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करोड़ों खर्च, फिर भी क्यों प्रदूषित हो रहा है जल

13/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
जीवन के लिए पानी ‘अमृत’ समान है. यह लोगों की बुनियादी जरूरत है. शहरीकरण और औद्योगीकरण ने काफी हद तक इसकी गुणवत्ता को प्रभावित किया है. ग्राउंड वाटर लेवल भी साल दर साल नीचे जा रहा है. एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं जबकि 16 करोड़ लोग गंदा पानी पी रहे हैं.शुद्ध पानी के लिए सरकार करोड़ों-अरबों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. देश के करीब 9 राज्यों में पानी की गुणवत्ता खराब है. यहां नाइट्रेट, फ्लोराइड, क्रोमियम, मैंगनीज, आयरन, निकेल, कोबाल्ट जैसे तत्व मानक से अधिक पाए गए हैं. खराब पानी की वजह से काफी लोगों की मौत भी चुकी है. काफी लोग तमाम बीमारियों से जूझ रहे हैं.केंद्रीय भूमि जल बोर्ड(सीजीडब्ल्यूबी) ने वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 जारी की. इसमें देशभर में ग्राउंड वाटर क्वालिटी का पता लगाने के लिए 2023 को बेस ईयर मानकर कुल 15,259 सैंपल इकट्ठा किए गए. साल 2024 में 5 हजार 368 स्टेशनों से ये नमूने लिए गए. इनमें से कुछ मानसून से पहले जबकि कुछ मानसून के बाद के थे.इनकी जांच अमेरिकन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन में दिए गए स्टैंडर्ड तरीकों से कराई गई. जांच के पीछे का मकसद पीने और खेती के लिए इस्तेमाल होने पानी की गुणवत्ता को अलग-अलग पैरामीटर पर परखना था. जांच में कई राज्यों के पेयजल शुद्ध पाए गए जबकि कई स्टेट में ये काफी प्रदूषित मिले.शुद्ध पेयजल के मानक क्या हैं?, देश की कितनी आबादी दूषित पानी से परेशान है?, ग्राउंड वाटर लेवल साल दर साल नीचे क्यों जा रहा है?, विश्व के अन्य कौन से देश दूषित पेयजल का सामना कर रहे हैं. सरकार वाटर क्वालिटी को सुधारने के लिए क्या उपाय कर रही है?. जांच में अरुणाचल, मिजोरम, मेघालय और जम्मू कश्मीर के 100% नमूने भारतीय मानक ब्यूरो के अनुरूप पाए गए. यानी यहां का पानी पूरी तरह शुद्ध है. लिहाजा ये पीने और फसलों की सिंचाई के लिए काफी उपयुक्त है. यहां के लोगों को दूषित पानी से होने वाली बीमारियों को लेकर फिक्रमंद होने की जरूरत नहीं है. कम आबादी और कम औद्योगीकरण के कारण यहां पानी की गुणवत्ता ठीक है. इन राज्यों में इंडस्ट्रियल कचरे और शहरी प्रदूषण का दबाव कम है. मानसून में होने वाली ज्यादा बारिश सतह और ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करने में मदद करती है. यहां सीमित खेती होती है. मतलब फर्टिलाइजर/पेस्टीसाइड का प्रयोग कम किया जाता है.राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में नाइट्रेट मानक से अधिक पाया गया. लवणता भी ज्यादा मिली. पूर्वी राज्य यानी असम, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड, सिक्किम आदि और उत्तर-पूर्वी राज्यों में आयरन, मैंगनीज और आर्सेनिक पाए गए हैं. कुल 9 राज्यों में पानी की गुणवत्ता खराब है. साफ पानी को लेकर ये प्रदेश हाई रिस्क पर माने गए हैं.जांच में यह पता चला कि राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश दूषित पानी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. यहां नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक, यूरेनियम और खारेपन की मात्रा बहुत ज्यादा है. राजस्थान, हरियाणा और आंध्र प्रदेश के पानी में भी काफी गंदगी नजर आती है. पंजाब और गुजरात के भी हालात ठीक नहीं हैं. पानी में आर्सेनिक का होना काफी समय से चिंता का विषय है. गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी जिन जमीनों से होकर गुजरती हैं, खास तौर पर वहां यह समस्या ज्यादा है. राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी कभी-कभार यूरेनियम मानक से ज्यादा पाए गए हैं.असम, कर्नाटक, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों के पानी में गैंगनीज की मात्रा ज्यादा पाई गई है. वहीं पूरे देश में कॉपर का लेवल लगातार तय लिमिट के अंदर पाया गया. भारत में ग्राउंड वाटर लेवल कई वजहों से लगातार कम हो रहा है. सिंचाई के लिए ज्यादा पानी निकालना भी इनमें से एक है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में धान और गन्ने जैसी फसलों की सिंचाई के लिए जमीन से ज्यादा पानी निकाला जाता है. दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में शहरी मांग बढ़ रही है. यहां तेजी से कंस्ट्रक्शन और पक्की सड़कों की वजह से भूजल प्राकृतिक रूप से रिचार्च नहीं हो पा रहा है.इसके अलावा मौसम में बदलाव, अनियमित मानसून, देर से बारिश और सूखे की वजह से भी दिक्कत आ रही है. शहरी और इंडस्ट्रियल जोन के बढ़ने से जमीन तक पानी का रिसाव रुक जाता है. फ्लोराइड, नाइट्रेट और आर्सेनिक प्रदूषण के कारण लोगों को गहरे कुएं खोदने पड़ते हैं. इससे तेजी से पानी खत्म हो रहा है.समय करीब 30 शहर गंदे पानी की समस्या से जूझ रहे हैं. साल 2050 तक यहां पानी काफी दूषित हो जाएगा. इन शहरों में जयपुर, इंदौर, कोलकाता, जालंधर, अहमदाबाद, पुणे, ठाणे, जबलपुर, धनबाद, वड़ोदरा, मुंबई, भोपाल, श्रीनगर, लखनऊ, ग्वालियर, राजकोट, हुबली-धारवाड़, सूरत, कोटा, नागपुर, दिल्ली, नासिक, चंडीगढ़, अलीगढ़, विशाखापट्टनम, अमृतसर, कोझिकोड, बेंगलुरु, लुधियाना, कन्नूर शामिल हैं.उत्तर प्रदेश के पवित्र गंगा नदी में इंडस्ट्रियल गंदगी, बिना ट्रीट किया हुआ घरेलू सीवेज और खेती से निकला पानी मिलकर उसे दूषित बना रहा है. कई जगहों पर पेयजल के दूषित होने का भी यही कारण है. महाराष्ट्र में मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल एक्टिविटी की वजह से मीठी और गोदावरी नदियों में प्रदूषण का लेवल बढ़ रहा है. इसी तरह दिल्ली में बार-बार सफाई के बावजूद यमुना नदी बहुत ज्यादा गंदी है.इसमें बिना ट्रीट किए सीवेज और शहरों से निकलने वाला गंदा पानी पहुंचता है. भारत के बड़े इंडस्ट्रियल पावर हाउस में से एक गुजरात भी खराब पानी की चुनौतियों का सामना कर रहा है. फैक्ट्रियों और इंडस्ट्रियल क्लस्टर से निकलने वाला केमिकल कचरा, टेक्सटाइल डाई और हेवी मेटल सतही और ग्राउंड वाटर सोर्स में पहुंच रहे हैं. पंजाब में खेती से निकलने वाला फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड का बहाव पानी को दूषित कर रहा है. छोटी इंडस्ट्रीज से निकलने वाला गंदे पानी ने ग्राउंड वाटर में नाइट्रेट का लेवल बढ़ा दिया है.भारत की अभी की आबादी लगभग 142.59 करोड़ है. 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खराब पानी की समस्या का सामना कर रहा है. देश के करीब 60 करोड़ लोगों को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिल रहा है. जबकि 16 करोड़ लोग गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. मौजूदा समय में लगभग 70% पानी के सोर्स खराब हैं.करीब 20 करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे पानी के संपर्क में हैं जिनमें आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे केमिकल मानक से ज्यादा हैं. जनवरी 2025 और जनवरी 2026 के बीच 26 शहरों में सीवेज का गंदा पानी नल में मिल गया. इसकी वजह से करीब 5500 लोग बीमार पड़ गए. 3.77 करोड़ लोग हर साल पानी से होने वाली बीमारियों से प्रभावित होते हैं.दिल्ली, पटना और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में 40 साल पुराने पाइपों का सीवेज में मिलना सिर्फ मानसून की समस्या नहीं है, बल्कि यह साल भर की समस्या है.नीति आयोग की साल 2018 की रिपोर्ट के अनुसार साफ पानी की कमी से हर साल देश में लगभग 2 लाख लोगों की मौत होती है. मौजूदा माइक्रोबायोलॉजी स्टडीज के अनुसार यह देखा गया कि एक्यूट डायरिया डिजीजटाइफाइड, हैजा, हेपेटाइटिस और शिगेलोसिस भारत में पानी से होने वाली आम बीमारियां हैं. इनसे 2014 और 2018 के बीच लगभग 11,728 मौतें हुईं. इनमें 10,738 मौतें 2017 के बाद की हैं.गंदे पानी से हैजा, डायरिया, पेचिश, हेपेटाइटिस A, टाइफाइड और पोलियो जैसी बीमारियों का खतरा रहता है. कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां भी हो सकती हैं. खराब पानी पीने या मछली समेत झींगा, केकड़ा आदि खाने से माइक्रोप्लास्टिक भी शरीर के अंदर पहुंच जाता है.2020 की एक स्टडी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि इंसान हर सप्ताह करीब 0.1 से 5 ग्राम माइक्रोप्लास्टिक खा लेता है. इसी तरह आर्सेनिक मिले पानी से हाइपरटेंशन, कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम और लीवर प्रभावित होते हैं.लंबे समय तक आर्सेनिक के संपर्क में रहने पर स्किन में हाइपरकेराटोसिस, हाइपरपिग्मेंटेशन और हाइपोपिग्मेंटेशन जैसे रोग लग जाते हैं. तंत्रिका तंत्र को भी नुकसान पहुंचता है. WHO के मुताबिक हर साल दुनिया में लगभग 14 लाख लोग खराब सफाई, खराब हाइजीन या खराब पीने पीने से मर जाते हैं. लोगों को शुद्ध पानी उपलब्ध कराने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है. जल जीवन मिशन (हर घर जल) के तहत अब 81% ज्यादा ग्रामीणों के घरों में साफ पानी पहुंच रहा है. 22 अक्टूबर 2025 तक 15.72 करोड़ से ज्यादा लोगों को घरेलू नलों से साफ पानी मिला.मिशन के तहत सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 2,08,652 करोड़ दिए. इसकी ज्यादातर रकम का इस्तेमाल हो चुका है. इसके अलावा ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ाने, पानी को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए अन्य तरीके से भी काफी रुपये खर्च किए जा रहे हैं. भारत के अलावा दुनिया के अन्य भी कई देश दूषित पानी की समस्या से जूझ रहे हैं. चाड, केंद्रीय अफ्रीकी गणराज्य, लिसोटो समेत कई देशों के लोगों को खराब गुणवत्ता वाले पेयजल का सामना करना पड़ रहा है. यहां भी दूषित पानी से कई तरह की बीमारियां हो रहीं हैं. जबकि फिनलैंड, जर्मनी समेत कई देशों का पानी उच्च गुणवत्ता वाला है. दूषित पानी के मामले में दुनिया में भारत की रैंक 144 है, जबकि स्कोर 25.5 है. पृथ्वी की सतह का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है। हालांकि, 97 प्रतिशत पानी समुद्री है। 3 प्रतिशत पानी ही मीठा है जिसे फ्रेश वाटर भी कहा जाता है। अगर इस 3 प्रतिशत पानी में ही जहर घुलने लगे तो क्या होगा। इंदौर में पानी की वजह हुई मौतों ने एक बार फिर साफ पानी का मुद्दा उठा दिया है। हालांकि, ये भारत या पूरी दुनिया में पहली बार नहीं हुआ। पानी की वजह से रोजाना कई जिंदगिया खत्म हो रही हैं। अगर गंगा नदी में गंदगी ना गिराई जाए तो इसे निर्मल बनाए रखना असंभव नहीं है. लेकिन होता है इसके उलटा. कई जगह गंदगी को गंगा में सीधे बहा दिया जाता है. नदी के किनारे शवों को जलाया जाता है. खतरनाक जीवाणुओं और जैव रासायनिक तत्वों की अत्यधिक मात्रा से गंगा नदी का पानी काफी प्रदूषित हो गया है.केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बीते मार्च महीने में ऋषिकेश से लेकर हावड़ा तक यानी उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के 94 जगहों से गंगा जल का सैंपल लिया था. प्रदूषण का हाल यह था कि कानपुर में तेनुआ (ग्रामीण) के पास प्रति सौ मिलीग्राम जल में टोटल कोलीफॉर्म (टीसी) जीवाणुओं की संख्या 33 हजार के पार थी, जबकि यह संख्या अधिकतम 5000 होनी चाहिए थी. हालत यह कि गंगा नदी के पानी को पीना तो दूर, उससे नहाना भी मुश्किल है. सुकून की बात है कि रिपोर्ट के अनुसार ऑक्सीजन की मात्रा मानक से कम नहीं है. बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार देश में चार जगहों, ऋषिकेश (उत्तराखंड), मनिहारी व कटिहार (बिहार) एवं साहेबगंज व राजमहल (झारखंड) में गंगा के पानी को ग्रीन कैटेगरी में रखा गया है. अर्थात इन जगहों के पानी से किटाणुओं को छान कर पीने में इस्तेमाल किया जा सकता है. बाकी सभी जगह रेड कैटेगरी में रखे गए हैं. नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत 31 मार्च, 2021 तक गंगा और उसकी सहायक नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए 20,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ जून, 2014 में शुरू की गई थी. केंद्रीय मंत्री विश्वेश्वर टुडू ने बीते फरवरी माह में राज्य सभा में लिखित उत्तर में बताया था कि केंद्र सरकार द्वारा एनएमसीजी (नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा) को वित्तीय वर्ष 2014-15 से 31 जनवरी, 2023 तक 14084.72 करोड़ रिलीज किए जा चुके हैं. वहीं 31 दिसंबर, 2022 तक 32,912.40 करोड़ की लागत से कुल 409 प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया गया जिनमें से 232 प्रोजेक्ट को पूरा कर चालू कर दिया गया है.अब 2026 तक के लिए 22500 करोड़ रुपये के बजटीय प्रावधान के साथ नमामि गंगे मिशन-2 को केंद्र सरकार ने अपनी स्वीकृति दी है.  यह बात दीगर है कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट ने कई महत्वपूर्ण आयाम हासिल किए हैं, परिदृश्य बदलेगा भी. लेकिन, यह भी कटु सत्य है कि जनभागीदारी के बगैर गंगा नदी की अविरलता व निर्मलता सुनिश्चित नहीं की जा सकेगी.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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