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शहादत के लिए युगों तक याद रखे जाएंगे श्री देव सुमन

25/05/21
in उत्तराखंड, टिहरी
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
श्री देव सुमन मूल नाम श्री दत्त बडोनी का जन्म 25 मई 1916 में उत्तराखंड के टिहरी जिले के जोल गांव में हुआ। उनके पिता एक डॉक्टर थे एवं उनकी माता ग्रहणी। उनके जन्म का ये वो समय था, जब गढ़वाल के राजशाही घराने का जनता पर हुकुम चलता था। जनता उन्हीं आधिकारियों एवं राजशाही परिवारों के अनुसार चलती थी। श्री देव सुमन ने अपनी शुरुआती पढाई टिहरी राज्य से ही की और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह देहरादून चले गये, अपने छात्र जीवन से ही गाँधीवादी विचारधारा से प्रेरित सुमन जी ने नमक सत्याग्रह आन्दोलन में भी अपना योगदान दिया, जिस कारण उन्हें 14 दिन की जेल भी हुई। वह अपने आगे की पढाई के लिए दिल्ली चले गए। जहाँ उन्होंने 1932 में एक अध्यापक का कार्यभार संभाला। इस बीच उन्होंने सुमन सोरव नामक एक कविता संग्रह भी प्रकाशित किया। हिंदी साहित्य से जुड़े हुए व्यक्ति रहे।

उन्होंने बहुत सारी समाज सेवी संस्थाओं की भी स्थापना की, जैसे हिमालय सेवा संघ, गढ़वाल सेवा संघ, राज्य प्रजा परिषद आदि। वह जनता पर राज्य व अंग्रेजों द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों से हमेशा आहत रहे और उसी विषय में लगातार लोगों को जागरूक करने की कोशिश में लगे रहे, 1939 में टिहरी राज्य प्रजा मंडल जो कि राज्य सरकार के अत्याचारों के विरुद्ध एक संस्था थी, उसका अध्यक्ष सुमन को बनाया गया। अपने प्रभावी कार्य और कुशल नेतृत्व के कारण वह लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगे थे। इसी डर से कि जनता राज्य के खिलाफ आन्दोलन न कर दे, उन्हें आधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और राज्य से निष्कासित कर दिया गया। उनके टिहरी आने पर पाबन्दी भी लगा दी गयी। स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी, टिहरी जनक्रांति के महानायक, 84 दिनों तक आमरण अनशन कर देश और टिहरी राज्य के लिए अपनी कुर्बानी देने वाले टिहरी राजशाही के खिलाफ जबरदस्त विद्रोह कर राजशाही को हिलाकर रखने वाले अमर शहीद श्रीदेव सुमन ने पत्रकार के रूप में काम कर आंदोलन को धार दी।

श्रीदेव सुमन के पिता का नाम श्री हरिराम बड़ोनी और माता जी का नाम श्रीमती तारा देवी था। श्री देव सुमन के बचपन का नाम श्रीदत्त बडोनी था। इनका बलिदान राज्य सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए 84 दिन के आमरण अनशन के बाद इनको रात्रि में मारकर नदी में डाल दिया गया था। इनकी मृत्यु पर इनके पार्थिव शरीर को परिवार एवं आंदोलनकारियों को नहीं दिखाया गया। जिसकी सुनवाई नहीं हुई। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय नेता थे। उन्होंने न केवल अंग्रेजों का विरोध किया बल्कि टिहरी रियासत के गढ़वाल राजा का भी विरोध किया। उनकी पूरी राजनीति महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्य के सिद्धांत से प्रभावित थी।

भारतीय देशी राज्य परिषद का अधिवेशन पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में लुधियाना में सम्पन्न हुआ। श्रीदेव सुमन ने टिहरी राज्य प्रजामण्डल के प्रतिनिधि के रूप में इस अधिवेशन में बढ़.चढ़कर भाग लिया। अप्रैल 1940 में श्रीदेव सुमन रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के पश्चात देहरादून पहुंचे। इसके बाद टिहरी रियासत में प्रवेश किया और पुनः रियायत की जनविरोधी नीतियों के विरोध में जनता को जागृत किया। उन्होंने टिहरी के राजा बोलंदा बद्रीनाथ से पूरी आजादी की मांग की थी। जिससे नाराज होकर राजा ने उन्हें विद्रोही घोषित कर दिया तथा पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 11 नवम्बर 1943 को आगरा जेल से रिहा होने के बाद वे अपनी कार्यस्थली टिहरी जाने लगे। कई लोगों ने उन्हें टिहरी रियासत में प्रवेश न करने की सलाह दी। क्योंकि वहां से वे किसी भी समय पकडे़ जा सकते थे। सुमन ने कहा, मेरा कार्य क्षेत्र टिहरी है और जनता के अधिकारों के लिये टिहरी के सामन्तवाद के विरोध में लड़ना मेरा पुनीत कर्तव्य है। टिहरी नरेश ने इस बीच सूमन जी को कई प्रलोभन दिये, लेकिन वे राजा के समक्ष नहीं झुके और टिहरी रियासत की जन विरोधी राज.सत्ता को उखाड़ने के लिये उन्होंने अपना आन्दोलन और तेज कर दिया।

आन्दोलन भरे जीवन के मध्यान्त में उन्हें 30 दिसम्बर 1943 को चम्बा में पकड़ कर टिहरी जेल भेज दिया गया। रियासत की जेल में दर्दनाक यातनायें दी गई। उन पर राजद्रोह का झूठा मुकदमा चलाया गया। सुमन जी ने अपने मुकदमे की खुद पैरवी की और कहा. मेरे विरूद्ध जो गवाह पेश किये गये वे कतई बनावटी और बदले की भावना से प्रेरित हैं। मैं इस बात को स्वीकारता हूं कि मैं जहां अपने देश की पूर्ण स्वाधीनता के घेरे में विश्वास करता हूं। वहीं टिहरी रियासत में मेरा प्रजामण्डल का उददेश्य वैध व शान्तिपूर्ण तरीके से महाराज की छत्रछाया में उत्तरदाई शासन प्राप्त करना है। सेवा के माध्यम से राज्य की सामाजिक, आर्थिक और सब तरह की उन्नति करना है। मैं प्राण रहते हुये इस राज्य के सार्वजनिक जाीवन का अन्त नहीं होने दूंगा। जहां पर उन्हें काफी प्रताड़ना दी गई। उन्हें इस तरह का खाना दिया जाता था जो खाने लायक नहीं होता था। जिससे तंग आकर उन्होंने अनशन शुरू कर दिया। इन्होंने 84 दिन तक लगातार अनशन किया जिसके बाद 25 जुलाई 1944 को उनकी मौत हो गई। इनकी धर्म पत्नी विनय लक्ष्मी सुमन टिहरी गढ़वाल से उत्तर प्रदेश में विधायक रही। महान क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन के परिजनों ने आज भी उनकी याद में उनसे जुड़ी वस्तुओं को संजोकर रखा है। टिहरी राजशाही के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले श्रीदेव सुमन के घर पर उनका सामान आज भी सुरक्षित है। वहीं श्रीदेव सुमन के भाई के पुत्र मस्तराम बड़ोनी ने बताया कि श्रीदेव सुमन से जुड़ी यादें पलंग, डेस्क और पुलिस का डंडा आज भी उनके पास सुरक्षित है। जिन्हें वे अपने पितरों की निशानी समझते हैं। उन्होंने कहा कि यहां पर श्रीदेव सुमन की जयंती और बलिदान दिवस पर कई नेता मुख्यमंत्री आए और इन वस्तुओं को संजोकर रखने के वादे किए। आज तक किसी ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अमर शहीद श्रीदेव सुमन जैसे क्रान्तिकारी बहुत कम हुए, जिन्होंने एक ओर विदेशी शासन से भारत मां को मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष किया और दूसरी ओर सामन्तशाही व राजशाही के अत्याचारों से पीड़ित और शोषित प्रजा को सामन्तवाद से छुटकारा दिलाने के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया। समाज के अधिकारों की रक्षा और मानवता की अस्मिता बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिया।

अमर शहीद श्रीदेव सुमन जैसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व क्रान्तिकारी को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से कुछ शिक्षा ग्रहण करें और उन्हें अपने देष के अन्य स्वतंत्रता स्रंगाम सेनानियों एवं शहीदों में उचित स्थान दिलायें।

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