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किसे सत्ता की कुर्सी सौंपना चाहेंगे उत्तराखंड के लोग?

14/01/21
in उत्तराखंड, देहरादून, राजनीति
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शंकर सिंह भाटिया
देहरादून। उत्तराखंड 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए सजने लगा है। राजनीतिक दल अंतिम तैयारी में जुट गए हैं। सत्ताधारी भाजपा अभी भी मोदी के नेतृत्व के भरोसे है। कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर तलवारें खिंची हुई हैं। राज्य में सत्ता की नई दावेदार आप पार्टी और सभी को दरकिनार कर सीधे भाजपा से टकराने की मूड में दिखती है। आप इस टकराव का राजनीतिक लाभ लेने कोशिश में जुटी हुई है। क्षेत्रीय पार्टियां पूरे चार साल तक अपनी ढपली से अपना राग अलाप रही थी, अब ऐन मौके पर एकजुटता की दुहाई दे रही हैं।
भाजपा और कांग्रेस अब तक दस-दस साल उत्तराखंड की सत्ता का उपभोग कर चुके हैं। जब तक 2022 के चुनाव होंगे भाजपा करीब सवा ग्यारह साल सत्ता सुख ले चुकी होगी। इन दोनों सत्तानसीन पार्टियों ने उत्तराखंड के कम से कम उन लोगों को सोचने पर मजबूर किया है जो किसी दल के पिट्ठू नहीं हैं, कि यदि इनमें से किसी एक को फिर से पांच साल के लिए उत्तराखंड फिर से सौंपा जाता है तो ये कुछ बेहतर करने की सोच के साथ आगे बढ़ सकते हैं? जिन्होंने दस-ग्यारह साल के शासन में अब तक ऐसा कुछ सकारात्मक नहीं किया, उनसे पांच और साल में सकारात्मक करने की अपेक्षा की जा सकती है?
दिल्ली में सत्तासीन आप पार्टी अपने को उत्तराखंड में एक बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है। हालांकि सत्ता तक पहुंचने की दौड़ में आप अभी बहुत पीछे है, लेकिन बिल्कुल भाजपा कांग्रेस की तरह दिल्ली हाई कमान से संचालित होने वाली आप उत्तराखंड में कुछ अगल कर पाएगी, यह सोचा जा सकता है? हमने बहुत नजदीक से देखा, बसपा करीब पंद्रह सालों तक उत्तराखंड मंे तीसरी राजनीतिक ताकत बनी रही। लेकिन इस पार्टी ने कभी भी बसपा के उत्तराखंड के अपने नेताओं पर भरोसा नहीं किया, उत्तर प्रदेश समेत दूसरे प्रदेशों के बसपा के नेता उत्तराखंड में इस पार्टी को हांकते रहे। इसका परिणाम यह निकला कि आज बसपा इस राज्य में शून्य पर है। हरिद्वार तथा उधमसिंह नगर में प्रभाव दिखाने वाली बसपा अब राजनीतिक परिदृश्य से ओझल हो चुकी है। उसे अब एक-आद सीटों का भी दावेदार नहीं माना जा रहा है। वही चरित्र आप ने भी शुरूआत से दिखाया है। इस स्थिति में वह उत्तराखंड में अपनी पार्टी को कितना जमा पाएंगे, आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है।
20 साल से अधिक के उत्तराखंड राज्य के सफर में यह बात साफ हो गई है कि दिल्ली धारित पार्टियों का रुख उत्तराखंड का पक्षधर नहीं हो सकता है। उनके लिए उत्तराखंड सिर्फ तीन मैदानी जिले हैं, वह बातें कुछ भी करें पहाड़ उनके लिए पराया ही है। उनकी सोच में पहाड़ के पराया होने के साफ प्रमाण भी दिखाई देते हैं। उत्तराखंड बनने से पहले पहाड़ के स्कूलों में आज के मुकाबले अधिक संख्या में मास्टर होते थे, अस्पतालों में डाक्टर तथा पैरा मेडिकल कर्मचारी भी अधिक संख्या में थे। स्कूलों तथा अस्पतालों की हालत बेहतर करने की सोच से उत्तराखंड आंदोलन शुरू हुआ था, लेकिन राज्य बनने के बाद ये और भी बदतर हुए हैं। पलायन की स्थिति सन् 2000 से पहले के मुकाबले इन बीस सालों में और भी भयावह हुई है। दो दशक तक सत्ता का उपभोग करने वाले इस जिम्मेदारी से बच सकते हैं? वे किस मुंह से कह सकते हैं कि उन्होंने संयुक्त उत्तर प्रदेश के मुकाबले उत्तराखंड को बेहतर बनाया है? जब एक-एक दशक सत्ता भोगने के बाद वे ऐसा नहीं कर पाए हैं तो वे अगले और पांच सालों में बेहतर कर पाएंगे? कतई नहीं, उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है।
उत्तराखंड में बेहतर विकल्प क्या हो सकता है? देश के बहुत सारे राज्यों में क्षेत्रीय दल बेहतर काम कर रहे हैं। उन राज्यों में दिल्ली से नियंत्रित होने वाले दल उनके सामने नतमस्तक हैं। उत्तराखंड में क्षेत्रीय दल उक्रंाद का एक बेहतर इतिहास है। जिसने एक सफल राज्य आंदोलन का नेतृत्व किया। लेकिन राज्य बनने के बाद इस दल के नेतृत्व ने जो निकृष्टता दिखाई है, राज्य के लोगों का उक्रांद से भरोसा समाप्त हो गया है। राज्य के लोग आज भी उक्रंाद की तरफ आशा भरी निगाहों से देखते हैं। लेकिन उक्रांद नेतृत्व ने हमेशा लोगों की आशाओं पर तुषारापात किया है। इस पार्टी का दुर्भाग्य यह है कि जो विधायक बन गया वह पार्टी से बड़ा हो गया।
इस क्षेत्रीय पार्टी का नेतृत्व कैसे काम कर रहा है? इसका ताजा उदाहरण है, पार्टी से छह चुके हुए लोगों का एक संचालन मंडल बनाया गया है। दल के यह सभी संचालक हारे हुए लोग हैं, जिनके पास दल को इन परिस्थितियों में बजबूती से आगे ले जाने का कोई रोड मैप नहीं है। इनकी वजह से यह क्षेत्रीय दल ठहरे हुए पानी का एक सड़-गल गया तालाब लगता है। यदि कुछ अक्षम लोगों को संरक्षण देने की जगह पर दल को ताकत देने की कोशिश की गई होती तो दल आज युवा पीढ़ी के हाथों में होता। जिसका पानी ठहरे हुए तालाब की तरह सढ़-गल नहीं गया होता, बल्कि सदा नीरा नदी की धारा की तरफ प्रवाहित होता हुआ दिखाई देता। बहुत सारे लोग जो अपने-अपने दलों से नाराज होते हैं, वे उक्रांद को एक विकल्प के तौर पर इसीलिए नहीं देखते।
दिवाकर भट्ट को ही ले लीजिए जिन्होंने स्थिरता के लिए भाजपा सरकार को समर्थन दिया था, पांच साल कैबिनेट मंत्री रहते हुए कभी अपने दल को मजबूती देने का प्रयास नहीं किया। पांच साल बाद उक्रांद को अंगूठा दिखाकर वह भाजपा के ही हो गए। यदि भाजपा में टिकट मिल गया होता तो वह कभी उक्रांद की तरफ नहीं देखते। उनका लगातार उक्रांद अध्यक्ष के तौर पर तीसरा कार्यकाल चल रहा है। इस तरह के अवसरवादी नेतृत्व वाले दल पर भला कौन भरोसा कर सकता है? कुल मिलाकर छह चुके हुए नेताओं को संरक्षण देने के लिए एक क्षेत्रीय दल के भविष्य पर मिट्टी डाली जा रही है। इस तरह की अवसरवादिता दिखाकर भी उक्रांद के नेता आज यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि यदि उनके कुछ विधायक जीतते हैं, तो वे भाजपा कांग्रेस के साथ सरकार बनाने नहीं जाएंगे। तब इन पर कोई भरोसा क्यों करेगा? लोग सोचते हैं कि आपको विधायक बनाकर भाजपा-कांग्रेस की गोद में ही बिठाना है तो उन्हें ही जिताकर क्यों न भेजा जाए? उक्रांद को यदि एक राजनीतिक दल के रूप में आगे बढ़ना है तो नए लोगों को नेतृत्व सौंपना होगा। जनता के पास जाकर कसम खानी होगी कि भाजपा-कांग्रेस की सरकारों में उनके विधायक कभी साझीदार नहीं होंगे। क्या उक्रांद इन परिवर्तनों के लिए तैयार है?
राज्य में बने दूसरे क्षेत्रीय दल अभी इस लायक भी नहीं बने हैं कि उन्हें एक-दो सीटों का दावेदार माना जाय। पिछले चार सालों में अपने दम पर खम ठोकने वाले ये दल अब क्षेत्रीय दलों की एकता की बात करने लगे हैं, जो सिर्फ चुनाव तक ही होगी। उसके बाद ये सबकुछ भूल जाएंगे।
राज्य में एक विश्वसनीय क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व को उभरने की दरकार है। उक्रांद जैसे दल संसाधनों का सवाल खड़े करते हैं। आप जैसे दल इसका उदाहरण हैं। आप ने यहीं से संसाधन खड़े कर अपने दल की गतिविधियों को मजबूत आधार दिया है, उत्तराखंड का कोई दूसरा क्षेत्रीय दल ऐसा क्यों नहीं कर सकता? इसके लिए राजनीतिक परिपक्वता और दूरदर्शी सोच की आवश्यकता होगी, जो उत्तराखंड के क्षेत्रीय दल दिखा नहीं पा रहे हैं।

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