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स्वरकोकिला लता मंगेशकर 92 साल की हुई

28/09/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला”

लता मंगेशकर 28 सितम्बर 2021 को 92 वर्ष हो रही है। गायन के क्षेत्र में अब वे एक मिथक बन चुकी हैं। उनकी आवाज दुनिया के किसी हिस्से के भूगोल में कैद न होकर ब्रह्माण्डव्यापी बन चुकी हैं। उन्हें संगीत की दुनिया में सरस्वती का अवतार माना जाता है। हम कह सकते हैं कि हमारे पास एक चांद है, एक सूरज है तो एक लता मंगेशकर भी है।

सचमुच अद्भुत, अकल्पित, आश्चर्यकारी है उनका रचना, स्वर एवं संगीत संसार। इसे चमत्कार नहीं माना जा सकता, इसे आवाज का कोई जादू भी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि यह हूनर, शोहरत एवं प्रसिद्धि एक लगातार संघर्ष एवं साधना की निष्पत्ति है। एक लंबी यात्रा है संघर्ष से सफलता की, नन्हीं लता से भारतरत्न स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर बनने तक की। संगीत की उच्चतम परंपराओं, संस्कारों एवं मूल्यों से प्रतिबद्ध एक महान व्यक्तित्व हैअपनी आवाज से लाखों दिलों पर राज कर चुकी लता मंगेशकर को सन 2001 में देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया गया था। लता मंगेशकर ऐसी जीवित हस्ती हैं जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। 

लता मंगेशकर के लिए गाना पूजा के समान है इसलिए रिकॉर्डिंग के समय वो हमेशा नंगे पैर ही गाती हैं। अपनी आवाज से लाखों दिलों पर राज करने वालीं लता मंगेशकर का आज जन्मदिन है। लता मंगेशकर 28 सितंबर 1929 को इंदौर में मशहूर संगीतकार दीनानाथ मंगेशकर के यहां पैदा हुई थीं।

लता जी ने अपनी आवाज से बहुत छोटी उम्र में ही गायन में महारत हासिल की और विभिन्न भाषाओं में गीत गाए। स्वर-साम्राज्ञी, स्वरकोकिला, नाइटिंगेल ऑफ इंडिया और संगीत की देवी के रूप में प्रसिद्ध लता मंगेशकर की आवाज का पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं। उन्होंने एक प्यार का नगमा, लग जा गले, तूने ओ रंगाीले जैसे कई बेहतरीन गाने गाकर लोगों को अपना कायल किया है।देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत लता मंगेशकर की आवाज में भारत का दिल धड़कता है। विदाई गीत हो या ममता भरी लोरी, मंगल वेला हो या मातमी खामोशी, उन्होंने हर भावना को अपने सुरों में ढालकर लोगों के मन की गहराइयों को छुआ है। उनकी आवाज में माँ की ममता, नवयौवना की चंचलता, प्रेम की मादकता, विरह की टीस, बाल-सुलभ निश्छलता, भक्त की पुकार और स्त्री के तमाम रूपों के दर्शन होते हैं।

जीते जी किंवदंती बन चुकी लता मंगेशकर ने 36 भाषाओं में 30,000 से अधिक गीत गाए हैं। उनका यह जलवा मधुबाला, नर्गिस से लेकर जीनत अमान, काजोल और माधुरी दीक्षित तक बरकरार रहा। उन्होंने शास्त्रीय, सुगम, भजन, गजल, पॉप— सभी प्रकार के गायन में अपने सुरों का लोहा मनवाया। उनकी आवाज की यह खूबी है कि वे सुरों के तीनों सप्तकों—मंद्र, मध्य और तार में बड़ी सहजता से गा लेती हैं। उनकी लोकप्रियता देश की सीमा लाँघ विदेश तक भी जा पहुँची है। इसका कारण यह है कि वे जो भी गाती हैं, दिल से गाती हैं। हर गीत में वे ऐसी आत्मा भर देती हैं, जो सीधे दिल में उतर जाता है।

एक वाक्य में कहें तो—भारत के लिए ईश्वर का वरदान हैं लता मंगेशकर। इस पुस्तक में स्वरकोकिला लता मंगेशकर की संगीतमय जीवन-यात्रा का वर्णन है, जिसमें अथक संघर्ष है और सफलता के शिखर तक पहुँचने की कहानी भी। रोचक शैली में लिखी गई यह जीवन-गाथा पठनीय तो है ही, प्रेरणा देनेवाली भी है। उत्तराखंड बेहतरीन वादियों से भरा है। इस गाने को गाकर लता मंगेशकर ने साबित कर दिया था कि उत्तराखंड की भूमि को लेकर उनके दिल में कितना प्यार है। इससे पहले लता एक इंटरव्यू में बता चुकी हैं कि उन्हें देवभूमनि से कितना प्यार है। यहां तक कि लता ने कहा था कि उनका मन है कि वो भी देवभूमि में घर बसाकर रहें। ये गाना बेहद पुराना है और इसे लता मंगेशकर ने अपने सुरों से सजाया है। साफ पता चलता है कि लता को भी उत्तराखंड की वादियों से बेहद प्यार है।

बॉलिवुड हंगामा’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक लता मंगेशकर कोरोना वायरस के कारण इस साल भी बर्थडे सेलिब्रेट नहीं करेंगी। उन्होंने कहा, ‘कोरोना महामारी को एक साल से ज्यादा हो गया है। कोरोना वायरस आने के बाद यह मेरा दूसरा जन्मदिन है। ऐसे सबसे बड़ा गिफ्ट यही है कि मेरे परिवार के लोग मेरे साथ हैं। ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने एक साल से ज्यादा समय से अपने पैरंट्स और बच्चों की शक्ल नहीं देखी हैं 1962 में भारत चीन से हार चुका था. हम सभी हतोत्साहित थे. इसी युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को याद करने के लिए 26 जनवरी 1963 को नेशनल स्टेडियम में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था.

कवि प्रदीप का लिखा गीत ‘ए मेरे वतन के लोगों’ को जब सी रामचन्द्र ने संगीत और लता ने अपनी आवाज से देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के समक्ष प्रस्तुत किया तो पंडित नेहरू समेत वहां उपस्थित जनों की आंखों में आंसू आ गए. इस गीत का हर एक शब्द जैसे भारत का भविष्य तय करता दिखता है. हमें जंग से मिली हार को भूल नए पथ पर चलने की ओर अग्रसर करता है.आप देखेंगे कि इस गीत को कई बड़े से बड़े गीतकारों और संगीतकारों ने गया और संगीत दिया लेकिन आज भी इस गीत को लता की आवाज में ही सर्वाधिक पसंद किया जाता है.

लता के सुरों में वह ताकत है जो आज भी आंख में पानी ला सकती है.  सन 1974 में दुनिया में सबसे अधिक गीत गाने का ‘गिनीज बुक रिकॉर्ड’ उनके नाम पर दर्ज है। उनकी जादुई आवाज के दीवाने भारतीय उपमहाद्वीप के साथ-साथ पूरी दुनिया में हैं। टाईम पत्रिका ने उन्हें भारतीय पाश्र्वगायन की अपरिहार्य और एकछत्र साम्राज्ञी स्वीकार किया है। वे फिल्म इंडस्ट्री की पहली महिला हैं जिन्हें भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ।

वर्ष 1974 में लंदन के सुप्रसिद्ध रॉयल अल्बर्ट हॉल में उन्हें पहली भारतीय गायिका के रूप में गाने का अवसर प्राप्त है। उनकी आवाज की दीवानी पूरी दुनिया है। उनकी आवाज को लेकर अमेरिका के वैज्ञानिकों ने भी कह दिया कि इतनी सुरीली आवाज न कभी थी और न कभी होगी। भारत की ‘स्वर कोकिला’ लता मंगेशकर की आवाज सुनकर कभी किसी की आंखों में आंसू आए, तो कभी सीमा पर खड़े जवानों को हौंसला मिला। वे न केवल भारत बल्कि दुनिया के संगीत का गौरव एवं पहचान है।आप दीर्घायु हों. इसी उम्मीद के साथ हम अपनी बात को विराम देंगे कि ऐसे ही हमारे जीवन में गीत और संगीत की लत लगी रहे. भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी विनम्रता और जुनून के लिए उनका सम्मान किया जाता है. लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत  हैं।

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