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अटल बिहारी बाजपेयी को उत्तराखंड ने किया याद, भारत ही नहीं, विश्व के एक थे एक महान नेता

23/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
एक ऐसे भारत की परिकल्पना जो आत्मनिर्भर और सशक्त हो, विकास की ओर अग्रसर हो साथ ही मानवीय मूल्यों के साथ खड़ा हो, तकनीक से लबरेज हो और लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक बने, तैयार करना चाहते थे पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी। जिन्होंने जीवन में बड़ी से बड़ी बाधा को पार कर ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे को सही मायने में चरितार्थ किया और नए भारत की नींव रखने वाले महानायक बने। अटल जी एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिऩ्होंने लोगों को भरोसा दिलाया कि न्याय और सामाजिक समरसता पर सबका अधिकार है। भारतीय की बात भारतीय अंदाज में सुनी भी जाएगी और कही भी जाएगी। फिर चाहे वो सदन हो या सड़क, भारतीयों का आंतरिक मामला हो या विदेशी सरजमीं पर परचम लहराने की बात हो हर भारतीय की आस्था को अटूट विश्वास से बांधा जाएगा। उनके प्रेम और विश्वास की पराकाष्ठा संपूर्ण भारतवासियों के प्रति रही इसीलिए वे पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के भी लोकप्रिय नेता में शामिल रहे। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने 25 दिसम्बर सन 1924 को पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी (पिता) और कृष्णा वाजपेयी(माता) जी के घर जन्म लिया। पिता पेशे से एक अध्यापक और कवि थे, इसलिए बालपन से ही शिक्षा और साहित्य प्रेम के वातावरण में पले बढ़े, अटल जी युवा अवस्था तक आते आते, देश भक्ति एवं साहित्य में पारंगत हो चुके थे। “विजय पताका” से अटल जी बहुत प्रभावित हुए, कहते हैं इस रचना को पढ़ने के बाद अटल जी के जीवन की दिशा ही बदल गयी। बचपन से देश भक्ति की जो लौ लगी, उसने इन्हें छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक  संघ का स्वयंसेवक बना डाला।कानपुर के डी ए वी कॉलेज से एम.ए. करने के बाद वकालत की पढ़ाई प्रारम्भ की लेकिन बीच में ही पढ़ाई को विराम देकर संघ के कार्यों में लग गए। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के सानिध्य में राजनीति में महारथ हासिल की। एक साधारण परिवार में जन्म लेने के बाद भी दो बार अल्पकालिक और एक बार पूर्णकालिक प्रधानमंत्री बनने का गौरव हासिल किया।अटल जी का सपना भारत को शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का था, ताकि कोई भी देश भारत की तरफ आंख उठाकर न देख सके। इसके लिए उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाने का सपना देखा, जिसे उन्होंने शिद्दत से पूरा भी किया। ये वो दौर था जब पश्चिम की महाशक्तियां भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न होता नही देखना चाहती थी, इसलिए यह मिशन दुनिया के कुछ चुनिंदा सीक्रेट मिशनों की तर्ज पर पूरा किया गया।विश्व के चौधरी के नाक के नीचे अटल बिहारी वाजपेयी जी ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में एक के बाद एक पांच भूमिगत  परमाणु परीक्षण करके दुनिया को अचंभित कर दिया। भारत ने एक बार फिर दिखा दिया कि वो शांति और शक्ति का बेहतर तरीके से उपयोग करना जानता है।हालांकि पश्चिमी देशों को भारत का बुलंदियों पर यूं परवाज होना पसंद न आया, जिसके लिए उन्होंने भारत पर कई तरह की पाबंदी लगा दीं, लेकिन अटल जी ‘अटल’ थे, उन्होंने दृढ़तापूर्वक भारत के फौलादी इरादों को कायम रखा और दुनिया को दिखाया कि भारत शांति और शक्ति का सामंजस्य बनाना जानता है। अटल जी का सादा जीवन, सरल स्वभाव की दुनिया कायल है, उनके शब्दों का जादू पड़ोसी देश पाकिस्तान पर भी खूब चढ़ा। पाकिस्तान से संबंध बनाए रखने में उन्होंने बहुत उदारता दिखाई। 19 फरवरी सन 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर बस सेवा की न केवल शुरुआत की बल्कि स्वयं प्रथम यात्री के रूप में पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ से मुलाकात की और नए संबंधों की नींव डाली।अटल जी एक बेहतरीन कवि थे, उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से सदन में अपने विरोधियों को कई बार परास्त किया। उनके शब्दों के तीर इतने सहज और सरल रहते कि उनके विरोधी परास्त होने के साथ साथ उनकी कविताओं के कायल बन जाते। हिंदी,हिंदू, हिन्दुस्तान का जो सुंदर परिचय अटल जी ने कराया वह विरले ही देखने को मिलता है। आपकी रचनाओं में भारत की भावी पीढ़ीको प्रेरणा और त्याग का गहरा संदेश है। जब आप कहते हैं

बाधाएं आती हैं आएं,
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नींचे अंगारे,
सिर पर बरसे यदि ज्वालाएं,
निज हांथो में हंसते हंसते,
आग लगाकर जलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा।

प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी की उपलब्धियां निस्संदेह विलक्षण रहीं, लेकिन वह कुल मिलाकर छह वर्ष से कुछ अधिक समय के लिए ही शीर्ष पर रहे – पांच वर्ष के पूर्ण कार्यकाल से पहले दो अलग-अलग मौकों पर 13 दिन और 13 महीनों के लिए प्रधानमंत्री रहे थे। फिर भी वह छोटी सी अवधि लोगों को यह अहसास दिलाने के लिए काफी थी कि वाजपेयी देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक रहे। मेल टुडे द्वारा हाल ही में कराए गए एक सर्वेक्षण में 94 प्रतिशत पाठकों ने उन्हें सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री करार दिया। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है क्योंकि वाजपेयी के सामने नेहरू और इंदिरा गांधी जैसी शख्सियतें थीं, जिन दोनों के कार्यकाल लंबे रहे थे और इस तरह चिरस्थायी विरासत छोड़ने के ज्यादा मौके भी उनके पास थे।फिर प्रधानमंत्री के रूप में उनके प्रदर्शन के अलावा क्या था, जिसके कारण उन्हें इतने विराट व्यक्तित्व के तौर पर याद किया जाता है? उनके व्यक्तित्व के दो पहलुओं ने उनकी छवि गढ़ने में योगदान किया। पहला था उनका व्यक्तित्वः कवि, लोकतंत्रवादी, उदारवादी। और दूसरी थी उनकी राजनीतिक कुशाग्रताः जनता ही नहीं दूसरे राजनीतिक दलों के बीच भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की स्वीकार्यता बढ़ाने में अकेले उनका ही योगदान था। वे पार्टियां बाद में भाजपा की सहयोगी बनीं और उनमें से कुछ अभी तक उसकी साझेदार हैं। मत भूलिए कि प्रधानमंत्री बनने से पहले ही वाजपेयी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सितारे थे, उन लोगों की तरह नहीं, जिनकी पहचान सत्ता हाथ में लेने के बाद ही बनती है। 1977 में जनता पार्टी सरकार बनने से उसके ढहने तक मंत्री के तौर पर उन्होंने ऐसे मंत्रिमंडल में देश के लिए शानदार काम किया था, जिस मंत्रिमंडल में लोग अपने हिसाब बराबर करने में ही जुटे रहे थे। उससे पहले उन्होंने 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही सांसद के रूप में मजबूत पहचान बनाई थी और नेहरू को भी कथित रूप से कहना पड़ा था कि युवा वाजपेयी में किसी दिन प्रधानमंत्री बनने की क्षमता है।उसके बाद उन्होंने (अन्य वरिष्ठ नेताओं विशेषकर अपने मित्र एल के आडवाणी की मदद से, जिन्होंने सहायक की भूमिका निभाई) भाजपा को गढ़कर, 1990 के दशक में उसे सीटों के लिहाज से देश की सबसे बड़ी पार्टी बनाकर और कंेद्र में पहली भाजपानीत सरकार बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 2014 में पार्टी ने जो प्रचंड जीत दर्ज की, उसकी नींव तो वाजपेयी ने ही रख दी थी। लेकिन प्रधानमंत्री बनने से बहुत पहले ही उन्होंने अपने कार्यों और झकझोरने वाली कविताओं के जरिये लोगों के दिल जीत लिए थे।सबको साथ लेकर चलने की अपनी आदत के बाद भी उन्होंने पार्टी की बुनियाद रखने वाले मूल सिद्धांतों को लेकर कभी समझौता नहीं किया और राजनीतिक विरोधियों की आलोचना में वह कभी पीछे नहीं हटे। 1996 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने से पहले लोकसभा में दिया गया उनका भाषण अद्भुत है। उन्हें सदन में बहुमत पाने से रोकने के लिए जो विपक्षी पार्टियां एकजुट हो गई थीं, उन्हें आड़े हाथों लेते हुए वाजपेयी ने कहा कि उनमें कोई समानता नहीं है, वे केवल उन्हें सत्ता से हटाने पर अड़ी हैं और वे पार्टियां कुछ हफ्ते पहले ही चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ लड़ी थीं। एक और अवसर पर उन्होंने संघ के साथ अपने संबंधों का और हिंदुत्व के प्रति अपनी निष्ठा का गर्व के साथ बखान किया और आलोचना कर रहे विरोधियों को करारा जवाब दिया। उन्होंने अपने हिंदू होने पर गर्व करने वाली कविता भी लिखी। लेकिन उनका शब्द चयन और हमला करने का उनका तरीका ऐसा होता था कि उनके प्रतिद्वंद्वियों को चुभन महसूस होती थी, लेकिन वे दुखी नहीं होते थे। जरूरत पड़ने पर वह अपने प्रतिद्वंद्वियों के पास जाने में संकोच भी नहीं करते थे, जिससे उनके मन में किसी तरह का रोष बाकी नहीं रह जाता था। वाजपेयी राजनेता भी थे और नीतिज्ञ भी थे। और अगर उनकी कविताओं को भी मिला लें तो आपको रूमानी आदर्शवादी भी मिल जाएगा। तब आभास होता है जैसे भारत को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया जा रहा हो। आपके विचारों में तथा व्यवहार में राष्ट्र के प्रति समर्पण सर्वोपरि रहा। अटल जी हर भारतीय के दिल में रियल  हीरो के रूप में सदैव जीवित रहेंगें।अटल जी जाने से पहले अपनी अनगिनत रचनाएं हम भारतवासियों के लिए छोड़ गए, जिन्हें हम पढ़ कर सदैव उन्हें अपने नज़दीक पाते रहेंगें। उनकी रचनाओं में, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय, मृत्यु या हत्या, अमर बलिदान(लोकसभा में अटल जी के वक्तव्यों का संग्रह), संसद में तीन दशक, अमर आग है,कुछ लेख:कुछ भाषण, सेक्यूलरवाद, राजनीति की रपटीली राहें, बिंदु बिंदु विचार, मेरी इक्यावन कविताएं इत्यादि हैं, जो देश की बेशकीमती धरोहरों में से एकहैं।अटल जी ने अपने कार्यकाल के दौरान अनगिनत ऐसे काम किये जिससे हमारे देश की एकता औऱ अखंडता को शक्ति मिले। उन्होंने सौ वर्षों से अधिक पुराने कावेरी विवाद को सुलझाने का प्रयत्न किया, राष्ट्रीय सुरक्षा समिति, आर्थिक सलाह समिति, व्यापार एवं उद्योग समिति का गठन करना, ग्रामीण रोजगार सृजन एवं विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए बीमा योजना शुरू करना, सॉफ्टवेयर विकास के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल, विद्युतीकरण में गति लाने के लिए केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग का गठन करना, सामाजिक सद्भाव को बरकरार रखने के लिए सरकारी ख़र्चे पर रोज़ा इफ्तार शुरू करना आदि असंख्य कार्यों को करने का श्रेय अटल जी को ही जाता है। उनके द्वारा किए गए कार्यों के आधार पर उनके जन्मदिन को (25 दिसम्बर) भारत में सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है।अटल जी राजनीति के महारथी थे, उन्होंने अपने ज्ञान का उपयोग भारत में सामाजिक न्याय और राजनीतिक सुधार लाने के लिए किया, साथ ही सामाजिक सौहार्द को बनाये रखने में अपना अहम योगदान दिया इसलिए भारत के इस बेटे को भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व नमन करता है। विकसित और सशक्त भारत जिसमें सभी को बराबरी का अवसर मिले जो भारत की कामयाबी का आधार बने ताकि नए भारत का निर्माण किया जा सके भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी जी के जीवन प्रयासों में शामिल था इसलिए यदि हम यह कहें कि नए भारत की नींव रखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जी हैं तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।उन्होंने अटल सरकार की प्रमुख उपलब्धियों प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, दिल्ली मेट्रो,  दरअसल, वाजपेयी का उत्तराखंड से गहरा नाता रहा। दशकों की लंबी मांग के बाद अगर नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड देश के मानचित्र पर अलग राज्य के रूप में वजूद में आया, तो इसमें सबसे निर्णायक भूमिका उन्हीं की थी। राज्य गठन के अलावा प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में वाजपेयी ने उत्तराखंड को विशेष औद्योगिक पैकेज और विशेष राज्य के दर्जे से भी नवाजा। युगपुरुष अटल के निधन से देवभूमि उत्तराखंड के लोग अटल बिहारी वाजपेयी से अपार स्नेह करते थे।देवभूमि उत्तराखंड से अटल बिहारी वाजपेयी का विशेष लगाव था। उत्तराखंड में अलग राज्य निर्माण को लेकर लंबा आंदोलन चला। वर्ष 1996 में अपने देहरादून दौरे के दौरान उन्होंने राज्य आंदोलनकारियों की मांग पर विचार करने का भरोसा दिया था। वाजपेयी ने इस भरोसे को कायम भी रखा और नए राज्य की स्थापना वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौरान ही हुई। राज्य में पहली निर्वाचित सरकार नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की बनी थी। उस वक्त, यानी वर्ष 2003 में प्रधानमंत्री के रूप में नैनीताल पहुंचे वाजपेयी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री तिवारी के आग्रह पर उत्तराखंड के लिए दस साल के विशेष औद्योगिक पैकेज की घोषणा की। यह उत्तराखंड के प्रति उनकी दूरदर्शी सोच ही थी कि औद्योगिक पैकेज देकर उन्होंने नवोदित राज्य को खुद के पैरों पर खड़ा होने का मौका दिया। अटल बिहारी वाजपेयी को पहाड़ों की रानी मसूरी बहुत आकर्षित करती थी। जब भी अवसर मिलता, वह मसूरी आते और पहाड़ी की शांत वादियों में आत्ममंथन में समय गुजारते। देहरादून में उनके गहरे पारिवारिक मित्र नरेंद्र स्वरूप मित्तल रहते थे और जब भी वाजपेयी देहरादून आते, उनके पास खासा वक्त गुजारते। आज भी मित्तल परिवार के पास तस्वीरों के रूप में उनकी यादें कैद हैं। स्व. नरेंद्र स्वरूप मित्तल के पुत्र पुनीत मित्तल ने उनके साथ बिताए दिनों को स्मरण करते हुए बताया कि वे बचपन से ही अटल जी को घर आते हुए देखते रहे हैं। अटल जी जब भी देहरादून आते थे, उन्हीं के घर रुकते थे। सरल व्यक्तित्व और ओजस्वी कंठ वाले अटल जी ऐसे थे कि अपने सामान का छोटा सा ब्रीफकेस भी खुद उठाते थे। वे ट्रेन से आते-जाते थे। उनके ब्रीफकेस में एक धोती-कुर्ता, अंतर्वस्त्र, एक रुमाल और एक टूथब्रश होता था। जमीन से जुड़े हुए अटल जी दून की सड़कों पर नरेंद्र स्वरूप मित्तल के साथ 1975 मॉडल के स्कूटर पर सैर करते थे। बाद में जब नरेंद्र स्वरूप मित्तल ने फिएट कार ले ली तो वे अटल जी को उसमें भी घुमाया करते थे। मार्च 2002 में, श्री वाजपेयी ने जब नैनीताल का दौरा किया, तो उन्होंने उत्तराखंड राज्य के लिए एक विशेष औद्योगिक पैकेज की घोषणा की थी। इसके बाद वर्ष 2003 से उत्तराखंड में विशेष पैकेज लागू किया गया। जानकारी के अनुसार, राज्य के गठन से पहले उत्तराखंड में कुल 14203 बड़े और छोटे उद्योग स्थापित हुए थे। जिसमें करीब नौ हजार करोड़ रुपए का पूंजी निवेश था। अटल जी ने उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा देने के साथ ही पहाड़ी राज्य में औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया।उत्तराखंड को 10 साल के लिए दिए गए औद्योगिक पैकेज में निवेश करने पर उद्यमियों को पांच साल के लिए आयकर छूट आदि के साथ उत्पाद शुल्क में शत-प्रतिशत छूट दी गई, जिससे उद्योगपति करोड़ों का निवेश करने के लिए आगे आए. राज्य के अस्तित्व में आने से पहले, जहाँ केवल एक प्रमुख उद्योग स्थापित था। वहीं, इस पैकेज के बाद बड़े उद्योगों में करोड़ों का पूंजी निवेश किया गया।नए राज्यों का गठन (झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड) मार्च 2002 में, श्री वाजपेयी ने जब नैनीताल का दौरा किया, तो उन्होंने उत्तराखंड राज्य के लिए एक विशेष औद्योगिक पैकेज की घोषणा की थी। इसके बाद वर्ष 2003 से उत्तराखंड में विशेष पैकेज लागू किया गया। जानकारी के अनुसार, राज्य के गठन से पहले उत्तराखंड में कुल 14203 बड़े और छोटे उद्योग स्थापित हुए थे। जिसमें करीब नौ हजार करोड़ रुपए का पूंजी निवेश था। अटल जी ने उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा देने के साथ ही पहाड़ी राज्य में औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया।उत्तराखंड को 10 साल के लिए दिए गए औद्योगिक पैकेज में निवेश करने पर उद्यमियों को पांच साल के लिए आयकर छूट आदि के साथ उत्पाद शुल्क में शत-प्रतिशत छूट दी गई, जिससे उद्योगपति करोड़ों का निवेश करने के लिए आगे आए. राज्य के अस्तित्व में आने से पहले, जहाँ केवल एक प्रमुख उद्योग स्थापित था। वहीं, इस पैकेज के बाद बड़े उद्योगों में करोड़ों का पूंजी निवेश किया गया। तथा पोखरण परमाणु परीक्षण का उल्लेख करते हुए कहा कि इन पहलों ने आधुनिक भारत की नींव मजबूत की.  अटल बिहारी वाजपेयी को हिंदी से बेहद लगाव था। उन्होंने वैश्विक स्तर पर हिंदी का डंका बजाया। वो पहले नेता थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया। पहली बार भारत की राजभाषा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर आधिकारिक रूप से गूंजी। उनके भाषण के बाद देश-दुनिया के प्रतिनिधियों ने तालियों से स्वागत किया था बता दें कि 1977 में आज ही के दिन भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिंदी में अपना संबोधन दिया था। अपने भाषण में वाजपेयी जी ने परमाणु निरस्त्रीकरण, आतंकवाद जैसे कई गंभीर मुद्दे उठाए थे। हिंदी की वजह से ही उनका यह भाषण ऐतिहासिक हो गया। अटल में इतनी ढेर सारी खूबियां थी कि विपक्षी दलों के नेता भी उनके मुरीद थे। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉ मनमोहन सिंह तक सभी प्रधानमंत्रियों ने अटल को पूरा सम्मान दिया। संसद में उनके भाषण के दौरान विपक्षी सांसद भी मुद्दों पर मेज थपथपाने पर मजबूर हो जाया करते थे। देश में बहुत कम ऐसे नेता हुए हैं जिन्हें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की ओर से इतना ज्यादा सम्मान मिला हो।उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि स्व. अटल जी की विरासत को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगे बढ़ा रहे हैं और देश को विकसित भारत–2047 के लक्ष्य की ओर दृढ़ता से अग्रसर कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि स्व. अटल जी भले हमारे बीच शारीरिक रूप से न हों, लेकिन उनके आदर्श सदैव हमारे हृदयों में जीवित रहेंगे और राष्ट्र को दिशा देते रहेंगे.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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