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स्वामी विवेकानंद: युवाशक्ति के जागरण का अमर स्वर

12/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
हर वर्ष 12 जनवरी को भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस (नेशनल यूथ डे) महान् आध्यात्मिक गुरू, युवा वक्ता,मार्गदर्शक, विचारक और राष्ट्रनिर्माता स्वामी विवेकानंद की जयंती के रूप में मनाया जाता है।आपका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में हुआ था। आपके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था तथा आपके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था,जो एक प्रसिद्ध वकील थे तथा माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था,जो अत्यंत धार्मिक, विदुषी और संस्कारवान महिला थीं। आपकी माता ने आपका नाम ‘वीरेश्वर’ रखा था और आपको प्यार से वह ‘बिली’ कहकर पुकारती थीं।आपका जीवन संघर्षों से भरा था तथा अपने अपने 39 वर्ष के अल्प जीवन में लगभग 31 बीमारियों का सामना किया। जानकारी मिलती है कि आप चाय पीने के शौकीन थे।एक बार आपने स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक से विशेष रूप से ‘मुगलई चाय’ बनवाई थी। इतना ही नहीं, आपको खिचड़ी और तले हुए आलू (मसालेदार) भी बहुत पसंद थे। विवेकानंद बहुत ही मेधावी छात्र थे,जिनकी प्रारंभिक शिक्षा मेट्रोपोलिटन स्कूल से हुई थी।बाद में अपने प्रेसीडेंसी कॉलेज तथा जनरल असेंबलीज़ इंस्टीट्यूशन (वर्तमान स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में अध्ययन किया। आपने दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र, इतिहास, साहित्य, वेद, उपनिषद, तथा पाश्चात्य दर्शन का गहन अध्ययन किया। पाठकों को बताता चलूं कि अंग्रेज़ी के साथ-साथ संस्कृत और बंगला पर विवेकानंद जी की असाधारण पकड़ थी।आपका यह मानना था कि ‘शिक्षा वह है जो मनुष्य का निर्माण करे और उसके चरित्र को मजबूत बनाए।’ आपने एकबार कहा था -‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’ आपका यह कहना था कि-‘ शिक्षा मनुष्य के भीतर पहले से ही मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।’ आत्मविश्वास के बारे में आपका यह कहना था कि ‘यदि आप खुद पर विश्वास नहीं करते, तो आप भगवान पर भी विश्वास नहीं कर सकते।’ आपका यह मानना था कि ‘शक्ति ही जीवन है और कमजोरी मृत्यु है।’बहुत कम लोग जानते हैं कि आप नास्तिकता की सीमा तक प्रश्न करते थे। वे प्रत्येक साधु से एक ही प्रश्न पूछते थे कि-‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ इसी खोज ने उन्हें रामकृष्ण परमहंस तक पहुँचाया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सत्य की खोज में आपकी मुलाकात स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई। परमहंस जी के प्रभाव में आकर ही आपने आध्यात्मिक मार्ग अपनाया था और बाद में आप स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए। विश्व में भारतीय दर्शन विशेषकर वेदांत और योग को प्रसारित करने में विवेकानंद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, साथ ही ब्रिटिश भारत के दौरान राष्ट्रवाद को अध्यात्म से जोड़ने में इनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संन्यास लेने के बाद आपका नाम स्वामी विविदिशानंद था, लेकिन शिकागो जाने से ठीक पहले, खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह के सुझाव पर आपने अपना नाम बदलकर ‘विवेकानंद’ कर लिया था। कहते हैं कि एक बार अमेरिका में एक महिला आपके प्रवचनों से इतनी प्रभावित हुई कि उसने आपसे विवाह का प्रस्ताव रख दिया था। दरअसल उसने कहा था, ‘मैं आपके जैसा ही तेजस्वी पुत्र चाहती हूँ, इसलिए आप मुझसे विवाह कर लें।’उस समय आपने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया था कि, ‘देवी, मैं तो संन्यासी हूँ, विवाह नहीं कर सकता। लेकिन आपकी इच्छा पूरी हो सकती है। आज से आप मुझे ही अपना पुत्र मान लीजिए। इस तरह आपको मेरे जैसा पुत्र भी मिल जाएगा और मेरा संन्यास भी बना रहेगा।’ कहते हैं कि विवेकानंद जी का यह जवाब सुनकर महिला उनके चरणों में गिर गई थी। पाठकों को बताता चलूं कि प्रारंभ में आप रामकृष्ण परमहंस के विचारों से सहमत नहीं थे और तर्क और विवेक के आधार पर आप हर बात को परखते थे, लेकिन धीरे-धीरे रामकृष्ण परमहंस के अनुभवजन्य ज्ञान ने आपको भीतर से बदल दिया।अपने गुरु के देहांत के बाद, 1897 में आपने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ‘परहित’ और समाज सेवा के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति है। आप असाधारण स्मरण शक्ति के धनी थे तथा किसी पुस्तक को एक बार पढ़कर आप उसका सार याद रख लेते थे तथा कई बार तो आप पूरे पृष्ठ शब्दशः दोहरा देते थे। इतना ही नहीं,आप संगीत प्रेमी संन्यासी और युवा वक्ता थे। गौरतलब है कि 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में आप सबसे कम उम्र के प्रतिनिधि थे। आपके पहले शब्द-‘सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका’ ने पूरे सभागार को भावविभोर कर दिया था।उस समय वहां 7000 लोग मौजूद थे।शिकागो में आपने हिंदू धर्म को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति के धर्म के रूप में दुनिया के सामने रखा। आपने वर्ष 1894 में पहली ‘वेदांत सोसाइटी’ की स्थापना की तथा अपने पूरे यूरोप का व्यापक भ्रमण किया तथा मैक्स मूलर और पॉल डूसन जैसे प्रच्च्वादियों से संवाद किया।आपने भारत में अपने सुधारवादी अभियान के आरंभ से पहले निकोला टेस्ला जैसे प्रख्यात वैज्ञानिकों के साथ तर्क-वितर्क भी किये।एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार आपने जगदीश चंद्र बोस की वैज्ञानिक परियोजनाओं का भी समर्थन किया। इतना ही नहीं आपने आयरिश शिक्षिका मार्गरेट नोबल (जिन्हें उन्होंने ‘सिस्टर निवेदिता’ का नाम दिया) को भारत आमंत्रित किया, ताकि वे भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने में सहयोग कर सकें।आपने ही जमशेदजी टाटा को भारतीय विज्ञान संस्थान और ‘टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी’ की स्थापना के लिये प्रेरित किया था। विदेशों में आज भी उनके बहुत से प्रशंसक हैं तथा उनका यह मानना था कि भारत का उद्धार केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा से होगा। वास्तव में उनकी यही सोच आगे चलकर रामकृष्ण मिशन की नींव बनी।आपने युवाओं को आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण, राष्ट्रसेवा और आध्यात्मिक चेतना का संदेश दिया। पाठकों को बताता चलूं कि उनके विचारों से प्रेरित होकर भारत सरकार ने 1984 में 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित किया था। इस दिन देशभर में युवा कार्यक्रम, संगोष्ठियाँ, भाषण, योग एवं प्रेरणात्मक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं, ताकि युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जा सके।आपका विचार था कि-‘ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारी हैं। वह हमीं हैं जिन्होंने अपनी आंखों पर हाथ रख लिया है और रोते हैं कि अंधेरा है।’आपका यह मानना था कि जितना बड़ा संघर्ष होगा, जीत उतनी ही शानदार होगी।आप कहां करते थे कि-‘ यह दुनिया एक महान व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।’किसी देश के युवा जागरूक हों और अपने लक्ष्य के लिए पूरी निष्ठा से काम करें, तो वह देश हर बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। आप कहते थे कि युवाओं को सफल होने के लिए मेहनती, (आध्यात्मिक शक्ति) और शरीर की ताकत बढ़ाने के लिए भी रित करते हैं। अंत में यही कहूंगा कि स्वामी विवेकानंद के विचारों का निष्कर्ष यह है कि राष्ट्र का उत्थान तभी संभव है जब उसके युवा चरित्रवान, आत्मविश्वासी और कर्तव्यनिष्ठ हों। वे शिक्षा को केवल ज्ञान /र्जन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम मानते थे।आपने आध्यात्मिक शक्ति को जीवन की सबसे बड़ी ताकत बताया, जो मनुष्य को निर्भय और कर्मठ बनाती है।आपका यह मानना था कि कमजोर शरीर और कमजोर मन से कोई महान कार्य नहीं किया जा सकता। सेवा, त्याग और मानवता के कल्याण को उन्होंने सच्चे धर्म का आधार माना। आपके विचार आज भी युवाओं को जागृत होकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा देते हैं। उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा ऋषि मुनियों की तपोस्थली भी रही है. उन्हीं में से एक है युवाओं के प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद, जिनका अल्मोड़ा से विशेष लगाव रहा है. स्वामी जी को यह जगह इतनी पसंद आई कि वह एक नहीं बल्कि तीन बार यहां साल 1890, 1897 और 1898 में आए थे. अल्मोड़ा में स्वामी विवेकानंद से जुड़ी कई यादें आज भी यहां पर देखने को मिलती हैं, जिसको देखने के लिए लोग बड़े दूर-दूर से यहां पर पहुंचते हैं.स्वामी जी ने कहा था कि अल्मोड़ा एक पवित्र और शांत है, जो हिमालय के गोद में बसा हुआ है. इतना ही नहीं अल्मोड़ा में जब वह आए थे तब उन्हें काकड़ीघाट में पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान की अनुभूति हुई थी. स्वामी विवेकानंद का अल्मोड़ा से गहरा लगाव रहा है. अल्मोड़ा में उनकी यात्रा तीन बार रही और तीन बार उनसे जुड़ी कई चीज देखने को मिलती हैं. साल 1890 में जब वह पहली बार आए थे तो उन्हें काकडी घाट के पास एक पीपल के पेड़ के नीचे आत्मज्ञान की अनुभूति हुई थी. कोलंबो से आने के बाद स्वामी विवेकानंद का अल्मोड़ा में भव्य स्वागत भी किया गया. इसके बाद उन्होंने रघुनाथ मंदिर के पास आकर लोगों को संबोधित भी किया. स्वामी विवेकानंद से जुड़ी यादें जिसमें कसार देवी, स्याही देवी, कर्बला और रघुनाथ मंदिर स्वामी विवेकानंद का अल्मोड़ा से विशेष लगाव इसलिए लगा, क्योंकि अल्मोड़ा एक ऐसा स्थान था जहां पर ध्यान करके आपके मन शांत होता है और आप एक नई ऊर्जा लेकर यहां से जाते हैं. आज भी स्वामी जी के अनुयाई अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस, जापान, आस्ट्रेलिया सहित देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों से यहां पहुंचकर आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करते हैं। आश्रम स्थल से दिखने वाली हिमालय की लम्बी पर्वत श्रृखंलाएं व शांत वादियां बरबस ही लोगों को अपने ओर खींच लेती हैं। आश्रम में प्रतिवर्ष देश-विदेश के ख्याति प्राप्त चिकित्सकों को बुलाकर आश्रम के धर्मार्थ अस्पताल में चिकित्सा शिविर आयोजित कर हजारों मरीजों का निशुल्क उपचार करवाया जा रहा है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों व विभिन्न शिक्षण संस्थानों में शिविर आयोजित कर स्वामीजी के आदर्शो पर चलने की प्रेरणा दी जा रही है। स्वामी ने अपने भाषणों में कहा था- “यह हमारे पूर्वजों के स्वप्न का स्थान है। यह पवित्र स्थान है जहां भारत का प्रत्येक सच्चा धर्म पिपासु व्यक्ति अपने जीवन का अंतिम काल बिताने का इच्छुक रहता है। यह वही पवित्र भूमि है जहां निवास करने की कल्पना मैं अपने बाल्यकाल से ही कर रहा हूं।” उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि इन पहाड़ों के साथ हमारी श्रेष्ठतम स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। यदि धार्मिक भारत के इतिहास से हिमालय को निकाल दिया जाए तो उसका कुछ भी बचा नहीं रहेगा।1897 में दूसरी बार अल्मोड़ा के भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद ने करीब तीन माह तक यहां निवास किया। वह 1898 में तीसरी बार अल्मोड़ा आए। इस बार उनके साथ स्वामी तुरियानंद व स्वामी निरंजनानंद के अलावा कई शिष्य भी थे। इस बार उन्होंने सेवियर दंपती का आतिथ्य स्वीकार किया। इस दौरान करीब एक माह की अवधि तक स्वामी जी अल्मोड़ा में प्रवास पर रहे।स्वामी विवेकानंद के शिष्यों स्वामी तुरियानंद और स्वामी शिवानंद ने 1916 में अल्मोड़ा में ब्राइट एंड कार्नर पर आध्यात्मिक केंद्र की स्थापना कराई, जो आज रामकृष्ण कुटीर के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यहां से स्वामी विवेकानंद के विचारों का प्रचार-प्रसार किया जाता है। आपका यह मानना था कि कमजोर शरीर और कमजोर मन से कोई महान कार्य नहीं किया जा सकता। सेवा, त्याग और मानवता के कल्याण को उन्होंने सच्चे धर्म का आधार माना। आपके विचार आज भी युवाओं को जागृत होकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा देते हैं।बहुत कम लोग ही यह बात जानते होंगे कि आपने खुद यह भविष्यवाणी की थी कि आप 40 वर्ष की आयु पार नहीं करेंगे। उनकी यह बात सच साबित हुई और 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की उम्र में आपने बेलूर मठ (पश्चिम बंगाल) में महासमाधि ली। भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को वैश्विक पटल पर गौरवान्वित करने वाले युगपुरुष स्वामी विवेकानंद की जयंती, 12 जनवरी, देश के इतिहास में केवल एक तिथि नहीं बल्कि एक ऊर्जावान उत्सव है। जिसे हम राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं, वह वास्तव में उस महामानव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है जिसने सोए हुए भारत को उसकी अंतर्निहित शक्तियों से परिचित कराया। विवेकानंद ने जिस वेदांत दर्शन की व्याख्या की, वह हिमालय की गुफाओं तक सीमित रहने वाला शुष्क ज्ञान नहीं था, बल्कि वह एक ‘व्यावहारिक वेदांत’ था जो खेत-खलिहानों, कारखानों और युवाओं के अंतर्मन में क्रांति लाने का सामर्थ्य रखता था। उन्होंने शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में जब ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ कहकर संबोधन शुरू किया, तो वह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि अद्वैत वेदांत की वह अनुभूति थी जो पूरी सृष्टि को एक परिवार मानती है। उनके दर्शन का मूल आधार यह था कि प्रत्येक आत्मा दिव्य है और मनुष्य की कमजोरी केवल एक भ्रम है। उन्होंने निर्भीकता को धर्म का सार बताया और स्पष्ट किया कि जो विचार हमें शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाते हैं, उन्हें जहर समझकर त्याग देना चाहिए।स्वामी विवेकानंद ने युवाओं के लिए जो आदर्श स्थापित किए, उनमें सबसे महत्वपूर्ण था चरित्र निर्माण और आत्मविश्वास। वे अक्सर कहते थे कि जो व्यक्ति स्वयं पर विश्वास नहीं करता, वह ईश्वर पर भी विश्वास नहीं कर सकता। उन्होंने युवाओं को केवल किताबी ज्ञान का बोझ ढोने के बजाय एक ऐसा मनुष्य बनने की प्रेरणा दी जिसके पास ‘लोहे की मांसपेशियां और फौलाद की नसें’ हों। विवेकानंद का मानना था कि भारत का पुनरुत्थान तभी संभव है जब युवा वर्ग अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग कर ‘दरिद्र नारायण’ यानी समाज के वंचित और पीड़ित वर्ग की सेवा में लग जाए। उनके अनुसार, शिक्षा वही है जो मनुष्य को अपने पैरों पर खड़ा करे और उसमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव जगाए। उन्होंने युवाओं को लक्ष्य के प्रति एकाग्र होने का वह महान मंत्र दिया, जिसमें एक विचार को अपना जीवन बनाने और उसी को जीने की बात कही गई है। उनके शब्द ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए’ आज 2026 के आधुनिक भारत में भी उतने ही जीवंत हैं, जितने एक शताब्दी पूर्व थे।विवेकानंद का अध्यात्म पलायनवाद का मार्ग नहीं, बल्कि पुरुषार्थ का संदेश था। उन्होंने शरीर को आत्मा का मंदिर माना और शारीरिक सुदृढ़ता के लिए योग व व्यायाम को अनिवार्य बताया। उनका सुप्रसिद्ध आह्वान था कि “गीता पढ़ने के बजाय फुटबॉल खेलकर आप स्वर्ग के अधिक निकट होंगे”, जिसका अर्थ था कि जब तक शरीर बलिष्ठ और इंद्रियां वश में नहीं होंगी, तब तक गहन आध्यात्मिक सत्य को समझना असंभव है। उन्होंने राजयोग के माध्यम से मन के निग्रह और प्राणायाम व व्यायाम द्वारा प्राणशक्ति को संचित करने पर बल दिया, ताकि युवा कठिन पुरुषार्थ कर सकें। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक देश के करोड़ों लोग भूख और अज्ञानता के अंधकार में डूबे हैं, तब तक हर वह शिक्षित व्यक्ति जो उनके उत्थान का प्रयास नहीं करता, वह देशद्रोही है। उन्होंने युवाओं के भीतर उस ‘अमृत तत्व’ को जगाने का प्रयास किया जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हुए राष्ट्र सेवा का संकल्प ले सके। स्वामी जी का मानना था कि आने वाले समय में भारत का गौरव उसके हथियारों से नहीं, बल्कि उसके युवाओं के नैतिक साहस और आध्यात्मिक ज्ञान से तय होगा।आज के इस डिजिटल और प्रतिस्पर्धात्मक युग में, जहाँ युवा अक्सर एकाकीपन और मानसिक अवसाद का शिकार हो रहे हैं, विवेकानंद के विचार एक प्रकाश स्तंभ की तरह कार्य करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि बाहरी दुनिया को जीतने से पहले अपनी आंतरिक शक्तियों पर विजय प्राप्त करना आवश्यक है। उनका दर्शन समाजवाद और आध्यात्मिकता का एक अनूठा संगम है, जो युवाओं को वैश्विक नागरिक बनने के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई तक जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।स्वामी जी ने धर्म को कर्मकांडों की संकीर्णता से मुक्त कर उसे मानवतावाद की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनके लिए देशभक्ति केवल एक भावना नहीं, बल्कि जन-जन के प्रति गहरी संवेदना और उनके उत्थान का ठोस कार्य थी। वे चाहते थे कि भारत का युवा वर्ग विज्ञान की आधुनिकता और वेदांत की गहराई का सुंदर मेल बने। आज 2026 में, जब दुनिया तकनीकी क्रांतियों के दौर से गुजर रही है, तब विवेकानंद की शिक्षाएं हमें याद दिलाती हैं कि बिना नैतिकता और आध्यात्मिकता के तकनीक विनाशकारी हो सकती है। वास्तव में, स्वामी विवेकानंद के आदर्शों को अपनाना किसी पुरानी परंपरा को दोहराना नहीं है, बल्कि एक आधुनिक और सशक्त भारत की नींव को मजबूत करना है। विवेकानंद की जयंती पर उनके विचारों का मनन करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है और विकसित भारत एवं मानवता के संकल्प की सिद्धि का एकमात्र मार्ग भी है। भारतीय संस्कृति से विश्व को परिचित कराने वाले, युगांतरकारी आध्यात्मिक गुरु, युवाओं के प्रेरणास्रोत, स्वामी विवेकानन्द जी की जन्म जयंती पर उन्हें कोटिशः नमन! सभी को राष्ट्रीययुवा_दिवस की हार्दिक शुभकामनायें! लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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