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उत्तराखंड में कम वर्षा और बर्फबारी से जल संकट

22/01/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत का एक खूबसूरत राज्य उत्तराखंड जिसे गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ जैसे तीर्थस्थलों के लिए प्रसिद्धी मिली है. यहां का प्राकृतिक सौंदर्य लोगों का मन मोह लेते हैं. इस राज्य को देवभूमि के नाम से जाना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के साथ इस राज्य की एक और बड़ी भूमिका है. उत्तराखंड राज्य देश की एक बड़ी आबादी की प्यास भी बुझाता है. लेकिन वर्तमान समय में ये पहाड़ी राज्य भीषण जल संकट से गुजर रहा है. अमूमन ये माना जाता है कि जिस राज्य से गंगा जैसी विशाल नदी बहती हो वहां भला जल की क्या कमी हो सकती है, लेकिन सरकारी आंकड़े जो हकीकत बयां कर रहे हैं, वो बेहद चौंकाने वाले तो हैं ही साथ ही भयावह भी हैं. दरअसल, जहां दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग का असर देखा जा रहा है. उत्तराखंड के लिए एक पुरानी कहावत है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी कभी भी यहां के काम नहीं आई. एक दो अपवादों को छोड़ दें तो यह काफी हद तक सही भी है. जो उत्तराखंड देश की एक बड़ी आबादी की प्यास बुझाता है, अब वहीं के लोगों के हलक सूख रहे हैं. पहाड़ों से निकलने वाले जल स्रोत छोटी-छोटी नदियां अब गायब हो रही हैं. ऐसा नहीं है कि सरकार और सिस्टम को इसकी जानकारी नहीं है. 6-8 महीने में एक बैठक करके हमारे नीति निर्धारक इस पर चर्चा करते हैं और अगले प्लान के लिए बजट करते हैं, लेकिन हालात यह है कि नीति आयोग की रिपोर्ट यह कह रही है कि उत्तराखंड में लगातार जल स्रोत सूख रहे हैं. जानकार तो यह भी मानते हैं कि पलायन का एक बड़ा कारण नौले-धारे और जल स्रोतों का सूखना भी है.  इन सब के पीछे वजह जो भी हो, लेकिन इन हालातों की बड़ी वजह इंसान ही हैं. कुछ समय पहले तक जल स्रोतों को गांव के लोग देवता की तरह पूजते थे. साल में कई बार गांव इकट्ठा होकर इन नौले धारों और जल स्रोतों को संजोकर रखते थे. लेकिन आलम यह है कि धीरे-धीरे यह जल स्रोत आबादी वाले इलाकों में सूखने लगे हैं. जल स्रोत प्रबंधन कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि, मौजूदा समय में उत्तराखंड में 4000 ऐसे गांव हैं जो जल संकट से जूझ रहे हैं. रिपोर्ट यह भी बताती है कि 510 ऐसे जल स्रोत हैं, जो अब सूखने की कगार पर आ गए हैं. सबसे ज्यादा असर अल्मोड़ा जनपद पर पड़ा है. यहां पर 300 से अधिक जल स्रोत सूख गए हैं. यहां तक कि उत्तराखंड में प्राकृतिक जल स्रोतों के जलस्तर में 60 फीसदी की कमी आई है. उत्तराखंड में 12000 से अधिक ग्लेशियर और 8 नदियां निकलती हैं. बावजूद इसके उत्तराखंड में मौजूदा समय में 461 जल स्रोत ऐसे हैं, जिनमें 76% से अधिक पानी अब बचा ही नहीं यानी पूरी तरह से सूख चुका है. इसके साथ ही प्रदेश में 1290 जल स्रोत ऐसे हैं, जिनमें 51-75 प्रतिशत पानी सूख चुका है. आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 2873 जल स्रोत ऐसे हैं, जिनमें 50 प्रतिशत तक पानी कम हो चुका है और ये निरंतर कम हो रहा है. राज्य में सबसे अधिक जल संकट, टिहरी, पिथौरागढ़, चमोली, अल्मोड़ा, और बागेश्वर जिले में है. ऐसा नहीं है कि सिर्फ प्राकृतिक जल स्रोत कम हो रहे हैं. केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय की मानें तो राज्य में 725 ऐसे जलाशय हैं, जो पूरी तरह से सूख चुके हैं. उत्तराखंड में 3096 जलाशय हैं, जिसमें 2970 जलाशय ग्रामीण क्षेत्र में है, जबकि 126 जलाशय शहरी क्षेत्र में हैं. रिपोर्ट कहती है कि 2371 जलाशय में हाल ही में पानी पाया गया था, जबकि 725 जल से पूरी तरह से सूख चुके हैं, जिसकी वजह मंत्रालय ने प्रदूषण फैक्ट्री और तालाबों के ऊपर बस्तियों को बताया था. उत्तराखंड के पहाड़ों में प्राकृतिक जल स्रोत को सूखते देख लोग भी बेहद चिंतित हैं. कभी टिहरी बांध के विरोध में खड़े हुए स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा के बेटे कहते हैं कि हमने इन जल स्रोतों को भगवान की तरह पूजा है. लेकिन आज पहाड़ों में हो रहा अनियंत्रित विकास और सड़कों का जाल जल स्रोतों के सूखने की प्रमुख वजह हैं. कहा कि युवा पीढ़ी भी जल स्रोतों और झरनों को फोटो खिंचवाने तक सीमित रख रही है. उन्होंने कहा कि संरक्षण के लिए आवाज तो उठ रही है, लेकिन धरातल पर नहीं उतर पा रही है. कहीं ऐसा ना हो कि आने वाले समय में हमारे छोटे-छोटे गांव भी जल विहीन ना हो जाएं. हैरानी यह है कि हमारे यहां से नदियां जा रही हैं और तमाम स्रोत हैं, जो कई राज्यों को पानी देते हैं. लेकिन हम और हमारी सरकार इसको बच्चा नहीं पा रही हैं. नदियों और जल स्रोतों पर लगता हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट भी इसके लिए दोषी हैं.  उत्तराखंड में जल स्रोत सूखने के बाद पहाड़ी जिलों के अलावा मैदानी जिलों में भी परेशानियां बढ़ी हैं. देहरादून के विभिन्न क्षेत्रों में टैंकर के जरिए पानी पहुंचाया जा रहा है. देहरादून जिले में 142 जल स्रोत मौजूद हैं, जिनमें 46% ऐसे हैं, जिनका पानी 76% से ज्यादा सूख चुका है.इसी तरह पौड़ी में 645 में से 161 जल स्रोत सूख गए हैं. चमोली में 436 में से 36 सूख चुके हैं. उधर, रुद्रप्रयाग में 313 में से 5 जल स्रोत अब गायब हो गए हैं. नई टिहरी में 627 में से 77 जल स्रोत का पानी सूख चुके हैं. उत्तरकाशी में 415 में से 63 जल स्रोत सूख गए हैं.वहीं, नैनीताल में 459 में से 36, अल्मोड़ा में 570 में से 13, पिथौरागढ़ में 542 में से 25 जबकि, चंपावत में 277 और बागेश्वर में 198 में से एक-एक जल स्रोत 76% से ज्यादा सूख चुके हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि आने वाला समय भयानक पेयजल संकट से गुजरेगा. हालांकि, जल संस्थान के अधिकारी गर्मियों में पानी की समस्या बढ़ने की स्थिति में पानी के टैंकर लगाने की बात कह रहे हैं. उत्तराखंड के लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी का एक गीत है ‘गंगा जमुना जी का मुल्क मनखी घोर प्यासा…’ कहने को तो ये गीत सालों पहले पिछली शताब्दी में गाया गया था। लेकिन इसकी बातें अब पूरी तरह सच साबित हो रही हैं। जी हां…देश के अनेक राज्यों की प्यास बुझाने वाली गंगा और यमुना नदियों के प्रदेश के लोगों के हलक पानी के बिना सूख रहे हैं। वर्षा व बर्फबारी न होने से गंगा और यमुना के जलस्रोतों का पर्याप्त रिचार्ज न होने से ये सदानीरा नदियां भी दबाव में आ सकती हैं। विशेषज्ञ यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की गति विश्व के अन्य क्षेत्रों की तुलना में पहले से ही अधिक है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन और कम होती वर्षा-बर्फबारी भविष्य के लिए गंभीर संकेत हैं।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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