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सुमित्रानंदन पंत एक युगांतकारी कवि

20/05/21
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड
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हरीश चन्द्र अन्डोला
महा कवि सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म वर्ष उन्नीस सौ में 20 मई को अल्मोड़ा जिले के कौसानी ग्राम में हुआ था। महा कवि सुमित्रानंदन पंत जी के जन्म से कुछ ही समय बाद इनकी माता जी का निधन हो गया। सुमित्रानंदन पंत जी के पिता का नाम गंगा दंत पंथ था और उनकी माता का नाम सरस्वती देवी था। संपूर्ण भारत वर्ष में अब तक ऐसे अनेक प्रकार के कवि हुए जिन्होंने हिंदी साहित्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, परंतु महा कवि सुमित्रानंदन पंत जी एक ऐसे कवि माने जाते हैं, जिनके बिना हिंदी साहित्य का विकास अधूरा माना जाता है। सुमित्रानंदन पंत जी हिंदी साहित्य के महान कवि थे। सुमित्रानंदन पंत जी ने हिंदी साहित्य के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

महान कवि सुमित्रानंदन पंत जी के जन्म स्थान कौसानी अत्यधिक खूबसूरत गांव था। वह एक ऐसा गांव है जहां पर प्रकृति सुंदर रंग विखरे पड़े हैं। 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा.साहित्य का अध्ययन करने लगे। उनका जन्म ही बर्फ से आच्छादित पर्वतों की अत्यंत आकर्षक घाटी में हुआ था, जिसका प्राकृतिक सौन्दर्य उनकी आत्मा में आत्मसात हो चुका था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा, गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या, ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही।

उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। साहित्यकार किसी भी देश या समाज का निर्माता होता है। वह समाज और देश को वैचारिक पृष्ठभूमि देता है, जिसके आधार पर नया दर्शन विकसित होता है। वह शब्द शिल्पी ही साहित्यकार कहलाने का गौरव प्राप्त करता है। जिसके शब्द मानवजाति के हृदय को स्पंदित करते रहते हैं। यह बात पंत के व्यक्तित्व एवं कृृतित्व पर अक्षरतः सत्य साबित होती है। दो और दो चार होते हैं, यह चिर सत्य है, पर साहित्य नहीं है। क्योंकि जो मनोवेग तरंगित नहीं करता, परिवर्तन एवं कुछ कर गुजरने की शक्ति नहीं देता, वह साहित्य नहीं हो सकता। अतः अभिव्यक्ति जहां आनंद का स्रोत बन जाए, वहीं वह साहित्य बनता है। इस दृष्टि से पंत का सृजन आनन्द के साथ जीवन को एक नयी दिशा देता है।

सुमित्रानंदन पंत की सृजन एवं साहित्य की यात्रा का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं रहा। वे देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं है, बल्कि उनसे भी आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है। उनकी कविताएं मानव.मन, आत्मा की आंतरिक आवाज, जीवन.मृत्यु के बीच संघर्ष, आध्यात्मिक पहलुओं की व्याख्या, नश्वर संसार में मानवता का बोलबाला जैसे अनादि सार्वभौम प्रश्नों से जुड़ी है। ऐसे भी महान कवि सुमित्रानंदन पंत जी को भी इस घनघोर प्रकृति का यथार्थ प्रेम मिला, जिसके कारण उन्होंने अपनी रचनाओं में अधिकतर झरने, बर्फ, पुष्प, उषा, किरण, लता, भ्रमण, गुंजन, शीतल पवन, तारों इत्यादि का उपयोग करके अपनी रचनाओं को अत्यधिक प्रभावशाली बनाया। सुमित्रानंदन पंत जी ने वर्ष 1938 में एक और मासिक पत्रिका का संपादन किया। इस पत्रिका का नाम रूपाभ था। सुमित्रानंदन पंत जी वर्ष 1955 से 1962 तक आकाशवाणी के साथ जुड़े रहे और उन्होंने इस चैनल पर मुख्य निर्माता का पद भी संभाला। सुमित्रानंदन पंत जी का पल्लव कविता सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ। सुमित्रानंदन पंत जी ने अनेकों प्रकार की पत्रिकाओं का संपादन किया और उन्होंने अपनी पत्रिकाओं में अनेकों प्रकार की कविताओं को भी लिखा। जिसके लिए उन्हें अनेकों प्रकार के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सुमित्रानंदन पंत जी को 1961 ईस्वी में पद्म विभूषण, 1968 ईस्वी में ज्ञानपीठ इसके अलावा सुमित्रानंदन पंत जी को साहित्य अकादमी तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार इत्यादि जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानित पुरस्कारों के साथ सम्मानित किया गया।

सुमित्रानंदन पंत जी इतने महान कवि थे कि जिस घर में सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म और उनका बचपन बीता था, उस घर को सुमित्रानंदन पंत जी की याद में सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय बनाया गया। इस संग्रहालय में सुमित्रानंदन पंत जी के व्यक्तित्व प्रयोग की वस्तुएं जैसे कि उनके उपयोग किए गए कपड़े, कविताओं के मूल पांडुलिपि, पुरस्कार, छायाचित्र, पत्र इत्यादि को रखा गया है। सुमित्रानंदन पंत जी के नाम पर एक पुस्तकालय भी है और यह पुस्तकालय इसी संग्रहालय में बनाया गया है। इन पुस्तकालयों में सुमित्रानंदन पंत जी के व्यक्तित्व तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है। इस संग्रहालय में सुमित्रानंदन पंत जी की स्मृति में प्रत्येक वर्ष एक दिवस मनाया जाता है, इसे पंत व्याख्यानमाला के नाम से जाना जाता है। इसी संग्रहालय से सुमित्रानंदन पंत जी की व्यक्तित्वता और कृतित्व के नाम पर एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई थी। इसी पुस्तक के अनुसार इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क को सुमित्रानंदन पंत उद्यान कर दिया गया। सुमित्रानंदन पंत जी पुणे साहित्यिक एवं सत्य शिव के आदर्शों से अत्यधिक प्रभावित हुए थे, इसी के साथ सुमित्रानंदन पंत जी का जीवन आचरण सदैव बदलता रहा। यहां से महा कवि सुमित्रानंदन पंत जी ने अपनी प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र को दर्शाया थाए वही इसके विपरीत उन्होंने दूसरे चरण में अपनी कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म सूक्ष्म परिकल्पना और बड़ी ही प्रभावशाली भावनाओं को दर्शाया था और उन्होंने अपने अंतिम चरण में समाज सुधार करने वाले प्रगतिवाद और विचार शीलता को भी दर्शाया था। सुमित्रानंदन पंत सच्चे साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी कवि थे, उनकी यह अलौकिकता है कि वे स्वयं को विस्मृत कर मस्तिष्क में बुने गये ताने.बाने को कागज पर अंकित कर देते थे। युगीन चेतना की जितनी गहरी एवं व्यापक अनुभूति उनमें थीए उतनी अन्यत्र कहीं भी दिखाई नहीं देती। उनका मानना है कि अनुभूति एवं संवेदना साहित्यकार की तीसरी आंख होती है। इसके अभाव में कोई भी व्यक्ति साहित्य.सृजन में प्रवृत्त नहीं हो सकता क्योंकि केवल कल्पना के बल पर की गयी रचना सत्य से दूर होने के कारण पाठक पर उतना प्रभाव नहीं डाल सकती।सुमित्रानंदन पंत भारत की एक अमूल्य थाती है, जब तक सूर्य का प्रकाश और मानव का अस्तित्व रहेगाए उनकी उपस्थिति का अहसास होता रहेगा।

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