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धूप ने छीनी चोटियों की चमक, बर्फ पिघलने से हिमालय की सूरत बदली

27/11/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

हिमाली हावा सुरूरू,
बगन्या पानी तुरुरू
हिमाली हावा सुरूरू,
बगन्या पानी तुरुरू
तिमी हैमी नैसी जूँला
पंचाचूली देश गुरुरू,
पंचाचूली देश गुरुरू…
आसमानी तारा टिमटिम टिमटिम,
हिमाली डाणा सफेद,
हिमाल हमरी जनमभूमि,
मरण होलो परदेश…
काली गंगा कल कल,
गोरी गंगा छल
छूटी गयो घरबार,
आँसू ढलकी ढल
सुख दुख ज़िन्दगी को,
संग संग कांटूलो,
आधा तिमी, आधा हैमी,
हिटी जूँलो बाटो

पंचाचूली देश सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पलायन और पहाड़ी जीवन की एक मार्मिक गाथा है। यह गीत हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और प्रकृति से जुड़ाव को महसूस करने का संदेश देता पंचाचूली देश सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पलायन और पहाड़ी जीवन की एक मार्मिक गाथा है। यह गीत हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और प्रकृति से जुड़ाव को महसूस करने का संदेश देताइन दिनों उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सुबह-शाम जहां हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है, वहीं दिन में चटक धूप निकल रही है. इस धूप से हिमालयी चोटियों की बर्फ तेजी से पिघल रही हैं. पंचाचूली चोटी सहित हिमालय के कई हिस्सों में इन दिनों काले पर्वत दिखाई दे रहे हैं. पिछले सप्ताह तक पंचाचूली की चोटी बर्फ से ढकी थी. अब चोटी से कुछ नीचे बर्फ पिघल चुकी है, और इस वजह से सालभर बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहने वाली पिथौरागढ़ में स्थित हिमालय की 5 प्रमुख चोटियां अब काली पड़ने लगी हैं. इन दिनों उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सुबह-शाम जहां हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है, वहीं दिन में चटक धूप निकल रही है. इस धूप से हिमालयी चोटियों की बर्फ तेजी से पिघल रही हैं. पंचाचूली चोटी सहित हिमालय के कई हिस्सों में इन दिनों काले पर्वत दिखाई दे रहे हैं. पिछले सप्ताह तक पंचाचूली की चोटी बर्फ से ढकी थी. अब चोटी से कुछ नीचे बर्फ पिघल चुकी है, और इस वजह से सालभर बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहने वाली पिथौरागढ़ में स्थित हिमालय की 5 प्रमुख चोटियां अब काली पड़ने लगी हैं. ग्लोबल वार्मिंग का असर इतना बढ़ गया है कि समुद्र तल से 6,334 मीटर से लेकर 6,904 मीटर ऊंचाई पर स्थित हिमालयन रेंज में स्थित पंचाचूली की चोटियां बर्फ विहीन हो गई हैं. हिमपात नहीं होने और दिन में धूप की तपिश से बर्फ तेजी से पिघल रही है. पंचाचूली की मुख्य चोटी के कुछ ही हिस्से में ही बर्फ दिखाई दे रही है. चार अन्य चोटियों की बर्फ पिघल चुकी है. इसके अलावा नेपाल तक के हिमालयी क्षेत्र की चोटियां भी काली दिखाई दे रही हैं.  इससे पर्यावरण प्रेमी और पर्यटक निराश हैं. सफेद चमकती चोटियों का यह बदलाव केवल उत्तराखंड के पर्वतीय सौंदर्य का संकट नहीं, बल्कि एक गहरे जलवायु संकट की ओर संकेत करता है. पिछले कई वर्षों से हिमालय में मौसम चक्र परिवर्तन होने से समय पर हिमपात नहीं हो रहा है. अक्टूबर माह से जनवरी तक सफेद चादर में लिपटी रहने वाली इन चोटियों में हिमपात फरवरी अंतिम सप्ताह से लेकर अप्रैल तक हो रहा है. इसके चलते बर्फ जम नहीं पा रही है. पर्यावरण विदों ने बताया कि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसकी वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. उन्होंने कहा कि पहाड़ों पर पहले की तुलना में बर्फबारी और बारिश में कमी दर्ज की जा रही है. सर्दियों में बारिश कम होने से वातावरण में गर्मी बढ़ रही है और बर्फ को जमने का कम समय मिल रहा है. इसी कारण ग्लेशियरों के पिघलने की दर तेजी पकड़ रही है. पिछले दो-तीन दशकों में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में निर्माण कार्य बहुत बढ़े हैं. हिमालय तक सड़कों का पहुंचना, कार्बन उत्सर्जन बढ़ना और बुग्यालों को होने वाला नुकसान, ये सभी कारण बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं. वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी का सीधा असर यहां पड़ रहा है. धारचूला और मुनस्यारी के सैकड़ों परिवार हर साल माइग्रेशन पर अपने मूल गांवों में जाते हैं. अप्रैल में बर्फ पिघलने पर पशुओं के साथ उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जाते हैं. पहले यह परिवार वहां पर खेती करने के बाद अक्टूबर अंतिम सप्ताह तक लौट आते थे. पिछले कुछ सालों से बर्फबारी देरी से होने के कारण माइग्रेशन की अवधि भी बढ़ गई है. पूर्व डायरेक्टर-इंस्टीट्यूट ऑफ अर्थ एंड एनवायर्नमेंटल साइंसेज, डॉ. राममनोहर लोहिया अवध यूनिवर्सिटी, अयोध्या, और मेंबर-इंडियन साइंटिफिक एक्सपीडिशन टू अंटार्कटिका एंड आर्कटिक के तौर पर काम कर चुके पर्यावरण प्रदूषण और प्रबंधन वैज्ञानिक प्रोफेसर ने बताया कि, बर्फ विहीन पहाड़ों के काला दिखने के तीन कारण हो सकते हैं.  ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ पिघलने इसका कारण हो सकता है.  वायु प्रदूषण के वेस्ट पार्टिकल पहाड़ पर होने से वो का” ये पंक्तियाँ हिमालय को जन्मभूमि के रूप में याद करते हुए यह दुख व्यक्त करती हैं कि जीवन के अंतिम क्षण कहीं परदेश में बीतेंगे। यह पलायन की विवशता को दर्शाता है—या तो आजीविका की तलाश में, या फिर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मैदानों की ओर पलायन। कई बार गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए पहाड़ी लोग शहरों की ओर रुख करते हैं, लेकिन अक्सर यह यात्रा उनके जीवन के अंत का कारण बन जाती है। पंचाचूली देश सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पलायन और पहाड़ी जीवन की एक मार्मिक गाथा है। यह गीत हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और प्रकृति से जुड़ाव को महसूस करने का संदेश देताहै।दिख सकते हैं.  पूरी दुनिया में ग्लेशियर पिघल रहे हैं, इस कारण पहाड़ बर्फ विहीन यानी खाली हो रहे हैं. पहाड़ों पर लगी काई जो एक तरह की वनस्पति है उसके काले पड़ने से भी पहाड़ ऐसे दिख रहे होंगे. अंटार्कटिका में अभियान के दौरान उन्होंने देखा कि गर्मियों के दौरान बर्फ पिघलने के कारण वहां कुछ पर्वत शिखर चट्टानों की तरह काले हो जाते हैं. सर्दियों में यही पर्वत शृंखलाएं फिर से पूरी तरह बर्फ से ढक जाती हैं और फिर से सफेद दिखाई देती हैं. उन्होंने बताया कि, अंटार्कटिक पर्वत शिखरों को बर्फ के बगैर भी देखा है, क्योंकि क्लाइमेट चेंज के कारण सारी बर्फ पिघल गई है. दरअसल, क्लाइमेट चेंज की वजह से ग्लेशियर पिघलते हैं और बर्फ स्थायी रूप से हट जाती है. कभी-कभी छोटी वनस्पतियों के बिखरे हुए पैच के साथ बंजर चट्टानें देखी जा सकती हैं. इससे हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर पर नॉइस पॉल्यूशन का प्रभाव पड़ता है साथ ही प्रदूषण भी बेहद ज्यादा होता है. इतना ही नहीं इस क्षेत्र में घने जंगलों में रहने वाले वाइल्डलाइफ को भी इससे नुकसान होता है. हालांकि यह सभी स्थितियां सरकार की संज्ञान में भी है और लगातार पर्यावरण प्रेमी और वाइल्डलाइफ के जानकार भी इस बात को पूर्व में उठाते रहे हैं.लेकिन इसको लेकर कोई नियोजित यात्रा पर कभी कोई फैसला नहीं हो पाया. बर्फ का यह पिघलता भूगोल केवल आंकड़ों का कोलाज नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के अस्तित्व का एक विकट प्रश्नचिह्न है। हिमालय से ग्रीनलैंड तक और पंचाचूली से उत्तरी ध्रुव तक, बर्फ की यह कहानी हमारी लालसा, लापरवाही और अंधे विकास का गवाह है। समाधान जटिल नहीं है, परंतु हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति पर निर्भर है। वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कटौती, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा, और जलवायु अनुकूलन नीतियाँ इन संकटों से लड़ने के आधारस्तंभ हो सकते हैं।स्थानीय स्तर पर, जलवायु शिक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, और हिमालयी क्षेत्रों में सतत विकास की रणनीतियाँ अपनाई जानी चाहिए। लेकिन यह केवल योजनाओं का मामला नहीं; यह हमारी सोच, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी जिम्मेदारियों को पुनर्परिभाषित करने का समय है। सवाल यह नहीं कि हम क्या खो रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हम इसे बचाने के लिए तत्पर हैं? समय हमारे पास कम है, लेकिन अगर हम इस चेतावनी को सुनने से इनकार करते रहे, तो भविष्य केवल बर्फ से नहीं, हमारी उम्मीदों और आस्थाओं से भी विहीन होगा।बर्फ का यह पिघलता भूगोल केवल आंकड़ों का कोलाज नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के अस्तित्व का एक विकट प्रश्नचिह्न है। हिमालय से ग्रीनलैंड तक और पंचाचूली से उत्तरी ध्रुव तक, बर्फ की यह कहानी हमारी लालसा, लापरवाही और अंधे विकास का गवाह है। समाधान जटिल नहीं है, परंतु हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति पर निर्भर है। वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कटौती, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा, और जलवायु अनुकूलन नीतियाँ इन संकटों से लड़ने के आधारस्तंभ हो सकते हैं।स्थानीय स्तर पर, जलवायु शिक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, और हिमालयी क्षेत्रों में सतत विकास की रणनीतियाँ अपनाई जानी चाहिए। लेकिन यह केवल योजनाओं का मामला नहीं; यह हमारी सोच, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी जिम्मेदारियों को पुनर्परिभाषित करने का समय है। सवाल यह नहीं कि हम क्या खो रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हम इसे बचाने के लिए तत्पर हैं? समय हमारे पास कम है, लेकिन अगर हम इस चेतावनी को सुनने से इनकार करते रहे, तो भविष्य केवल बर्फ से नहीं, हमारी उम्मीदों और आस्थाओं से भी विहीन होगा।बर्फ का यह पिघलता भूगोल केवल आंकड़ों का कोलाज नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के अस्तित्व का एक विकट प्रश्नचिह्न है। हिमालय से ग्रीनलैंड तक और पंचाचूली से उत्तरी ध्रुव तक, बर्फ की यह कहानी हमारी लालसा, लापरवाही और अंधे विकास का गवाह है। समाधान जटिल नहीं है, परंतु हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति पर निर्भर है। वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में कटौती, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा, और जलवायु अनुकूलन नीतियाँ इन संकटों से लड़ने के आधारस्तंभ हो सकते हैं।स्थानीय स्तर पर, जलवायु शिक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, और हिमालयी क्षेत्रों में सतत विकास की रणनीतियाँ अपनाई जानी चाहिए। लेकिन यह केवल योजनाओं का मामला नहीं; यह हमारी सोच, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी जिम्मेदारियों को पुनर्परिभाषित करने का समय है। सवाल यह नहीं कि हम क्या खो रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हम इसे बचाने के लिए तत्पर हैं? समय हमारे पास कम है, लेकिन अगर हम इस चेतावनी को सुनने से इनकार करते रहे, तो भविष्य केवल बर्फ से नहीं, हमारी उम्मीदों और आस्थाओं से भी विहीन होगा। हिमालय का नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र हमें तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के पिघलने के लिए ज़िम्मेदार मानवीय गतिविधियों से निपटना होगा।”देश और दुनिया में लगातार हो रही क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग एक गंभीर समस्या बनती जा रही है *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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