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धधकती धरतीः विकास की दौड़ या विनाश की ओर

22/04/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी तथा मौसम का निरन्तर बिगड़ता मिजाज गंभीर चिंता का सबब बना है। हालांकि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विगत वर्षों में दुनियाभर में दोहा, कोपेनहेगन, कानकुन इत्यादि बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन होते रहे हैं किन्तु उसके बावजूद इस दिशा में अभी तक ठोस कदम उठते नहीं देखे गए हैं। दरअसल वास्तविकता यही है कि राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रकृति के बिगड़ते मिजाज को लेकर चर्चाएं और चिंताएं तो बहुत होती हैं, तरह-तरह के संकल्प भी दोहराये जाते हैं किन्तु सुख-संसाधनों की अंधी चाहत, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि, अनियंत्रित औद्योगिक विकास और रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करने के दबाव के चलते इस तरह की चर्चाएं और चिंताएं अर्थहीन होकर रह जाती हैं।  ऐसे में पर्यावरण संरक्षण को लेकर लोगों में जागरूकता पैदान करने तथा पृथ्वी को बचाने के लिए प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ मनाया जाता है।धरती का तापमान बढ़ते जाने का ही दुष्परिणाम है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ने के कारण दुनिया के कई शहरों के जलमग्न होने की आशंका जताई जाने लगी है। बहरहाल, अगर प्रकृति से खिलवाड़ कर पर्यावरण को क्षति पहुंचाकर हम स्वयं इन समस्याओं का कारण बने हैं और हम वाकई गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं को लेकर चिंतित हैं तो इन समस्याओं का निवारण भी हमें ही करना होगा ताकि हम प्रकृपि के प्रकोप का भाजन होने से बच सकें अन्यथा प्रकृति से जिस बड़े पैमाने पर खिलवाड़ हो रहा है, उसका खामियाजा समस्त मानव जाति को अपने विनाश से चुकाना पड़ेगा। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें चेतावनी भी देती रही है किन्तु जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे हम शायद कुछ करना ही नहीं चाहते। ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के अनुसार हम यह समझना ही नहीं चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम जो कंक्रीट के जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं बल्कि विकास के नाम पर हम अपने विनाश का ही मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। पहाड़ों में बढ़ती गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब हर वर्ष बढ़ता जा रहा है। धरती का तापमान यदि इसी प्रकार साल दर साल बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में हमें इसके बेहद गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहना होगा क्योंकि हमें यह बखूबी समझ लेना होगा कि जो प्रकृति हमें उपहार स्वरूप शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, शुद्ध मिट्टी तथा ढ़ेरों जनोपयोगी चीजें दे रही है, अगर मानवीय क्रियाकलापों द्वारा पैदा किए जा रहे पर्यावरण संकट के चलते प्रकृति कुपित होती है तो उसे सब कुछ नष्ट कर डालने में पल भर की भी देर नहीं लगेगी। करीब दो दशक पहले देश के कई राज्यों में जहां अप्रैल माह में अधिकतम तापमान औसतन 32-33 डिग्री रहता था, अब वह 40 के पार रहने लगा है। मौसम विभाग का तो अनुमान है कि अगले तीन दशकों में इन राज्यों में तापमान में वृद्धि 5 डिग्री तक दर्ज की जा सकती है पृथ्वी दिवस मनाने का मकसद पर्यावरण संरक्षण की तरफ सभी का ध्यान खींचना और यह कोशिश करना है कि सभी पृथ्वी को खुशहाल बनाए रखने में योगदान दें. यह हर पीढ़ी की जिम्मेदारी बनती है कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ और खुशहाल पृथ्वी बनाए रखे. प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देना, पर्यावरण को सुरक्षित रखना, पर्यावरण संरक्षण में आने वाली चुनौतियों से लड़ना, लोगों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के तरीके बताना, जनसंख्या वृद्धि पर नजर रखना, वनों की कटाई को रोकना, प्रदूषण कम करने की तरफ कदम बढ़ाना और पृथ्वी के हित में कार्य करने के लिए सभी को जागरूक करना ही इस दिन को मनाने का मकदस है. जानिए इस साल पृथ्वी दिवस की क्या थीम है, इस दिन का क्या इतिहास है और पर्यावरण संरक्षण की तरफ हम सभी अपने-अपने स्तर पर किस तरह योगदान दे सकते हैं. हर साल पृथ्वी दिवस मनाने के लिए थीम चुनी जाती है। इस साल पृथ्वी दिवस की थीम- आवर पावर, आवर अर्थ’ (है। इस थीम को मनाने का मकसद लोगों, संगठनों और देशों की सरकार को क्षय होने वाले ऊर्जा स्त्रोतों को दोबारा इस्तेमाल किए जाने वाले स्त्रोतों में बदलना और एक टिकाउ भविष्य की नींव रखने के लिए प्रेरित करना है। 2030 तक दुनियाभर में उत्पादित अक्षय ऊर्जा की मात्रा को तीन गुना करना इस थीम का लक्ष्य है जिससे जलविद्युत, ज्वारीय, पवन और सौर ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों पर विशेष ध्यान दिया जायेगा। 2025 की ये तकनीकें इस बात का सबूत हैं कि नवाचार और पर्यावरण संरक्षण एक साथ चल सकते हैं। इन समाधानों से एक हरित, स्वच्छ और टिकाऊ भविष्य की नींव रखी जा रही है — जहां प्रगति का मतलब सिर्फ विकास नहीं, बल्कि धरती की सुरक्षा भी है। जैसे ही भोर की किरणें यमुना के मैदानों और राजस्थान के रेगिस्तान में बिखरती हैं, भारत पृथ्वी दिवस 2025 की थीम “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” को अपनाते हुए हरित ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई उम्मीद के साथ जागता है। यह दिन न केवल पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक है, बल्कि यह उस समय भी आता है जब जलवायु परिवर्तन पर आईपीसीसी की चेतावनी रिपोर्ट ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया है। रिपोर्ट बताती है कि सार्थक जलवायु कार्रवाई की खिड़की तेजी से बंद हो रही है, लेकिन भारत इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए अक्षय ऊर्जा में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा है। हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” थीम के साथ मनाया जाएगा। यह थीम रिन्यूबल एनर्जी की ओर ग्लोबल बदलाव लाने और क्लाइमेट चेंज से मुकाबला करने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देती है। इस वर्ष का मुख्य लक्ष्य 2030 तक वैश्विक स्तर पर स्वच्छ बिजली उत्पादन को तीन गुना करना है। इस थीम के अंतर्गत न केवल रिन्यूबल एनर्जी और पर्यावरण के लिए बेस्ट ऑप्शन है, बल्कि यह एक ह्यूमन रिवॉल्यूशन भी ला सकती है, जिससे सभी के लिए कम लागत वाली और लगभग असीमित ऊर्जा का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। रिन्यूबल एनर्जी में इन्वेस्ट करने से वायु प्रदूषण कम होगा, गंभीर बीमारियों का खतरा घटेगा और अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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