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उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में दाड़िम पौधा

31/10/20
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड, चम्पावत
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में पाए जाने वाले जंगली फल यहां की लोकसंस्कृति में गहरे तक तो रचे बसे हैं, मगर इन्हें वह महत्व आज तक नहीं मिल पाया, जिसकी दरकार है। अलग राज्य बनने के बाद जड़ीबूटी को लेकर तो खूब हल्ला मचा, मगर इन फलों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी गई। और ये सिर्फ लोकगीतों तक ही सिमटकर रह गए। देखा जाए तो ये जंगली फल न सिर्फ स्वाद, बल्कि सेहत की दृष्टि से कम अहमियत नहीं रखते। दाड़िम उत्तराखंड का एक ऐसा मौसमी फल है बाहर का छिलका सुखाकर खांसी के औषधि के साथ.साथ स्वाद में भी लोगों के काम आता है जिनमें विटामिन्स और एंटी ऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा है। इन फलों की इकोलॉजिकल और इकॉनामिकल वेल्यू है। इनके पेड़ स्थानीय पारिस्थितिकीय तंत्र को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते हैंए जबकि फल सेहत व आर्थिक दृष्टि से अहम हैं।
उत्तराखंड में पाए जाने वाले जंगली फल पौष्टिकता की खान हैं। लिहाजा, अब वक्त आ गया है कि इन फलों को भी महत्व दिया जाए। जंगली फलों की क्वालिटी विकसित कर इनकी खेती की जाए और इसके लिए मिशन मोड में कार्ययोजना तैयार करने की जरूरत है। वह जंगली फलों को क्रॉप का दर्जा देने की पैरवी हैं। पहाड़ में खट्टे के लिये चूक प्रयोग किया जाता हैण् चूक गाढ़े काले रंग का ऐसा द्रव है जो हर पहाड़ी रसोई में मिलता हैण् पहाड़ में भांग इत्यादि की चटनी में चूक का प्रयोग ही किया जाता हैण् यह फलों के रस से बनाया जाने वाला एक द्रव हैण् चूक की छोटी सी दो.चार बूंद भी खटाई के लिये काफ़ी होती हैण् बाज़ार में चूक हमेशा से ही महंगे दामों में मिलता हैण् अच्छी गुणवत्ता वाले एक लीटर दाड़िम के चूक के हज़ार रूपये तक हैंण् अल्मोड़ा। जिला मुख्यालय के निकट हवालबाग में 1992 में एक कोल्ड स्टोर का निर्माण किया गया लेकिन पहले इसकी गुणवत्ता को लेकर काफी सवाल उठते रहे। इसके बाद उद्यान विभाग ने इस कोल्ड स्टोर को एक निजी संस्था को सौंपा। यह आज तक बंद पड़ा है। जिले में दूसरा कोई कोल्ड स्टोर नहीं है। मुख्य उद्यान अधिकारी ने बताया कि जिले के मटेना में कई साल पहले कोल्ड स्टोर बना था जो अब बंद पड़ा है, फिलहाल कोई अन्य कोल्ड स्टोरेज बनाने का प्रस्ताव नहीं है। जिले के जैंती तहसील क्षेत्र के लमगड़ा, ठाठ, कल्टानी, जलना, पौधार, गड़ापानी, छड़ौजा, बेडचूला, पजैना, ज्वारनेडी, कुटौली खांकर, सिल्पड़, मोतियापाथर, नाटाडोल, भांगादियोली, मेरगांव, डोल, शहरफाटक, गजार, पूनागढ़, डामर, चौखुटिया, चायखान आदि क्षेत्र में और जैंती, कांडे, भट्यूड़ा, बकस्वाड़, सेल्टाचापड़, स्योड़ा, उड्यारी, दाड़िमी, कुंज, बांजधार, बिनौला, भाबू, बिराड़ आदि क्षेत्रों में दाड़िम, संतरा, आडू, खुमानी, अंगूर आदि का बहुतायत में उत्पादन होता है। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। औने पौने दाम में फल बेचने को मजबूर किसान है।
फल हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। हमें जिस मौसम में जो भी फल मिलेए उसका अधिक से अधिक सेवन करना चाहिए। दाड़िम भी प्रकृति के कुछ अनमोल उपहारों में से एक है जिसे प्रकृति ने पोषक तत्वों से इस प्रकार सजाया है कि इसके पत्ते, जड़ की छाल, फल, छिलका तथा कली अनेक रोगों में औषधि का काम करते हैं। दाड़िम का पेड़ पहाड़ के सभी घरों में सामान्य रुप से देखा जा सकता है। दाड़िम का पेड़ यहां के लोक में कितना घुला मिला है उसे लोकगीतों से बखूबी समझा जा सकता है। दाड़िम का पेड़ पहाड़ के सभी घरों में सामान्य रुप से देखा जा सकता है। भारत को जानना है तो गांव को जानना पड़ेगा। स्वतंत्रता के 73 वर्ष बाद भी उनकी यह बात प्रासंगिक है। इसलिए भारत का इलाज करने के लिए लाइलाज होते गांवों के इलाज को प्राथमिकता देनी होगी।

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