जेल जनता के दर्शनार्थ खोली जाती है। टिहरी रियासत ने जिन बेड़ियों से श्री देव को जकड़ा था। जनता उन बेड़ियों को भी नमन करती है। उत्तराखंड सरकार ने एक विश्वविद्यालय का नामकरण किया है। शहीद श्रीदेव सुमन को आज पूरा उत्तराखंड याद कर रहा है। महान क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन के परिजनों ने आज भी उनकी जुड़ी वस्तुओं को संजोकर रखा है. राजशाही की पुलिस का डंडा श्रीदेव सुमन के परिजनों ने अभी तक संजोकर रखा है. बता दें कि श्रीदेव सुमन सबसे बड़े आंदोलनकारी रहे हैं. टिहरी राजशाही के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले श्रीदेव सुमन के घर पर उनका सामान आज भी सुरक्षित है.श्रीदेव सुमन को देखते ही पुलिस के एक जवान ने उनके ऊपर जोर से डंडा फेंका था. श्रीदेव सुमन तो भाग गए, लेकिन डंडा एक झाड़ी में उलझ गया. जो डंडा झाड़ी में अटक गया था, उसे श्रीदेव सुमन की मां ने अपने पास छुपा दिया था. राजशाही की पुलिस ने सुमन की मां से डंडा वापस मांगा और धमकी भी दी, लेकिन श्रीदेव सुमन की मां ने डंडा वापस नहीं दिया.इसके बाद राजशाही की पुलिस टिहरी वापस चली गई. वहीं, श्रीदेव सुमन के भाई के बेटे मस्तराम बडोनी की मानें तो श्रीदेव सुमन से जुड़ी यादें पलंग, डेस्क और पुलिस का डंडा आज भी उनके पास सुरक्षित है. जिन्हें वे अपने पितरों की निशानी समझते हैं. है। *लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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