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दुनिया के चिंतन में शामिल हो हिमालय की चिंता

जी 20 के मद्देनजर पांच संस्थाओं के विशेषज्ञों ने किया सतत विकास पर विमर्श

17/04/23
in उत्तराखंड, पौड़ी गढ़वाल
Reading Time: 1min read
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श्रीनगर। ऐसे वक्त में जब दुनिया के शीर्ष नेता भारत के नेतृत्व में एक खुशहाल विश्व परिवार की बात कर रहे हैं, विश्व पर्यावरण के लिये अहम हिमालय के सरोकारों को समझा जाना जरूरी है। हाल के वर्षों में हिमालय में हुई घटनाएं एक ही बात बता रही हैं कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट ही सुरक्षित रास्ता है। यानी आज के विकास कार्यों में आने वाले कल की चिंता भी शामिल हो।
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्व विद्यालय की पहल पर हिमालयी क्षेत्र के 13 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के संगठन समेत पांच संस्थाओं के विषय विशेषज्ञों के सामूहिक विमर्श में सोमवार को यही निष्कर्ष उभरा। इस विमर्श की सिफारिशें जी 20 की सदारत कर रही भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों को भेजी जा रही हैं ताकि भारत इस सरोकार को दुनिया के समक्ष रख सके।
विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में हुए इस आयोजन में जी बी पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान, रिसर्च एंड इनफार्मेशन सिस्टम फ़ॉर डेवलपिंग कन्ट्रीज (आरआईएस), कलिंगा इस्टीटूट फ़ॉर इंडो पैसिफिक स्टडीज, इंडियन हिमालयन यूनिवर्सिटीज कंसोर्टियम और गढ़वाल विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ विद्वानों हिमालय से जुड़े विविध विषयों पर पूरे दिन मंथन किया।
अपने प्रारंभिक भाषण में कुलपति प्रो अन्नपूर्णा नौटियाल ने कहा कि हमें हिमालय के लिये आवाज उठानी होगी। चीन हिमालय क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है यह हमारे देश के साथ हिमालय की सुरक्षा का मामला है। मसले के राजनीतिक हल के अलावा उन्होंने सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना के साथ हिमालयी संसाधनों के संतुलित दोहन की बात रखी। उन्होंने कहा कि ग्रीन इनर्जी के साथ विकास एक हल है। इस मामले में चीन की बराबरी करनी होगी और हमें अपनी कुछ जरूरतों भी पर रोक लगानी है।
राजनीतिक विमर्श की शुरुआत करते हुए प्रो शेषाद्रि रामानुजम चारि ने कहा हमारे प्रधानमंत्री ने जी 20 को सरकारों के संवाद की जगह सदस्य देशों के लोगों के बीच संवाद का मंच बनाने की बात कही है। अयं निज परोवेति के तहत अमेरिका के बैंकों का संकट विश्व संकट कहा जाता है और 2008 -09 में कई देशों के संकट को एशिया का संकट कहा जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के तहत ये समझा जाना चाहिए कि एक हिमालयी ग्लेशियर का पिघलना विश्व के एक बड़े भूभाग को प्रभवित करने वाली घटना है। जीडीपी का अर्थ ग्रोथ, डेवलपमेंट और पर्मानेंस के रूप में समझा जाना चाहिए।हमें पर्यावरण की कीमत पर विकास नहीं चाहिए। सतत विकास के मानक कुछ देश तय कर रहे हैं। इसके लिए भारत क्षेत्रीय हितों वाले मूल्यों की भी बात चाहता है। परिवर्तनशील संसार में अपरिवर्तनीय विकास खुशी पैदा करने वाला होना चाहिए। दुनिया को तीसरी सबसे बडी अर्थव्यस्था भारत की भावनाओं का सम्मान करना चाहिये। विकासशील देशों पर दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए। ग्लोबल प्रॉब्लम लोकल सोलुशन वाली सोच चाहिए। कलिंगा यूनिवर्सिटी के चेयरमैन चिंतामणि महापात्र ने कहा भारत के पास नेतृत्व का मौका ऐसे समय में आया दुनिया में कोल्ड और हॉट वॉर दोनों चल रहा है। भारत ने निर्गुट आंदोलन को नेतृत्व दिया है और वह विभाजक देशों के बीच पुल बनने में सक्षम है। पहली बार भारत ने सतत विकास का मुद्दा ठीक से उठा कर ऐसा किया है।
जेएनयू में यूएन स्टडीज के प्रो ए कुमार ने कहा जी 20 में जो उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं है उनके समक्ष विकास के साथ ही ऊर्जा की उपलब्धता एक बड़ा मसला है। अमेरिका के पास तकनीक है लेकिन मसला उसे बाकी दुनिया के साथ साझा करने का है। सतत विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए फॉसिल फ्यूल की खपत कम कर ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने की जरूरत है
प्रोफेसर सुनील नौटियाल हिमालय के सतत विकास हेतु कार्यप्रणाली एवं नीति विषय पर अपना संबोधन देते हुए वसुदेव कुटुंबकम के संदेश के साथ साथ भारतीय हिमालय क्षेत्रों के लिए महत्व एवं संपूर्ण विश्व के लिए आजीविका एवं जलवायु हेतु विशिष्टता पर जोर दिया।
इनके अलावा डॉ आर के मैखुरी, डॉ प्रकाश नौटियाल, डॉ प्रशांत कंडारी, डॉ जे सी कुनियाल, डॉ वाई पी सुंदरियाल, प्रो डी आर पुरोहित,डॉ नागेंद्र रावत आदि विद्वान इस विमर्श में शरीक होंगे।
कार्यक्रम का संचालन प्रो आर सी सुंदरियाल ने अतिथिओं का स्वागत प्रति कुलपति प्रो आर सी भटट ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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