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तिमूर दांत ही नहीं रक्तचाप में भी रामबाण है

02/09/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में बहुतायत से पाया जाने वाला तिमूर वास्तव में बहुपयोगी है। अलग-अलग
जगहों पर इसके नाम के साथ थोड़ा फेरबदल जरूर है मगर है यह बहुत काम की चीज। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से
देखें तो यह रूटेसी परिवार से है, इसका वैज्ञानिक नाम जेंथेजाइलम अरमेटम हैं। कुमाऊं में इसे तिमुर, गढ़वाल
में टिमरू, संस्कृत में तुम्वरु, तेजोवटी, जापानी में किनोमे, नेपाली में टिमूर यूनानी में कबाबए खंडा, हिंदी में
तेजबल, नेपाली धनिया आदि नामों से जाना जाता है।तिमूर समुद्र तल से तकरीबन 8.10 मीटर ऊंचाई पर
पाया जाता है। इसके पेड़ का प्रत्येक हिस्सा औषधीय गुणों से युक्त है। तना, लकड़ी, छाल, फूल, पत्ती से लेकर
बीज तक हर चीज औषधी के काम में लायी जाती है।उत्तराखंड के पहाड़ में कांटेदार टिमरू अधिकतर जगहों पर
पाया जाने वाला पेड़ है। यह दवाईयों के साथ कई अन्य मामलों में भी इसका इस्तेमाल होता है। बदरीनाथ तथा
केदारनाथ में इसकी टहनी को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। उत्तराखंड के सभी जिलों में टिमरू अधिकांश
मात्रा में पाया जाता है। इसकी प्रमुख रूप से पांच प्रजातियां उत्तराखंड में पाई जाती हैंए जिसका वानस्पतिक
नाम जैन्थोजायलम एलेटम है।दांतों के लिए यह काफी फायदेमंद है इसका प्रयोग दंत मंजन, दंत लोशन व बुखार
की दवा के रूप में काम में लाया जाता है। इसका फल पेट के कीड़े मारने व हेयर लोशन के काम में भी लाया
जाता है। कई दवाइयों में इसके पेड़ का प्रयोग किया जाता है। इसके मुलायम टहनियों को दातुन की तरह
इस्तेमाल करने से चमक आती है।यह मसूड़ों की बीमारी के लिए भी रामबाण का काम करता है। उत्तराखंड के
गांव में आज भी कई लोग इसकी टहनियों से ही दंतमंजन करते हैं। टिमरू औषधीय गुणों से युक्त तो है ही, साथ
ही इसका धार्मिक व घरेलू महत्व भी है। हिन्दुओं प्रसिद्ध धाम बदरीनाथ तथा केदारनाथ में प्रसाद के तौर पर
चढ़ाया जाता है। यही नहीं गांव में लोंगो की बुरी नजर से बचने के लिए इसके तने को काटकर अपने घरों में भी
रखते हैं। गांव में लोग इसके पत्ते को गेहूं के बर्तन में डालते हैं, क्योंकि इससे गेहूं में कीट नहीं लगते।इसके बीज मुंह
को तरोताजा रखने के अलावा पेट की बीमारियों के लिए भी फायदेमंद हैं। इसकी लकड़ी हाई ब्लड प्रेशर में बहुत
कारगर है, इसकी कांटेदार लकड़ी को साफ करके हथेली में रखकर दबाया जाए तो ब्लड प्रेशर कम हो जाता है।
तिमूर के बीज अपने बेहतरीन स्वाद और खुशबू की वजह से मसाले के तौर पर भी इस्तेमाल किये जाते हैं। हमारे
यहां तिमूर से सिर्फ चटनी बनायी जाती है लेकिन यह चाइनीज, थाई और कोरियन व्यंजन में बहुत ज्यादा
इस्तेमाल किया जाने वाला मसाला है।शेजवान पेप्पर चाइनीज पेप्पर के नाम से जाना जाने वाला यह मसाला
चीन के शेजवान प्रान्त की विश्वविख्यात शेजवान डिशेज का जरूरी मसाला है। मिर्च की लाल काली प्रजातियों
से अलग इसका स्वाद अलग ही स्वाद और गंध लिए होता है। इसका ख़ास तरह का खट्टा मिंट फ्लेवर जुबान को
हलकी झनझनाहट के साथ अलग ही जायका देता है। चीन के अलावा, थाईलेंड, नेपाल, भूटान और तिब्बत में
भी तिमूर का इस्तेमाल मसाले और दवा के रूप में किया जाता है।इन देशों में कई व्यंजनों को शेजवान सॉस के
साथ परोसा भी जाता है। तिमूर की लकड़ी का अध्यात्मिक महत्त्व भी है। इसकी लकड़ी को शुभ माना जाता है।
जनेऊ के बाद बटुक जब भिक्षा मांगने जाता है तो उसके हाथ में तिमूर का डंडा दिया जाता है। तिमूर की लकड़ी
को मंदिरों, देव थानों और धामों में प्रसाद के रूप में भी चढ़ाया जाता है। गुटखा छोड़ने की बात तो सब करते हैं
लेकिन लत की वजह से इसे छोड़ नहीं पाते हैं। ऐसे लोगों के लिए औषधीय प्रजाति के तिमूर को तंबाकू, गुटखा
के विकल्प के रूप में पेश किया गया है। इसके सेवन से स्वाद तो वही मिलेगा और सेहत को नुकसान के बजाय
फायदा होगा। पाटी विकासखंड के प्रगतिशील किसान के इस विकल्प को गुटखा और तंबाकू का सेवन करने
वाले हाथों हाथ ले रहे हैं।तिमूर कटीली झाडिय़ों वाली ऐसी वनस्पति है जिसमें काली मिर्च के आकार का फल

पैदा होता है। आमतौर पर नवंबर- दिसंबर तक तिमूर के फल परिपक्व हो जाते हैं। तिमूर की लकड़ी दातुन के
लिए बहुत उपयोगी होती है तथा इसकी पत्तियां अनाज के भंडारण में कीटनाशक के रूप में काम आती हैं।
तिमूर के बीज का उपयोग नहीं किया जाता है। यह गुटखे की लत को छुड़ाने का सशक्त माध्यम भी है। अंत में,
तिमुर मसाला अपनी पाक भूमिका से आगे बढ़कर इतिहास, संस्कृति और स्वास्थ्य को समाहित करने वाला एक
बहुआयामी रत्न बन गया है। जैसे-जैसे हम मसालों की दुनिया का पता लगाना जारी रखते हैं, तिमुर एक
अद्वितीय और मनोरम घटक के रूप में सामने आता है जो हर व्यंजन में गहराई और विशेषता जोड़ता है। चाहे
पारंपरिक व्यंजनों में उपयोग किया जाए या नवीन संलयन रचनाओं में, यह मसाला हमें एक स्वादिष्ट यात्रा पर
आमंत्रित करता है जो कि रसोई की सीमाओं से परे तक फैली हुई है। तिमूर की पत्तियों में एक विशेष प्रकार का
तेल पाया जाता है। इस तेल का प्रयोग तमाम तरह की औषधियों के निर्माण में किया जाएगा। इससे दवाएं, टूथ
पेस्ट, टूथ पाउडर, बायोमास्किटो क्वायल भी बनाया जाता है। इसका तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में दो से दस
हजार रुपये प्रति लीटर है। ग्रामीण क्षेत्रों में तिमूर का प्रयोग दातून के रूप में भी किया जाता है। यह दांतों में
लगने वाले पायरिया के लिए रामबाण है। परिषद के वैज्ञानिक डॉ. सुमित पुरोहित ने बताया कि तिमूर का
उत्पादन अभी तक बीजों से होता था, पूर्व में इसे कुछ शोध केंद्रों पर टिशू कल्चर तकनीक से भी उगाने का
प्रयास किया गया, पर तब सफलता नहीं मिली। अब उत्तराखंड के वैज्ञानिकों के प्रयास से टिशू कल्चर व
हाईड्रोपोनिक तकनीक के संयुक्त मिश्रण से नई पौध तैयार की गई है। इसे अब जल्द ही पर्वतीय काश्तकारों को
उपलब्ध कराया जाएगा। उन्होंने बताया कि यह पौधे पर्वतीय क्षेत्र के साथ ही मैदानी क्षेत्र में बंजर हो चुकी
भूमि पर भी उगाकर काश्तकार आर्थिक रूप से मजबूत हो सकते हैं। इसके रोपण से पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाले
भूस्खलन को भी रोका जा सकता है। बताया कि यह पौधा चूंकि आठ से दस फिट तक की ऊंचाई का हो जाता
है, इससे यह खेतों की सुरक्षा कि लिए चहारदीवारी के रूप में काम करेगा। इससे पर्वतीय काश्तकारों को बंदरों,
जंगली सूअर, सेही व हिरण के उत्पात से खेती को हो रहे नुकसान को भी बचाया जा सकेगा। यह औषधि इस
बार पर्वतीय पशुओं का पेट तो भरेगा ही, साथ ही खेतीबाड़ी के लिए मुसीबत बन रहे बंदरों व जंगली जानवरों
से भी बचाने के लिए ढाल के रूप में काम आए।  तिमूर और लेमनग्रास की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
मिशन दालचीनी और मिशन तिमूर के तहत कृषि मंत्री ने देहरादून के केन्द्र से 3 लाख पौधे विभिन्न जिलों के
लिए भेजे। इनके प्रचार, तकनीकी प्रशिक्षण, प्रसंस्करण और बाजार उपलब्ध कराने के लिए चंपावत में सिनेमन
सेटेलाइट सेन्टर भी विकसित किया जा रहा है। कृषि मंत्री ने कहा कि सगन्ध फसलों को बढ़ावा देने के लिए
राज्य में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। जंगली जानवर इन फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाते और बंजर कृषि
भूमि पर ये आसानी से उगाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की दालचीनी की ब्रांडिंग भी की जाएगी।
वहीं पहाड़ी नीम के नाम से प्रचलित तिमूर की बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी पैदावार बढ़ाने पर
कृषि विभाग काम कर रहा है। इसके लिए पिथौरागढ़ में तिमूर सेलेटाइट सेंटर विकसित किया जा रहा है। कृषि
मंत्री ने बताया जुड़कर हजारों किसान इसका लाभ ले चुके हैं और अपनी आजीविका बेहतर बना रहे हैं।  तिमूर
की खेती को बढ़ावा देकर पलायन की मार को भी रोका जा सकता है। इसके लिए सरकार और राजनेताओं को
मजबूत इच्छाशक्ति दिखानी होगी। *लेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।*

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